*** About Tirthankars & Arihants ***

 तीर्थंकर

              जो विशेष प्रकार के त्याग-तपस्या आदि के द्वारा तीर्थंकर नाम कर्म का उपाजर्न करके तीसरे भव में राजकुल में जन्म धारण करते है और फिर कई तो राजय करके व कई बिना राजय किए कुमारवस्था में ही संयम लेकर घातिक कर्मो का नाश करते है और केवल ज्ञान प्राप्त करते है एवं साधु,साधवी,श्रावक इन चार तीर्थो की स्तापना करते है वे तीर्थंकर कहलाते है |

 

तीर्थंकर की विशेषताऐ

             उनमे चौतीस विशेश्ताए होती है| उनकी वाणी पैतीस गुणों से मुक्त होती है और उनकी देह में एक हज़ार आठ लक्षण विधमान होते है |

 

तीर्थंकरो की चौतीस विशेषताऐ

१. उनके सीर व दाडी-मूछ के बाल और रोम, नाख़ून मरयादा से अधिक नहीं बढते |

२ .उनकी देह में कोई रोग नहीं होता व देह पर मैल नहीं लगता |

३. उनका मॉस और रक्त गाय के दूध के समान सफ़ेद होता है |

४. उनकी सांस से कमल-पुष्प सी सुवास आती है |

५. उनके आहार-निहार चर्म-चशओ से नहीं देखे जा सकते |

६. जब वे चलते है तो उनके आगे-आगे गगन में धर्मचक्र चलता है |

७. उनके सीर पर अम्बर में तीन छत्र होते है |

८. उनके दाए-बाए श्वेत चामर चलते है |

९. उनके बिराजमान होने के लिए पाद पीठ उक्त स्फटिक रत्न जडित सिहासन होता है |

१०. उनके आगे-आगे अम्बर में सहत्रो से उक्त इंद्र-ध्वज चलता है |

११. उनके ऊपर अम्बर में अशोक वृष होता है |

१२. उनके सिर के पिछले भाग में तेज का पुंज होता है |

१३. उनके आस-पास का प्रदेश रमिय होता है |

१४. जब वे चलते है तो आगे के कांटे उलटे हो जाते है |

१५. उनके विहार-शेत्र में रुतुए अनुकूल हो जाती है |

१६. उनके आस-पास का एक-एक ओजन तक का भू भाग शीतल, सुखदाया  वाऊ के कारण निर्मल हो जाता है |

१७. सुबासित जल की साधारण वृष्टि से आस पास के प्रदेश में रेत नहीं उडती |

१८. घुटनों से ऊपर तक पांच रंगों के सुवासित पुष्पों की वृष्टि होती है |

१९. उनके निकट अमनो शब्द ,रूप, रस, गंध और स्पर्श का नाम-निशान नहीं होता |

२०. मनोगिया शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श का सदभाव रहता है |

२१. उनकी वाणी निकट वालो को एवं एक-एक को दुरी पर बैठने वालो को सम्मान रूप से सुनाई देती है |

२२. तीर्थंकर अर्ध मागवी भाषा ही बोलते है |

२३. उनकी भाषा आरय -अनायर मनुष्य एवं पशु-पक्षी सब समभक्त लेते है अर्थार्त उनकी स्वयम की भाषा में परिणित होकर समक्ष प्रकट होती है |

२४. उनके चरणों में सांप-निओला बिल्ली-चुआ और शेर-बकरी आदि वैर भूलकर बैठते है और प्रसन्न-चित से धर्म श्रवण करते है |

२५. अन्य तिथिर्त्क लोग भी उनसे प्रभावित होते है और उनकी वंदना करते है |

२६. बड़े-बड़े विद्धान भी अपने प्रश्नों का समाधान प्राप्त करके उनके सामने निरुतर हो जाते है |

२७. जिस शेत्र में होकर वे विचरण करते है उसके चारो और सौ-सौ कोस तक धान को हानि पहुचाने वाले चूहे आदि शुद्र जीव नहीं होते |

२८. उनके आस-पास महामारी ,प्लेग आदि नहीं होते है |

२९. उन्हें अपने राजा की सेना से भय नहीं होता |

३०. उन्हें शत्रु राजा की सेना से भी भय नहीं होता |

३१. उनके आस-पास अतिवृष्टि नहीं होती |

३२. उनके आस-पास अकाल नहीं पड़ता |

३३. उनके आस-पास अनावृष्टि नहीं होती |

३४. उनके आस-पास पहले से उत्पन उत्पात ,रोग, शोक आदि वयाघिए शीघ्र नष्ट हो जाती है |


