श्री अष्टापद तीर्थ (रानी)

 

 

श्री अष्टापद तीर्थ

 

              गोडवाड पंचतीर्थी का प्रवेशद्वार रानी स्टेशन से आधा की.मी. दूर वरकाणा तीर्थ जाने वाली सड़क पर नदी के किनारे बायीं तरफ स्तिथ है श्री अष्टापद तीर्थ रानी| श्वेत पाषण से निर्मित भव्य कल्त्मक प्रवेशद्वार से अन्दर विशाल भूखंड पर राजस्थान दिवाकर, मरुधर देशोधदारक आ. श्री सुशीलसूरीजी की प्रेरणा आशीर्वाद से नवनिर्मित, अलूप्त श्री अष्टापद तीर्थ की नूतन संरचना के उपरांत कमलाकर वेदी पर भव्य-दिव्य शिखरबध जिनालय में मुलनायक श्री आदिनाथ प्रभु की प्रवालवरनी प्रतिमा सहित २४ तिर्थंकरो की अपने-अपने वर्ण के अनुसार बड़ी से छोटी होती आकर में प्रतिमाओं की वीर नि.सं. २५२५, शाके-१९२०, वि.सं. २०५५ को माघ शुक्ल १४, शनिवार, दी. ३० जनवरी १९९९ को मोहत्सवपूर्वक अंजनशलाका प्रतिष्ठा संपन्न हुई |

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अलौकिक इतिहास : विश्व मव विख्यात श्री जैन धर्म के प्राचीन-अवार्चिन अनेक तीर्थ विधमान है, जिनमे से श्री अष्टापद तीर्थ वर्तमान समय में विलुप्त है| अष्टापद पर्वत इस अवसर्पिर्नी काल में प्रभु कालीन अयोध्या नगरी की उत्तर में स्तिथ था| भगवान ऋषभदेव का निर्वाण इसी अष्टापद पर्वत पर हुआ था| प्रभु के प्रथम पुत्र श्री भरत चक्रवर्ती ने प्रभु के निर्वाण स्थल पर सिंहनिषधा  नामक मनिमय एवं भव्य जिन्प्रसाद का निर्माण करवाया था| प्रसाद के चारों और चैत्य वृक्ष, कल्पवृक्ष, सरोवर, कृप एवं बावड़ियो आदि का निर्माण करवाया| यह प्रसाद भूतल से तीन कोस की उंचाई पर था और एक योजन विस्तार वाला था| भारत चक्रवर्ती ने उत्तम पीठिका के कमलासन पर आसीन अशोक वृक्ष आदि अष्ट प्रातिहार्य युक्त देह, लांक्षण सहित तद तद वर्णावली, वर्त्तमान चौबीसी तिर्थंकरो की रत्नों से निर्मित भव्य प्रतिमाए प्रतिष्टित की थी| इस अनुपम तीर्थ के रक्षार्थ अपने दंड रत्न के द्वारा एक-एक योजन के अंतर पर आठ पढ़ियो का निर्माण करवाया, जिससे यह तीर्थ अष्टापद के नाम से विख्यात हुआ| तत्पश्चात भरतजी ने उत्तम आराधना, अर्चना एवं वंदना की| अंत में संयम साधना करके आरिसा भवन में केवल ज्ञान प्राप्त करके वे मुक्त हो गए|

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पौराणिक आख्यान के अनुसार, सगर चक्रवर्ती के साठ हजार पुत्र अष्टापद तीर्थ की भक्ति करने के कारण बारहवे अच्युत देवलोक में देव बने| तीर्थ की महिमा का वर्णन करते खा गया है की जो व्यक्ति अपनी आत्मशक्ति के द्वारा श्री अष्टपद तीर्थ पर पहुँचता है, वह उसी जन्म में मोक्ष प्राप्त करता है| सर्वज्ञ विभुश्री महावीर स्वामी के प्रथम गणधर, अनंत-लब्धि-निधान श्री गुरु गौतम स्वामी सूर्य रश्मियों के आलंबन के द्वारा अपनी अलौकिक शक्ति से श्री अष्टापद तीर्थ के सोपानों का स्पर्श किये बिना ही अष्टापद पर्वत पर पहुंचे, वही पर जग चिंतामणि चैत्यवंदन की रचना की और चौबीस तिर्थंकरो की भावपूजा की| नीचे आकर १५० तापसों को प्रतिबोध देकर पारणा करवाके संयमी बनाया|

” आबू, अष्टपद, गढ़ गिरनार,

सम्मेतशिखर, शत्रुंजय सार |

पांचे तीरथ उत्तम ठाम,

सिद्धि गया तेने करू प्रणाम ||”

यही वह तीर्थ है, जहां लंकापति रावण अपनी पटरानी मंदोदरी के साथ प्रभु के सम्मुख भक्तिपूर्वक संगीत एवं नृत्य में मग्न हुआ था| रावण वीणा बजा रहा था और मंदोदरी नृत्य कर रही थी| अचानक वीणा का तार टूट गया, लेकिन रावण ने अपने हाथ की नस के साथ तार जोड़ दिया, जिससे भक्ति में तनिक भी व्यवधान नहीं आया| उसी अवसर पर रावण ने “तीर्थंकर नाम कर्म”का उपार्जन किया था| ऐसे अष्टापद तीर्थ एवं प्रभु आदिनाथ को कोटि-कोटि वंदन|

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श्री वर्धमान जिन पट्ट परम्परादेव-गुरु (द्विमंजिला) शिखरबध मंदिर का खनन वि.सं. २०५०, वै.शु. १० शुक्रवार, दी.२० मई, १९९४ को तल मंजिल पर मू.भ. श्री महावीर स्वामी आदि तथाप्रथम मंजिल पर सहस्त्रफणा पार्श्वनाथजी की प्रतिष्ठा आ. श्री सुशीलसूरीजी के हस्ते, वि.सं. २०५५, माघ शु. १४, शनिवार, दी. ३०.१.१९९९ को संपन्न हुई|

नवग्रह मंदिर : श्री धर्मनाथ स्वामी मंदिर, जोयला किप्रतिष्ठ के निमित्त, श्री संघ-जोयला द्वार अष्टपद तीर्थ पर श्री नवग्रह शान्ति जिनमंदिर का निर्माण हुआ| इस मंदिर खनन मुहर्त सं. २०५१. ज्ये. सु. ७, सोमवार, दी. ५ जून १९९५ को संपन्न हुआ था| वि.सं. २०५७, वीर नि.सं. २५२७, माघ शु. १४, बुधवार, दी. ७ फ़रवरी २००१ को, आ. श्री सुशीलसूरीजी के करकमलों से प्रतिष्ठा संपन्न हुई|

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वर्तमान में आ. श्री जिनोत्तमसूरीजी के मार्गदर्शन में तीर्थ निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर है तथा अनेक उपलब्धियों को आत्मसात करता हुआ धार्मिक चेतना का प्रतिक विश्व का एकमात्र ” श्री अष्टापद जैन तीर्थ” अद्वितीय एवं अलौकिक स्मारक के रूप में शुशोभित है