Sumerpur

सुमेरपुर

 

राजस्थान राजय के पाली जिले में गोडवाड़ का गौरव और सिरोही की ओर से आने पर गोडवाड़ का प्रथम नगर यानि प्रवेश द्वार है “सुमेरपुर“| पाली और सिरोही जिले की सीमा पर शिवगंज नदी के किनारे राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर एशिया की दूसरी बड़ी  अनाज मंडी के लिए विख्यात तथा जवाईबाँध (प्राचीन एरनपुरा) रेलवे स्टेशन से ९ की.मी. दूर तखतगढ़ बायपास रोड पर विश्व प्रसिद्ध होने को अग्रसर है एक भव्य तीर्थ “श्री अभिनव महावीर धाम” |

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स्थापना : आज से करीब ८० वर्ष पूर्व वीर नि. सं. २४६१, शाके १८५६, वि.सं. १९९१, मगसर कृष्णा ५, ई. सन नवंबर १९३५ को श्री संघ के वरिष्ठजनों ने दूरदृष्टी का उपयोग कर आनेवाली पीढ़ी को गानोंपार्जन की प्राप्ति के धेयय से नगर में एक विशाल भूमि संपादन कर शुभ मुहर्त में छात्रवास की स्थापना की और नाम रखा “श्री वर्धमान जैन बोर्डिंग हाउस” (छात्रावास)| इसी के साथ-साथ एक  कमरे में प्रभु महावीर स्वामी की प्रतिमा, देसुरी से २२ की.मी. दूर कोट सोलंकियान नगर के प्राचीन ध्वंस बने जिनालय से प्राप्त करके स्थापित की, ताकि आनेवाली पीढ़ी विधाभ्यास के साथ-साथ धर्म के प्रति भी जागृत रहे सके| छोटे कमरे में जगह की संकीर्णता के कारण श्री संघ ने जन सहयोग से शिखरबद्ध जिनालय का निर्माण करवाया और वीर नि.सं. २४७९, शाके १८७४, वि.सं. २०१० के जेष्ठ शुक्ल द्वि. – ९, रविवार, दी. १२ जून १९५३ को शिखरबद्ध जिनप्रसाद में पू. सिद्धिसूरीजी के निर्देशन में पू. उपधायाय श्री कलयाणविजयजी व सौभाग्यमुनिजी के वरदहस्ते मुलनायक श्री महावीर स्वामी (वर्धमान) की अति प्राचीन वि.सं. १४५९ की प्रतिमा प्रतिष्ठित की गई| साथ ही पार्श्वनाथ, विमलनाथ, संभवनाथ व मल्लीनाथजी स्थापित हुए| ध्वजा शा. केवलचंदजी भूताजी बांकली निवासी चढाते है|

 गुरुदेव का आगमन : सं २००५ में दीक्षा दानेश्वरी पू. आ. श्री गुणरत्नसूरीजी आ. ठा. सहित विहार करते हुए छात्रावास पधारे| यहां के विशाल प्रागंण का निरिशन कर, यहां भगवान महावीर के सिधांतो पर आधारित आर्ट गैलरी, जिसमे जैन दर्शन का प्रदशन हो, का निर्माण करने की भावना ट्रस्ट मंडल के समक्ष रखी| साथ ही प्रभु महावीर की विशाल प्रतिमा जिनमंदिर में निर्माण करने का आग्रह रखा| गुरुदेव के आग्रह को धयान में लेते हुए ट्रस्ट मंडल ने स्वीकृति दी और जयपुर की एक खानसे विशाल शिला प्राप्त कर छात्रवास लाकर प्रतिमा गढ़ने का काम शिल्पियो ने प्रारंभ किया| गिआन तीर्थ खनन वि.सं. २०६६१, जेठ वादी-३, शुक्रवार, दी. २४.६.२००५ एवं शिलान्यास दी. २५.६.२००५ को हुआ| पंच कलयानक मंदिर शिलान्यास सोमवार दी. १२.7.२००७ को संपन्न हुआ था |आ. श्री गुणरत्नसूरीजी ने चल प्रतिष्ठा द्वारा प्रतिमा को वि.सं. २०६६, मगसर वदी १०, रविवार दी. २७.९.२००९ को शुभ मुहर्त में स्थापित की |