अरिहंतो व तीर्थंकरो में अन्तर

                  अरिहंत तो चार कर्मो का नाश करने वाला प्रतेक बन सकता है | देश, वेश, आदि का कोई प्रश्न ही नहीं होता |उनकी संखया जघन्य दो करोड़ और उत्कृष्ट नौ करोड़ तक हो सकती है |तीर्थंकर तोह केवल आरय देश में ही होते है , वे राजपुत्र होते है, केवल गिआन प्राप्त करते  चार तीर्थो की स्थापना करने वाले होते है और अनेक विशेषताओं से उक्त होते है, उनकी संखया जघन्य बीस और उत्कृष्ट एक सौ सत्तर (१७०) होती है |सार यह है की तीर्थंकर विशिट अरिहंत है और अन्य केवली सामान्य अरिहंत है |

Difference Between Tirthankar & Arihant - About Tirthankar & Arihant Bhagwan

श्री अरिहंत परमात्मा के १२ गुण की बात जानते है ?

१. अशोक वृक्ष – जहा परमात्मा का समवसरण होता हे वहा उनके शरीर से १२ गुना ज़्यादा बड़ा आसोपालव का वृक्ष देवता बनाते हे। उस वृक्ष के निचे बैठ के परमात्मा देशना देते हे।

२. सुरपुष्प वृष्टि – एक योजन तक देवता सुगंधि ऐसे पांच वर्ण के फूल की वृष्टि गुडे तक करते हे

३. दिव्य ध्वनि – परमात्मा मालकोश राग में देशना दे रहे होते हे तब देवता उसमे वीणा, बांसुरी आदि साधनो से मधुर ध्वनि देते हे।

४. चामर – रत्नजड़ित सुवर्ण की डंडे वाले चार जोड़ी सफ़ेद चामर से देवता परमात्मा की पूजा करते हे।

५. आसन – परमात्मा को बैठने हेतु रत्नजड़ित सुवर्णमय आसन देवता बनाते हे।

६. भामंडल – परमात्मा के मुख पर इतना तेज होता हे की आम इन्सान उसे देख नहीं सकता इस लिए देवता भामंडल की रचना करते हे जो शरद ऋतु के सूर्य के जैसा दीखता हे, यह भामंडल परमात्मा के मुख के तेज को अपने अंदर खिंच लेता हे जिससे उनका मुख सामान्य मानवी देख सकता हे।

७. दुंदुभि – परमात्मा का समवसरण हो तब देवता देव दुंदुभि आदि वाजिंत्र बजाते हे, जो यह सूचन करता हे की “हे भव्य जीवो ! आप सब शिवपुर तक ले जाने वाले इन भगवंत की सेवा करो”

८. छत्र – परमात्मा के मस्तक के ऊपर मोतिओ के हार से सुशोभित ऐसे छत्र देवता बनाते हे – परमात्मा पूर्व दिशा में बैठते हे और देवता उनके तीन प्रतिबिंब बना के बाकी तीन दिशा में स्थापित करते हे – सभी दिशा में तीन छत्र होते हे ऐसे कुल १२ छत्र बनाते हे।

यह आठ गुण देवता द्वारा निर्मित होते हे, इन्हे अष्ट प्रातिहार्य कहते हे। बाकि 4 गुण परमात्मा के होते हे। हमें सोचना हे की क्या हम पूजा, स्नात्र आदि भक्ति करते हे तब समवसरण जैसा माहोल बनाते हे ? कही कोई मुनीवर प्रवचन दे रहे होते हे तो क्या हम समवसरण की महक महसूस करते भी हे ? एक बात हे – इन आठ प्रातिहार्य में से एक गुण हमने खूब अपनाया हे – वो हे दिव्य ध्वनि – परमात्मा की वाणी में देवता बांसुरी के मधुर स्वर जोड़ देते हे और आज के मॉडर्न देवता हम व्याख्यान में मोबाइल के अति मधुर स्वर जोड़ देते हे। कई बार देखा गया हे की व्याख्यान चल रहा हो और हमारे मोबाइल बजते हे उस समय। हमें ये सोचना चाहिए और शिस्त बनानी चाहिए की व्याख्यान में जाए तो मोबाइल साइलेंट करके बैठे। हमारी वजह से कितने लोगो की व्याख्यान रूचि में भंग होगा।

