श्री अजाहरा पार्श्वनाथ तीर्थ

 

 

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मंदिर का दृश्य |


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मुलनायक भगवान

श्री अजाहरा पार्श्वनाथ भगवान, श्वेत वर्ण, पद्मासनस्थ, (श्वे. मंदिर)|


 

प्राचीनता :

                          प्रभु प्रतिमा अति ही प्राचीन है, जिसकी प्राचीनता का नौमान लगाना कठिन है| कहा जाता है वर्तमान चौबीसी के बीसवे तीर्थंकर के काल में रघुवंश के वीर प्रतापी राजा अजयपाल को रोग निवारण जलकुंड से प्राप्त इस प्रभु प्रतिमा के न्ह्वन जल से हुआ था, जिसके कारण राजा अजयपाल ने यह गाँव बसाकार मंदिर निर्मित करवाके इस चमत्कारिक प्रभु प्रतिमा की प्रतिष्टित करवाया था| यहाँ पर सैकड़ो प्राचीन बावड़ियाँ अभी भी मौजूद है व अनेको प्राचीन प्रतिमाए भूगर्भ से प्राप्त हुई थी| चौदहवी शताब्दी में उपध्याय श्री विनयविजयजी द्वारा रचित “तीर्थ माला” में भी इस तीर्थ का वर्णन आता है| भूगर्भ से प्राप्त काउसगियामूर्तियों पर सं. १३२३ जेठ शुक्ला ८ गुरूवार को श्री उदयप्रभसूरीजी के पट्टलंकार श्री महेंद्रसूरीश्वर्जी द्वारा प्रतिष्टित होने का उल्लेख है| यहाँ पर प्राप्त एक घंटे पर “श्री अजहरा पार्श्वनाथ सं. १०१४ शाह जयचन्द” उत्कीर्ण है| इन सबसे यह सिद्ध होता है की यह प्राचीन क्षेत्र है व सदियों से यहाँ जाहोजलाली रही|


 

परिचय :

                         यह सौराष्ट्र के अजाहरा पंचतीर्थी का मुख्य स्थान है| कहा जाता है की रत्नासार नाम का व्यापारी अपने जहाज में अनेको व्यापारियों को साथ लेकर विदेश जा रहा था| समुद्र के बीच उसका जहाज अटक गया| जब सारे लोग अति व्याकुल होने लगे, इतने में दैविक अदृश्य आवाज हुई की समुद्र में जहाज के नीचे श्री पार्श्वप्रभु की प्रतिमा है, जिसके न्ह्वन जल से १०७ रोंगों से पीड़ित पराक्रमी राजा श्री अजयपालका रोग निवारण होगा| रत्नासार ने समुद्र से प्रभु प्रातिमा निकलवायी | प्रतिमा का दर्शन करने पर उसके हर्ष का पार न रहा| उस समय राजा अजयपाल अपनी सेना के साथ दीव बन्दर में पड़ाव डाले हुए थे व अनेको रोगों से पीड़ित होते हुए भी अनेको योधाओं को हराते आ रहे थे|

रत्नासार ने तुरंत ही राजा अजयपाल को इस घटना का वृतांत कहलाया| राजा तुरंत ही आकर प्रभु प्रतिमा को आदर-सत्कार पूर्वक बाजी-गाजों के साथ अपने यहाँ ले गए, सिर्फ ९ दिनों में राजा एकदम निरोग हो गये| उन्होंने यहीं पर अजयपुर नाम का नगर बसाकर भव्य मंदिर का निर्माण करवाके इस प्रभु प्रतिमा को प्रतिष्टित करवाया| प्रभु प्रतिमा के न्ह्वन जल से राजा अजयपाल रोग से मुक्त होने के कारण भक्तगण प्रभु को अजहारा पार्श्वनाथ कहने लगे| उसके बाद भी उन्होंने चमत्कारिक घटनाए घटी है| अभी भी श्रद्धालु भक्तजनों के कई प्रकार के रोग इस प्रतिमा के न्ह्वन जल से निवारण होते है| अनेकों बार मंदिर में रात्री में देवों द्वारा नाट्यारंभ होने की आवाज़े आती है| कहा जाता है की एक वक़्त यहाँ पर केशर की मामूली वर्षा हुई थी|

श्री अजयपाल राजा द्वारा प्रतिष्ठा होने के बाद अभी तक १४ उद्धार हुए है| लेकिन प्रतिमा वही है, ऐसा उल्लेख है| एक समय विलेपन का कार्य करते वक़्त पुजारी ने कारीगरों से आरती उतारकर बाद में काम प्रारंभ करने का अनुरोध किया| परन्तु कारीगर न माने व् कार्य शुरू करने गये | तुरन्त तोप की आवाज जैसी अदृश्य आवाज आई व् मंदिर में लाल रंग फ़ैल गया| प्रतिमा भी लाल दिखने लगी| कहा जाता है ऐसी चमत्कारिक घटनाए अनेको बार घटती रहती है | हमेशा अनेकों जैन-जैनेतर आते रहते है व प्रभु-प्रतिमा के न्ह्वन जल को अमृतजल मानकर उपयोग करते है, जिससे उसनके रोगों का निवारण होता है, ऐसा अनेको का अनुभव है|