श्री अभिनव महावीर धाम :विश्व की सबसे बड़ी सपरिकर, पद्मासनयूक्त, मनमोहक विशाल २९.२५ फुट (३५१ इंची) की प्रभु महावीर की मूर्ति को पंचकलयानक् धाम की उंचाई ५४ फीट तथा गोलाई 30 फीट के अष्टकोनीय आकार से बनाया गया है|

पंच कलयानक प्रदशन, लक्षबोधीखंड, नवकार खंड, महावीर खंड, चारित्र खंड के साथ-साथ ऑडिटोरियम, जिसमे भक्तामर तथा गणधरवाद की रचना ओटोमेशन द्वारा अनिमेट्रोनिक्स पद्धित से दर्शाया गया है|लगभग २ लाख़ वर्फूत में तैयार होने वाले संकूल में जैनशासन के अनेक विषयो पर आधारित दर्शन होगे|

प्रतिष्ठा : प्रभु महावीर की विराट प्रतिमा(सपरिकर २९.२५ फीट ऊँची) से मंडित छ: आर्ट गैलरिया एवं ४ ऑडिटोरियम से सुशोभित विश्व में अपनी सानी का अनूठा गिआन तीर्थ ” श्री अभिनव महावीरधाम” में भव्य अंजनशलाका प्रतिष्ठा एवं गिआन तीर्थ का उद्घाटन, वीर नि.सं. २५३९, शाके १९३४, वि.सं. २०३९, वैशाख वदी १०, शनिवार को दी. ४.५.२०१३ को प्रेरणादाता पूजयपाद ३२१ दीक्षा दानेश्वरी आ. भ. गुणरत्नसूरीजी (आचार्यपद-रजत वर्ष), आ. श्री पूणयरत्नसूरीजी, आ. श्री यशोरत्नसूरीजी एवं मार्ग’दर्शक आ. श्री रश्मीनरत्नसूरीजी आया. ठा. व चतुर्विध संघ की उपस्थिति में आनंदमय वातावरण में संपन्न हुई| यहां विशाल ग्रंथालय भी है| “जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” के अनुसार –

१ . पुराने सुमेरपुर में घर देरासर प्रभु श्री पार्श्वनाथजी सह धातु की ३ प्रतिमाए श्री संघ द्वारा वि.सं. १९६२ में निर्मित की गई थी| इसका वहीवट रायचंद-मोतीचंद करते थे| जैनों के २० घर तथा एक उपाश्रय था|

२ . नया सुमेरपुर के देरासर वास के घर मंदिर में मू. श्री वासुपूजयस्वामी सह पाषाण ३ व धातु की 4 प्रतिमा श्री संघ द्वारा सं. १९७५ में निर्मित हुई| जैनों की संख्या ६००, एक उपाश्रय और एक धर्मशाला थी| 

३ . मोदियो की वास में घर मंदिर में मू. श्री कुंथुनाथजी और ३ धातु की प्रतिमा श्री संघ द्वारा सं. १९९५ में निर्मित हुई|

४ . प्राचीन मंदिर में सं. १९९८ में घर मंदिर में श्री शांतिनाथजी और 1 धातु प्रतिमा स्थापित थी|

सुमेरपुर की प्राचीनता : श्री यतींद्र विहार-दिग्दर्शन भाग २ (सं. १९८७) (पुष्ठ क्र. ८४-८४) के अनुसार सुमेरपुर क़स्बा सं. १९३८ में नया बसा है| उन दिनों जैनों की २५ दुकाने थी, जो मारवाड़ के अलग-अलग गावो से व्यापार निमित्त आकर बसी है| यहां एक धर्मशाला और उसी के पास एक गृह मंदिर है, जिसमे धातुमय एक छ: अंगुल की प्रतिमा और दो पंचतीर्थीया है, जिनके लेख इस प्रकार है –

१ . संवत् १५१५, फाल्गुन सुदी ८, शनिवार को संघवी देवराज ने श्री विमलनाथ स्वामी का बिंब कराया और प्रतिष्ठा तपा. श्री धर्मसूरीजी ने की | २. संवत् १५५५, वैशाख सुदी ३ को आमलेसार निवासी सेठ चामपक ने श्री नेमिनाथजी का बिंब कराया और प्रतिष्ठा तपा. श्री हेमविमलसूरीजी ने की |३. संवत् १५१९, वैशाख वादी -५, शनिवार को भृगुकच्छ निवासी ठ. हरराज ने श्री कुंथु’नाथ की चौबीसी का पट्ट कराया, जो श्री देवरत्नसूरीजी के उपदेश से…|