परमात्मा की भक्ति करो तो ऐसे की देवता भी झुक जाए। कही हम देख पाते हे की चामर सालो पुराने होते हे, कही एकदम छोटे छोटे चामर होते हे, कही छत्र एकदम काले होते हे, कही पंखे और दर्पण टूटे हुए होते हे, कही तो परमात्मा की प्रतिमा जी का भी हाल बुरा हे। यह सब कैसे हो ? क्या हमारा कोई कर्तव्य नहीं हे ? नए नए मंदिर हम बनवाते जाये और पुराने प्राचीन जिनालय, जिन प्रतिमा का ध्यान ना रखे तो क्या फायदा ? अगर घर में बहु बेटे अपने माँ बाप को परेशान करे तो हम कहते हे तुम्हारे बेटे भी बड़े हो के तुम्हे यही सबक देंगे – तो ज़रा सोचो, अगर पुराने जिनालयों का ख्याल ना रखा और नए बनवाते गए तो १०० साल के बाद हमारे बनाये हुए नए जिनालय का हाल भी यही होगा जो अभी हम पुराने का कर रहे हे। जिनालय बनाना जरुरी हे लेकिन जो हमारा प्राचीन समृद्ध वारसा हे उसको भी हमें सम्हालना हे।

अरिहंत परमात्मा की ऐसी ही उच्च भक्ति होनी चाहिए। अगर भक्ति में उच्च भाव आ गए तो समोसरण साक्षात नजर होगा। इस समोसरण को दूर को देखने से मरुदेवा माता मोक्ष को प्राप्त कर गए। हमारी सब की इच्छा होती हे की समोसरण देखने का मौका मिले – अगर हमारा सत्व सही रहा तो समोसरण जिनालय में ही बन जायेगा और खुद सीमंधर स्वामी सामने दिखेंगे। यही भाव लाना जरुरी हे – कर्म खपाने के लिए अरिहंत परमात्मा की अपूर्व भक्ति रोज करनी चाहिए।


