श्री ओसिया तीर्थ

 
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मंदिर का दृश्य |


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मुलनायक भगवान

श्री महावीर भगवान ,(श्वे. मंदिर) |


तीर्थ स्थल –

                                   ओसियां ग़ाव के मध्य |


 प्राचीनता –

                                   श्री हरी उदयन के शीषय श्री नयप्रमोद द्वारा वि.सं. १७१२ में रचित “ओसियां वीर स्तवन “में इस प्रतिमा को सम्प्रति राजा द्वारा निर्मित बताया है |सदीओ तक यह प्रतिमा भूगर्भ में रही |जब उहड़ मंत्री ने यह नगरी बसाई तब आचार्य श्री रत्नप्रभसूरीश्वरजी का यहा पदापर्ण हुआ व उहड़ मंत्री ने आचार्य श्री से प्रतिबोध पाकर जैन धर्म अंगीकार किया था |पुरातत्व – वेताओ के अनुसार यहा की शिल्पकला आठवी सदी की मानी जाती है |

                                   नव प्रमोद द्वारा रचित “ओसियां वीर स्तवन ” के अनुसार अगर यह नगरी ही विक्रम की ११ वी सदी में बसाई गई होती तोह उसके साथ सौ वर्ष पूर्व सम्प्रति राजा के यहा आने का व प्रतिमा निर्मित करवाने का कारण ही नहीं बनता |


परिचय –

                                  ओसवाल समाज का हर वयक्तिअपने पूर्वजो की पवित्र भूमि पर ओश्वंश के संस्थापक द्वारा भगवान् महावीर के दर्शन करने का अवसर न चुके | भगवन महावीर के ७० वर्षो पश्चात् श्री पार्श्वनाथ भगवान के सातवे पाटेश्वर आचार्य श्री रत्न-प्रभुसुरिश्वर्जी ने यहा के राजा उपलदेव, मंत्री उहड़ व अनेको शूरवीर राजपूतों को जैन-धर्म अंगीकारकरवाया एवं ओश्वंश की स्थापना करके उन्हें ओश्वंश में परिवर्तित किया था |यह सब शुभ समय में प्रकांड आचार्य द्वारा किए स्थापन का मूल कारण है |

                                  भगवान महावीर का मंदिर व मंदिर अपनी विशालता, कलागत विशेषता एवं सौन्द्रय के कारण विश्व-विखायत है |शिल्प और कला की दृष्टी से ओसियां विश्व में प्रसिद्द है |पठारों पर खुदी हुई यहां की कलात्मक प्रतिमाए अदित्व है |मंदिर की भामती में प्रसिद्ध तोरण की कारीगरी एवं बनावट अति आकर्षक है |यह स्थल पुरातत्व दृष्टिकोन से महत्वपूर्ण , स्थान रखता है |देश-विदेश से भी शोध्कर्तागन यहा की प्रच्चीनता व शिल्पकला  की शोध हेतु यहा आते रहते है |