श्री बलसाणा तीर्थ

 
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मंदिर का दृश्य |


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मुलनायक भगवान

श्री विमलनाथ भगवान, श्याम वर्ण, पद्मासनस्थ, (श्वे. मंदिर) |


 

प्राचीनता :

                          आज का छोटासा बलसाणा गाँव किसी समय खानदेश के इस सप्तपुड़ा पहाड़ी इलाके में नदियाँ से घिरा एक विराट नगर रहने का उल्लेख है|

आज भी यहाँ-यहाँ स्तिथ प्राचीन मंदिरों आदि के कलात्मक भग्नावशेष यहाँ के अगुरव पूर्ण गरिमामयी प्राचीनता की याद दिलाते है|

संभवत: उस वैभवपूर्ण समय में यहाँ कई जैन मंदिर भी अवश्य रहे होंगे जैसे हर प्राचीन स्थलों पर पाए जाते है|

भाग्योदय से एक पटेल परिवार को यहाँ अपने घर के निकट की एक टेकरी में से प्रभु प्रतिमा प्राप्त हुई| पटेल परिवार अतीव हर्षोल्लासपूर्वक  अपने घर में विराजमान करवाकर अपने ढंग से भावपूर्वक पूजा-अर्चना करता रहा|

जैन बंधुओ को मालुम पड़ने पर दर्शनार्थ आने वालो की संख्या निरंतर बढ़ने लगी| यह प्रतिमा प्रभु श्री विमलनाथ भगवान की अतीव सुन्दर व प्रभावशाली है|प्रतिमा प्रकट होने के पश्चात् पटेल के परिवार में ही नहीं अपितु सारे गाँव में शांति व उन्नतिका वातावरण फैलने लगा| यहाँ के निकट गाँव के जैन समाज वाले पटेल परिवार से प्रतिमा प्रदान करने हेतु अनुरोध कर रहे थे परन्तु पटेल परिवार नहीं देना चाहता था|

प्रतिमा की शिल्पकला से प्रेरित होता है की यह प्रतिमा कम से कम १५०० वर्ष प्राचीन तो अवश्य है अत: यहाँ १५०० वर्ष पूर्व मंदिर अवश्य था इसमें कोई संदेह नहीं|

कोई दैविक संकेत से निकट गाँव में चातुर्मासार्थ विराजित वर्धमान तपोनिधि प.पू. आचार्य भगवंत श्रीमद् विजयभुवनभानसूरीश्वर्जी म.सा. के प्रशिष्य प.पू. गणिवर्य श्री विधानन्दविजयजी म.सा. को यहाँ दर्शनार्थ आने की भावना हुई व यहाँ पधारे| इनके उपदेश से प्रभावित होकर पटेल परिवार व गाँव वालो ने प्रतिमा देने की सहर्ष मंजूरी प्रदान की परन्तु उनकी शर्त थी की मंदिर  यहीं पर बने|

यहाँ  से प्रकट हुए प्रभु को भी संभवत: यहीं पुन: प्रतिष्टित होना था अत: सभी की भावना देखकर गुरुभगवंतकी भी भावना हुई की जहाँ प्रतिमा प्रकट हुई उसी स्थान पर पुन: मंदिर बनवाकर प्रभु को प्रतिष्टित करना श्रेयकर रहेगा| गुरु भगवंत द्वारा जय ध्वनि के साथ मंजूरी की घोषणा होते ही उपस्तिथ सभी महानुभवों के चेहेरों पर अतीव आनंदमय ख़ुशी चा गई जो दृश्य देखने योग्य था|


परिचय :

                      प्रतिमा प्रकट होते ही गाँव में छाया शान्ति का वातावरण व पुन: प्रतिष्ठाके पश्चात् भी निरंतर घटती आ रही चमत्कारिक घटनाएँ यहाँ की मुख्य विशेषता है| जैन-जैनेतर सभी दर्शनार्थ आते रहते है| खानदेश क्षेत्र का यह भी एक प्राचीनतम वैभवशाली तीर्थ माना जाता है| इसे यहाँ की पंचतीर्थी का एक मुख्य तीर्थ भी कहते है|

प्रतिवर्ष माग सुदी १० को ध्वजा चढ़ाई जाती है|

प्रभु प्रतिमातिव प्रभाविक व सौम्य है| प्राचीन कला के भग्नावशेष इधर-उधर नजर आते है, जो अजंता-एल्लोरा कलाकृति की याद दिलाते है|