**** हर काल के २४ तीर्थंकर ****

अतीत कालीन          वर्तमान कालीन           अनागत कालीन

श्री केवलज्ञानीजी    श्री ऋषभदेवजी    श्री पद्मनाभस्वामीजी

श्री निर्वानिनाथजी    श्री अजितनाथजी   श्री सुरदेवस्वामीजी

श्री सागरनाथजी     श्री संभवनाथजी        श्री सुपार्श्वनाथजी

श्री महायषजी  श्री अभिनंदनस्वामीजी  श्री स्वयंप्रभस्वामीजी

श्री विमलप्रभजी  श्री सुमतिनाथजी  श्री सवार्नुभूतिस्वामीजी

श्री सवार्नुभतिस्वामी श्री पद्रमप्रभुस्वामी श्री देवश्रुतस्वामी

श्री श्रीधरस्वामीजी     श्री सुपार्श्वनाथजी    श्री उदयस्वामीजी

श्री दत्तस्वामीजी   श्री चंद्रप्रभुस्वामीजी      श्री पेठालस्वामीजी

श्री दामोदरस्वामीजी    श्री सुविधिनाथजी    श्री पोहिलस्वामीजी

श्री सुतेजाप्रभुजी     श्री शीतलनाथजी     श्री शतकीर्तिस्वामीजी

श्री स्वामीनाथजी   श्री श्रेयांसनाथजी     श्री सुव्रतनाथजी

श्री मुनिसुव्रतस्वामीजी  श्री वासुपूज्यस्वामीजी श्री अममनाथजी

श्री सुमतिनाथजी   श्री विमलनाथजी   श्री निशकशायस्वामीजी

श्री षीवगतिनाथजी  श्री अनंतनाथजी  श्री निशपुलाकस्वामीजी

श्री असत्यागस्वामीजी    श्री धर्मनाथजी   श्री निर्ममस्वामीजी

श्री नामिश्वरस्वामीजी   श्री शांतिनाथजी  श्री चित्रगुप्तस्वामीजी

श्री अनिलनाथजी   श्री कुंथुनाथजी    श्री समाधिनाथस्वामीजी

श्री यशोधरस्वामीजी   श्री अरनाथजी   श्री संवतस्वामीजी

श्री कृतार्थनाथजी     श्री मल्लिनाथजी    श्री यशोधरस्वामीजी

श्री जिनेश्वरस्वामीजी श्री मुनिसुव्रतस्वामीजी श्री विजयस्वामीजी

श्री षुद्धमतिस्वामीजी   श्री नमीनाथजी    श्री मल्लीस्वामीजी

श्री शिवंकरस्वामीजी  श्री  नेमिनाथजी    श्री देवजिनस्वामीजी

श्री स्यनन्दस्वामीजी   श्री पार्श्वनाथजी  श्री अन्नतवीर्यस्वामीजी

श्री संप्रतिस्वामीजी   श्री वर्धमानस्वामीजी  श्री भद्रंकरस्वामीजी


***** २० विहरमान जिनेश्वर परिवार *****

२० विहरमान जिनेश्वर परिवार को भाव-भरी वंदना

  • कुल २०X ८४ = १६८० गणधर भगवंतों को एवं उन्केद्वारा रचित द्वादशांगी को भावभरी वंदना….

  • २०X१० लाख = २ क्रोड़ केवलज्ञानी भगवंतों को भावभरी वंदना…

  • २०X१ =२० अरब साधू -शाध्विजी भगवंतों को भाव भरी वंदना…

  • २०Xअरबों = अरबों श्रावक-श्राविकाओं को भावपूर्ण प्रणाम….

  • प्रभु के समवसरण में पधारकर वंदन-स्तुति आदि करके प्रभु की देशना सुनने वाले चौसट इन्द्र-इन्द्राणियों, असंख्य देव-देवियों को स्बहुमान प्रणाम….

  • विशों प्रभु के अधिष्ठायक देव-देवियों को भावभरे प्रणाम…

  • समवसरण में पधारकर प्रभु की वाणी का अमृतपान करने वाले देशविरती, सम्यकत्व के सन्मुख ऐसे तिर्थ्यंचो की भी भावभरी अनुमोदना….

 


*तीर्थंकर परमात्मा जी के नव अंग की ही पूजा क्यों की जाती है ?*

१. २ अंगूठा
२. २घुटना
३. २ हाथ
४. २कंधा
५. मस्तक
६. ललाट
७. कंठ
८.  हृदय
९. नाभि ॥

 


*****वर्तमान तीर्थंकर भगवान सीमंधर स्वामी का परिचय*****

History of Simandhar-Swami-Bhagwan- About Tirthankar & Arihant Bhagwan

भगवान  सीमंधर स्वामी कौन है ?

-भगवान सीमंधर स्वामी वर्तमान तीर्थंकर भगवान हैं, जो हमारी जैसी ही दूसरी पृथ्वी पर विराजमान हैं। उनकी पूजा का महत्व यह है कि उनकी पूजा करने से, उनके सामने झुकने से वे हमें शाश्वत सुख का मार्ग दिखाएँगे और शाश्वत सुख प्राप्त करने का और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाएँगे।

– भगवान सीमंधर स्वामी कहाँ पर है ?

महाविदेह क्षेत्र में कुल ३२ देश है, जिसमें से भगवान श्री सीमंधर स्वामी पुष्प कलावती देश की राजधानी पुंडरिकगिरी में हैं। महाविदेह क्षेत्र हमारी पृथ्वी के उत्तर पूर्व दिशा से लाखों मील की दूरी पर है।

 

वर्तमान तीर्थंकर भगवान सीमंधर स्वामी का परिचय (Shree Simandhar Swami Bhagwan)

 

1. भगवान सीमंधर स्वामी कौन है ?

भगवान सीमंधर स्वामी वर्तमान तीर्थंकर भगवान हैं, जो हमारी जैसी ही दूसरी पृथ्वी पर विराजमान हैं। उनकी पूजा का महत्व यह है कि उनकी पूजा करने से, उनके सामने झुकने से वे हमें शाश्वत सुख का मार्ग दिखाएँगे और शाश्वत सुख प्राप्त करने का और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाएँगे।


2. भगवान सीमंधर स्वामी कहाँ पर है ?

