Shree Jaisalmer Tirth

 

 

श्री जैसलमेर तीर्थ

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मंदिर का दृश्य |


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मुलनायक भगवान

श्री चिंतामणि पार्शवनाथ भगवान, श्वेत वर्ण,पद्मासन्स्थ, (श्वे. मंदिर) |


 

प्राचीनता :

                          रावल जैसलजी ने अपने नाम पर जैसलमेर बसाकर किले का निर्माण-कार्य वि.सं. १२१२ आषाढ़ शुक्ला प्रतिपदा रविवार के दिन  प्रारम्भ किया| इनके भतीजे भोजदेव रावल की राजधानी लोद्रवा थी| काका-भतीजे में कुछ अनबन के कारण जैसलजी ने मोह्मद गोरी से सैनिक संधि करके भतीजे के नगर लोद्र्वा पर चढ़ाई की, युद्ध में भोजदेव व् हाजरों योद्धा मारे गए| लोद्र्वा जैसलजी के अधिकार में आया| लोद्रवा की जनता भय के कारण इधर०उधर जाकर, बसी , जिससे लोद्रवा सुना-सा दिखने लगा| जैसलजी ने लोद्रवा से यहाँ आकर अपनी नयी राजधानी बसाई| कहा जाता है, यहाँ के मुलनायक श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा वही है, जो लोद्रवा मंदिर में थी| इस पर सं. २ का उत्कीर्ण है|

लोद्रवा ध्वंस हुआ तब यह प्रतिमा यहाँ लायी गयी| वि.सं. १२६३ फाल्गुन शुक्ल २ को यह प्रतिमा आचार्य श्री जिनपतिसूरीश्वर्जी द्वारा विराजित करवाने का उल्लेख है| इसका उत्सव शेष्टि श्री जगधर ने बड़े ही धूमधाम के साथ किया था| यह भी कहा जाता है की इस प्रतिमा की प्रतिष्ठा आचार्य श्री जिनकुशलसूरीश्वर्जी के हाथो हुई थी| वि.सं. १४५९ में आचार्य श्री जिनराजसूरीश्वर्जी के उपदेश से मंदिर निर्माण का कार्य प्रारम्भ होकर वि.सं. १४७३ में राउल लक्ष्मणसिंहजी के राज्य काल में रांका गोत्रीय क्षेष्टि श्री जयसिंह नरसिंह द्वारा आचार्य श्री जिनवर्धन सूरीश्वर्जी के हाथों प्रतिष्ठा करवाने का भी उल्लेख आता है| हो सकता है, मंदिर का जिणोरद्वार होकर प्रतिमा की पुन: प्रतिष्ठा वि.सं. १४७३ में करवायी गयी है| उस समय मंदिर का नाम लक्ष्मण विहार रखने का उल्लेख है| इसी मंदिर में कई अन्य प्रतिमाओं व पाषण पट्टों पर वि. की पंद्रहवी व् सोलहवी सदी के भी लेख है| यह जैसलमेर का मुख्य मंदिर माना जाता है व श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ भगवान के मंदिर के नाम से प्रचलित है| यहाँ के अन्य मंदिर प्राय: सोलहवी सदी में निर्मित हुए का उल्लेख है|


 परिचय :

                      जैसलमेर अपनी विशिष्ट कला के लिए प्रसिद्ध है| शिल्पकारों ने किसी पाषण में कही भी ऐसी जगह नहीं छोड़ राखी है, जहाँ कला के कुछ न कुछ दर्शन न हो | भारत में जैसलमेर ही एक ऐसा स्थान है, जहाँ मंदिरों में ही नहीं , हर घर के छज्जो, झरोखे आदि में झीणी-झीणी कला के नमूने नजर नजर आते है| यहाँ का पिला पत्थर इतना कड़क होते हुए भी शिल्पकारों ने अपनी कला का जबरदस्त नमूना पेश किया है|

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श्री पार्श्वनाथ जिनालय का प्रवेशद्वार 

यहाँ निम्र ग्रन्थ भंडार है : बहुत भंडार – किले के मंदिर में, तपागच्छीय भंडार – आचार्यगच्छ के उपाश्रय में, बहुत खतरगच्छय भंडार – भट्टारकगच्छ के उपाश्रय में, लोंकागच्छीय भंडार – लोंकागच्छ के उपाश्रय में, डूंगरसी ज्ञान भंडार – डूंगरसी के उपाश्रय में, थिरुशाह भंडार-थिरुशाह सेठ की हवेली में |

यहाँ अनेको आचार्य भगवंतो ने यात्रार्थ पदापर्ण किया है| वि.सं. १४६१ में जिनवर्धनसूरीश्वर्जी जब जैसलमेर आये, तब मुलनायक श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ भगवान के पास भैरवजी की मूर्ति थी| उन्होंने स्वामी व सेवकों बराबर बैठना उचित न समझकर भैरवजी को बाहर विराजमान करवाया | दुसरे दिन देखने पर भैरवजी की मूर्ति पुन: अन्दर उसी जगह पर थी|दुसरे दिन वापिस बाहर बैठाने पर भी यही हुआ| आखिर में सूरीजी ने हठीदेव समझकर गर्जना के साथ मंत्रोच्चारण किये| उसपर मूर्ति स्वयं ही बाहर विराजित हो गई, तब सूरीजी ने तांबे की २ मेंखे लगवायी | भैरवजी की मूर्ति अति चमत्कारी है| सूरीजी द्वारा यहाँ और भी चमत्कार बताये गए है| उन सब का वर्णन यहाँ संभव नहीं|

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श्री संकट हरण पार्शवनाथ

यहाँ पर हाजारों छोटी-बड़ी पूजित जिन-प्रतिमाओं के दर्शन होते है| इतनी प्रतिमाए शत्रुंजय के बाद यही पर है| एक पाषण पट्ट में जो जितने मंदिर में तिल जितनी प्रतिमा उत्कीर्ण है|

वर्तमान में इसके अतिरिक्त  किले पर ९ मंदिर और है| गाँव में ५ मंदिर है| यहाँ के ग्रन्थ-भण्डार अति दर्शनीय है| दादा जिनदत्तसूरीजी की आठ सौ वर्ष से प्राचीन चादर चौलपट्टा आदि दर्शनीय है|

* Jain Dharmshalas at Jaisalmer Tirth *

1. Shri Lodravapur Parshvnath Jain Shwetamber Tirth Dharamshala

Near Khadi Bhandar, District : Jaisalmer
Phone: 02992 – 252404 / 252966

2. Parshv Bhavan

District : Jaisalmer, State : Rajasthan – 345001
Phone: 8003094509