श्री वासुपूजय स्वामी मंदिर : सुमेरपुर भेरू चौक स्थित हवाला गली में भव्य-दीव्य ऊँची चौकी पर स्थित त्रिशिखरबद्ध जिन मंदिर में १२वे तीर्थंकर श्री वासुपूजय स्वामीजी की सुंदर प्रतिमा स्थापित है| पास ही शांतिभवन, विशाल अतिथि भवन आदि का निर्माण हुआ है| वीर नि.सं. २४७५, शाके १८७९, वि.सं. २००५ के माघ शु. ५, वसंत पंचमी (फ़रवरी-१९४९) को मू. श्री हीरमुनिजी, सुन्दर मुनिजी आ. ठा. के हाथो प्रतिष्ठा हुई है| इसी समूदाय के, हरिषेण मुनिजी का स्वास्थ्य ठीक न होने से वे वि.सं. २०३६ से सुमेरपुर में स्थिर हो गए | वि.सं. २०४७ वैशाख सुदी, २५/२६ अप्रैल १९९१ को उनका यहां स्वर्गवास हुआ|

श्री जीरावाला पार्श्वनाथजी मंदिर :

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सुमेरपुर के उपनगर के श्रीपालनगर में श्वेतपाषण से निर्मित घुमरबद्ध जिन प्रसाद में कलात्मक छतरी में मू. श्री जीरावाला पर्श्वनाथादी जिनबिंबो की अंजनशलाका प्रतिष्ठा वीर नि.सं. २५२८, शाके १९२३, वि.सं. २०५८, माघ शु. ६, सोमवार, दी. १८.२.२००२ को प्रतिष्ठाचार्य श्री पद्मसूरीजी के वरद हस्ते संपन्न हुई |

पास ही में गुरदेव श्री राजेंद्रसूरीजी का गुरु मंदिर निर्माणधीन है, जिसका शिलान्यास हाल ही में मू. श्री ऋषभचंद्र विजयजी द्वारा संपन्न हुआ था|

श्री महावीर हॉस्पिटल मंदिर :

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भगवान  महावीर के २५०० वे निर्माण मोहत्सव की स्मृति में, राजस्थान मेडिकल सोसायटी एवं रिसर्च सेण्टर-सुमेरपुर नामक संस्था कीस्थापना करके ट्रस्ट ने प्रथम २५० बीघा जमीन क्रय है| बाड़मेर निवासी श्री रतनचंदजी रांका, बीसलपुर के श्री राजमलजी जैन, श्री मोहनलालजी जैन- बाली, श्री एस.एम.  बाफना-भीनमाल आदि महानुभावो ने काम को गति प्रदान की और वि.सं. २०३४ माह सुदी दी. १७ फ़रवरी १९७८ को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री नीलम संजीव रेड्डी के करकमलों से अस्पताल के विशाल भवन का शिलान्यास एवं वि.सं. २०४३ के आषाढ़ शुक्ल, दी. ५ जूलाई १९८७ को १०८ शययायूक्त आधुनिक अस्पताल का भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री गिआनी जैल सिंघजी के करकमलों से उदघाटन संपन्न हुआ |

यहां पर रहने के लिए धर्मशाला, भोजनशाला एवं उपाश्रय आदि सुविधाए उपलब्ध है| इलाज हेतु आने वाले दर्दियो एवं अनेक साथ आने वाले श्रावको तथा साधु-साध्वियो के दर्शन-पूजन के लिए शिवगंज (राज.) निवासी श्री पूनमचंदजी जसराजजी पालरेचा के सहयोग से निर्मित शिखरबद्ध जिनमंदिर का खनन व शिलास्थापन सं. २०४९, मार्गशीर्ष कृष्ण ३, शुक्रवार दी. १३.११.१९९२ को किया गया|