महाविदेह क्षेत्र में कुल ३२ देश है, जिसमें से भगवान श्री सीमंधर स्वामी पुष्प कलावती देश की राजधानी पुंडरिकगिरी में हैं। महाविदेह क्षेत्र हमारी पृथ्वी के उत्तर पूर्व दिशा से लाखों मील की दूरी पर है।


3. भगवान सीमंधर स्वामी का जन्म एवं परिवार

भगवान सीमंधर स्वामी का जन्म हमारी पृथ्वी के सत्रहवें तीर्थंकर श्री कुंथुनाथ स्वामी और अठारहवें तीर्थंकर श्री अरहनाथ स्वामी के जीवन काल के बीच में हुआ था। भगवान श्री सीमंधर स्वामी के पिताजी श्री श्रेयंस पुंडरिकगिरी के राजा थे। उनकी माता का नाम सात्यकी था।

अत्यंत शुभ घड़ी में माता सात्यकी ने एक सुंदर और भव्य रूपवाले पुत्र को जन्म दिया। जन्म से ही बालक में मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधि ज्ञान थे।


4. भगवान सीमंधर स्वामी के कल्याणक

उनका शरीर लगभग १५०० फुट ऊँचा है। राज कुमारी रुकमणी को उनकी पत्नी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। जब भगवान राम के पिता राजा दशरथ का राज्य हमारी पृथ्वी पर था, उस समय महाविदेह क्षेत्र में भगवान सीमंधर स्वामी ने दीक्षा अंगीकार करके संसार का त्याग किया था। यह वही समय था, जब हमारी पृथ्वी पर बीसवें तीर्थंकर श्री मुनीसुव्रत स्वामी और इक्कीसवें तीर्थंकर श्री नेमीनाथ की उपस्थिति के बीच का समय था। दीक्षा के समय उन्हें चौथा ज्ञान उद्भव हुआ, जिसे मनःपयार्य ज्ञान कहते हैं। एक हज़ार वर्ष तक के साधु जीवन, जिसके दौरान उनके सभी ज्ञानावरणीय कर्मों का नाश हुआ, उसके बाद भगवान को केवळज्ञान हुआ।


5. भगवान सीमंधर स्वामी की साधू सम्पदा

भगवान के जगत कल्याण के इस कार्य में सहायता के लिए उनके साथ ८४ गणधर, १० लाख केवळी (केवलज्ञान सहित), १० करोड़ साधु, १० करोड़ साध्वियाँ, ९०० करोड़ पुरुष और ९०० करोड़ विवाहित स्त्री-पुरुष (श्रावक-श्राविकाएँ) हैं। उनके रक्षक देव-देवी श्री चांद्रायण यक्ष देव और श्री पाँचांगुली यक्षिणी देवी हैं।

महाविदेह क्षेत्र में भगवान सीमंधर स्वामी और अन्य उन्नीस तीर्थंकर अपने एक करोड़ अस्सी लाख और ४०० हज़ार साल का जीवन पूर्ण करने के बाद में मोक्ष प्राप्ति करेंगे। उसी क्षण इस पृथ्वी पर अगली चौबीसी के नौवें तीर्थंकर श्री प्रोस्थिल स्वामी भी उपस्थित होंगे। और आँठवें तीर्थंकर श्री उदंग स्वामी का निर्वाण बस हुआ ही होगा।


6. सीमंधर स्वामी मेरे लिए किस प्रकार हितकारी हो सकते हैं

तीर्थंकर का अर्थ है, पूर्ण चंद्र! (जिन्हें आत्मा का संपूर्ण ज्ञान हो चुका है – केवलज्ञान) तीर्थंकर भगवान श्री सीमंधर स्वामी महाविदेह क्षेत्र में हाज़िर हैं। हमारी इस पृथ्वी (भरतक्षेत्र) पर पिछले २४०० साल से तीर्थंकरों का जन्म होना बंद हो चुका है। वर्तमान काल के सभी तीर्थंकरों में से सीमंधर स्वामी भगवान हमारी पृथ्वी के सबसे नज़दीक हैं और उनका भरतक्षेत्र के जीवों के साथ ऋणानुबंध है।


***** जिन दर्शन स्तुति (Jin Darshan Stuti)****

अज्ञानतिमिरान्धेरग्राह्यो , यो निष्परिग्रह:

भवभीनाशकृन्मेस्तु श्रीमत्सीमंधर प्रभु : ||

इसका अर्थ है : मोहदीजन्य मिथ्याज्ञान से अंधता को धारण किये हुए प्राणियों से जो अलक्ष्य-नहीं दिखने तथा जानने योग्य है व ब्रह्मान्तर परिग्रह से रहित है| वे श्री सीमंधर स्वामी मेरे जन्म-मरण रूप संसार चक्र के भयानक दुखों का नाश करे |