श्री पावापुरी तीर्थ

 
pavapuri jal mandir

मंदिर का दृश्य |


paVapuri

मुलनायक भगवान

श्री महावीर भगवान,चरण पादुका, शयाम वर्ण , लगभग १८ सें. मी. |(श्वेताम्बर जल मंदिर) |


तीर्थ स्थल –

                           पावापुरी ग़ाव के बहार सरोवर के मध्य |

 


 प्राचीनता –

                           चातुर्मास में भगवान के दर्शनार्थ अनेको राजगं, शेश्तिगन आदि बख्त आते रहते थे |प्रभु ने प्रथम गनधर श्री गोतमस्वामी को निकटवर्ती ग़ाव में देवशर्मा भरमान को उपदेश देने भेजा| कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी के प्रात : काल प्रभु की अंतिम देशना प्रारम्भ हुई उस समय म्मल्वंश के नौ राजा, लिच्छवी वंश के नौ राजा आदि अनय भक्तगणों से सभा भरी हुई थी | सारे श्रोता प्रभु की अम्रुतमे वाणी को अतअंत भाव व श्रद्धा पूर्वक सुन रहे थे |

                           प्रभु के निर्वाण के समाचार चारो तरफ फ़ैल चुके |लाखो देव व मानवो की भीड़ प्रभु के अंतिम दर्शनार्थ उमड़ पड़ी |इन्द्रादि देवो व जन समूदाय ने विराट जुलूस के साथ प्रभु की देह को कुछ दूर ले जाकर विद्धान पूर्वक अंतिम संस्कार किआ |

                           भगवान के बड़े भ्राता नन्दिवर्धन ने अंतिम देशना स्थल एवं अंतिम संस्कार स्थल पर चौतरे बनाकर प्रभु के चरण स्तापित किए जो आज के मंदिर व जल मंदिर माने जाते है |जल मंदिर में चरण पादुकाओं पर कोई लेख उत्कीर्ण नहीं है | समय-समय पर इस मंदिर का जिनोद्वार हुआ |

 


 परिचय –

                             प्रभु वीर की अंतिम देशना इस पावन भूमि में हुई थी | अत: यहांका शुद्ध वातावरण आत्मा को परम शान्ति प्रधान करता है |दीपावली उत्सव मनाने की प्रथा महावीर भगवान के निर्वाण दिवस से यही से प्रारम्भ हुई| भगवान् महावीर की प्रथम देशना भी यही पर हुई मानी जाती है | उस स्थान पर नविन सुन्दर समवसरण के मंदिर का निर्माण हुआ है |

                             जल मंदिर की निर्माण शैली का जितना वर्णन करे कम है |कमल के फूलो से लड़लद भरे सरोवर के बीच इस मंदिर का दृशयदेखना मात्र से भगवान महावीर का स्मरण हों आता है |जल मंदिर में प्रवेश करते ही मनुष्य सारे ब्रह्मा वातावरण भूलकर प्रभु भक्ति में अपने आपको भूल जाता है- ऐसा शुद्ध व पवित्र वातावरण है यहा का |