सुमेरपुर-जवाईबाँध रोड पर ५ कि.मी. की दुरी पर स्थित, महावीर नगर हॉस्पिटल के प्रागंण में जिनमंदिर की प्रतिष्ठा नीति समूदायवर्ती आ. श्री पद्मसूरीजी आ. ठा. ५ एवं गोडवाड़ दीपिका सा. श्री ललितप्रभाश्रीजी (लेहरो म.) आ. ठा. ७५ की निश्रा में वीर नि.सं. २५२१, वि.सं. २०५१, मार्गशीर्ष शु. ६, गुरूवार दी. ८.१२.१९९४ को मुलनायक श्री महावीर स्वामीजी, शंकेश्वर पार्श्वनाथ, नाकोडा पर्श्वनाथादी जिनबिंबो, अधिष्ठायकदेव-देवियो, यक्ष-यक्षनियो आदि प्रतिमाओं की अंजनशलाका प्रतिष्ठा संपन्न हुई |

श्री वासुपूजय स्वामीजी चौमुखा मंदिर :

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नेशनल हाईवे क्र. १४ पर, उन्दरी नगर के पुराने बस स्टैंड के ठीक सामने गली के नुक्कड़ पर, मुनिभूषण श्री वल्लभदत्त विजयजी (फक्कड़ म.) की प्रेरणा से निर्मित, शिखरबद्ध जिनचैतय में प्रथम मंजिल पर कमलाकर छतरी में, मुलनायक १२वे तीर्थंकर श्री वासुपूजय स्वामी की चौमुखी चार सुन्दर प्रतिमाओं की अंजनशलाका प्रतिष्ठा. वि.सं. २०४० वैशाख शुक्ल ५, रविवार, दी. ६ मई १९८४ को, आग्लाड तीर्थोद्वारक शासनरत्न आ, श्री आनंदघनसूरीजी आ. ठा. की पावन निश्रा में संपन्न हुई |

इन चौमुखी प्रतिमाओं की  अंजनशलाका वीर नि.सं. २५०८, शाके १९०३, वि.सं. २०३८, माघ  शु. १४, रवि पुशे, फ़रवरी १९८२ को नाकोडा तिर्थोद्वारक आ. श्री हिमाचलसूरी पर संपन्न हुई थी| वि.सं. २०३३ माघ मासे दी. १७ फ़रवरी १९७७ को संपन्न हुआ था|

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श्री वासुपूजय स्वामी जिनालय की २५वि वर्षगाठ (रजत जयअंती मोहत्सव) के अवसर पर, नूतन श्री मुनिसुव्रत स्वामी भगवान की प्रतिमा प्रवेश के अनुमोदनार्थ अष्टहिनका मोहत्सव पू. आ. श्री पद्मसागरसूरीजी के वयोवृद्ध शिष्य मू. श्री जिनेंद्रसागरजी आ. ठा. ३ की निश्रा में २५वि ध्वजारोहण वि.सं. २०६५, विअशाख सुदी ५, बुधवार, दी. २९.4.२००९ को संपन्न हुआ तथा प्रतिमा प्रवेश दी. ३०.४.२००९ को हुआ| “जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” ग्रंथ के अनुसार, श्री संघ ने सं. १९६२ में घर मंदिर में, श्री महावीर स्वामी सह पाषाण की २ और धातु की एक प्रतिमा स्थापित की थी| तब यहां ७५ जैन, 1 उपाश्रय तथा 1 धर्मशाला थी|

श्री यतींद्र विहार दिग्दर्शन भाग-२ (सं. १९८७) : यहां उन्दरि में एक छोटी सी धर्मशाला के पास एक गृह मंदिर में मुलनायक श्री पार्श्वनाथजी की पाषाणमय २० अंगुल प्रमाण श्वेतवर्णी की तीन प्रतिमाए स्थापित है, जिनकी वि.सं. १९५५, फा. व .५, गुरूवार के दिन, जैनाचार्य श्री राजेंद्रसूरी के हस्ते आहोर ५२ जिनालय प्रतिष्ठोत्सव पर अंजनशलाका प्रतिष्ठा हुई है| उन दिनों यहां जैनों के १५ घर थे|

यहां अनेक सामाजिक संस्थाए कार्यरत है| भारत विकास परिषद, महावीर इंटरनेशनल आदि, अनाज मंडी व अधौगिक नगरी  होने से यहां आधुनिक हर सुविधा उपलब्ध है| स्कूल-कॉलेज, महावीर हॉस्पिटल, हर बड़े बैंक की शाखा, पुलिस थाना, दूरसंचार आदि सभी, जवाईबांध (१२ की.मी. दूर) से सिंचाई व्यवस्था होती है| २ की.मी. दूर शिवगंज शहर में भी हर सुविधा है|