Sirohi

अरावली की सिरणवा नामक पर्वतमाला के आँचल में बसने से मक्षर का नाम सिरोही पड़ा| सीर+रूही = तलवार (अर्तार्थ सीर को काटने वाली) सिरोही तलवार का पर्याय है| यहाँ की तलवार कटार और शमशीर प्रसिद्ध रही है| सन १३११ में सर्व प्रथम देवड़ा चौहान राव लुम्भाजी ने अपना राज्य स्थापित किया व वे यहाँ के राजा बने| सन १३२० में राव सहस्त्रमल को अक्षय तृतीया के दिन सिरोही दुर्ग का निर्माण कार्य प्रारंभ किया किंतु उनके पुत्र राव लाखा ने दुर्ग का कार्य पूर्ण करवाया था| राजा सहस्त्रमल से लेकर अंतिम राजा अभयसिंहजी तक कुल २८ राजा हुए| परंतु महाराव सुरताण अत्यंत विख्यात हुए| अपने ५१ वर्ष के शासनकाल में ५२ लड़ाइयाँ लड़ी जिसमे सन १५८३ का दताणी खेत युद्ध इसलिए प्रसिद्द हुआ की उस युद्ध में मुग़ल सेना को हराया|

 

VIJAY-PATAKA mandir

श्री विजय पताका पार्श्वनाथ प्रभु

VIJAY-PATAKA-mulnayak

वर्तमान सार्वजनिक चिकित्सालय की नींव २१ दिसंबर १८९६ को रखी गई व १९२७ में बिजलीघर का निर्वाण हुआ|सन १८९९ में भीष्ण अकाल पड़ा जिसका सामना सिरोहीवासियों ने बड़े धेर्य ओर हिम्मत से किया|

सिरोही में अपने जैनों के करीब १५०० घर है| यहाँ संस्कृति और शूरवीरता का उत्तम सामंजस्य रहा है| यहाँ का इतिहास अत्यंत गौरवपूर्ण रहा है| इस क्षेत्र में आबू देलवाडा के जैन मंदिर विश्व विख्यात है| सिरोही शहर में कुल २५ जैन मंदिर है जिनमें से १४ मंदिर एक ही गली में एक कतार में है| जो अपने आप में एक इतिहास समेटे हुए है|एक ही गली में इतने सुंदर जैन मंदिर एक साथ होने के कारण अर्द्ध शत्रुंजय के नाम से अलंकृत किया गया है| यहाँ के राजा एवं रानियों को जैन मंदिर के प्रति अटूट श्रद्धा थी| जैन मंदिरों में दर्शनार्थ आया करते थे| श्री आदेश्वरजी मंदिर की प्रतिष्ठा सिरोही स्थापना से पहले विक्रम सं. १९३९ आषाढ़ शुक्ल ३ मंगलवार को हुयी थी |

1-Adeshwar-ji mandir

श्री आदेश्वर मंदिर

2-Adeshwar-ji mulnayak

सिरोही की स्थापना विक्रम सं. १४६० ई. सं. १४०३ में सिरवणा के पूर्वी ढाल खोबा में महाराज शिवभाण शोभाजी ने की थी| उन्होंने विक्रम सं. १४७५ में थूमब की वाडी श्री जैन संघ सिरोही को अर्पित की थी जिसके शिलालेख में इस प्रकार अंकित है| वर्तमान सिरोही की स्थापना विक्रम सं. १४८२ वैशाख सूद २, गुरुवार को महाराज सहस्त्रमल ने सीरवणा की पश्चिम ढाल पर की थी|

3-NAMI-NATH-JI1 mandir

श्री नमिनाथजी मंदिर

4-NAMI-NATH-JI mulnayak

सिरोही के आसपास कलात्मक जैन मंदिर एवं तीर्थस्थान है| जैसे की मीरपुर, पावापूरी, बामनवाडजी, नांदिया, वरमाण. जीरावाला, जखोड़ा, सुमेरपुर के पास पहाडियों में है| सिरोही रोड जाने वाली सड़क के दायी ओर महाराजा स्वरुपसिंहजी के समय से निर्मित तीनमंजिला सुन्दर महल स्वरुपविलास है| रामपुर मार्ग पर वर्तमान राजघरानें का निवास केसर विलास केसरीसिंहजी ने बनवाया था| सिरोही शहर का शीर्ष स्थल राजमहल सीरवणा पर्वतमाला की गोद में स्तिथ है|

5-sambhaw-nath-ji mandir

श्री संभवनाथजी मंदिर

6-sambhaw-nath-ji mulnayak

सिरोही में कई प्राचीन ऐतिहासिक बावड़ियां बनी हुई है उसमें खारी बावड़ी जो १३वि सदी की है| दूसरी अन्य बावडियों में रतनवाव, चम्पावाव, झालरावाव, सरजावाव, छगवाव आदि करीब २५० वर्षों से भी अधीक पुरानी है| सारनेश्वर दरवाजे के बाहर निरोड़ा तालाब के पास से मात्रुमाता एवी मंदिर जाने का पर्वतीय रास्ता है|

8-shanti-nath-ji temple

श्री शांतिनाथजी मंदिर

7-shanti-nath-ji mulnayak

यहाँ के महाराजा उम्मेदसिंहजी ने सन १८६३ में राज्य भर में सती प्रथा बंद करवायी और सन १८६६ में सिरोही में दीवानी तथा फ़ौजदारी अदालते स्थापित की| महाराज शिवसिंहजी ने अंग्रेजों साथ संधि की थी व उनका एक पॉलिटिकल एजेंट लगाया|चौधरी लेन स्तिथ सिरोही की स्थापना का साक्षी पत्थर जिसे महावत सहस्त्रमल ने लगा कर सिरोही की स्थापना की थी, वर्तमान में उसे शीशाजी के रूप में पूजा जाता है|

AMBESHWAR-JI-1 mandir

श्री अम्बेश्वर मंदिर

 

सिरोही क्षेत्र की बाली मारवाड़ी, मेवाड़ी, गुजराती का मिश्रण है| यहाँ के मेले, तीज त्यौहार, गणगौर, काका काजरा, गरबा, नृत्य के समारोह व अन्य त्योहार यहाँ की संस्कृति की विशिष्ट पहचान है| उसके अतिरिक्त होली, दीपावली, दशहरा, राखी, पर्युषण महापर्व इत्यादि बड़े हर्षोल्लास से मनाए जाते है| मेलों शादी-विवाह वीर पुरुषों एतिहासिक पात्रों से संबंधित पहाड़ों से उतरते हुए मधुर स्वरों में लोकगीत भी गाए जाते है| गुजरात के नजदीक स्तिथ होने से खान पान, वेशभूषा एवं बोली पर कुछ गुजराती प्रभाव भी देखने को मिलता है|