Sewadi

सेवाड़ी

” समीपाटी, सीमापाटी, शतवापिका, 

शतवाटिका, सिव्वाडी, श्रीवाड़ी, सेवन्ती नगरी”

राजस्थान के गोडवाड़ शेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर सांडेराव से वाया फालना रेलवेस्टेशन तथा बाली हेतु हुए 30 की.मी. दूर आडावाला (अरावली) पर्वत की तलहेटी में शैलबाला मीठडी नदी के किनारे बसे सेवाड़ी नगर के मध्य भाग के बाजार में भव्य सौधशिखरी बावन जिनालय में २३०० वर्ष प्राचीन मुलनायक श्री शांतिनाथ भगवान की पद्मासनस्थ, श्वेतवर्णी, १२७ सें.मी. (५४ इंची) ऊँची आकर्षक प्रतिमा प्रतिष्ठित है|

इस नगरी को प्राचीन काल में समीपाटी, श्वेतपाटी, श्वेतवाटिका, समीवाड़ी, शतवाटिका, श्रीवाडी,सिव्वाडी कहते थे, जो अपभ्रंश होत्र-होत्र सेवाड़ी हो गया|

मंदिर में पाषाण की ५४ व धातु की २  प्राचीन प्रतिमाए प्रतिष्ठितहै|वर्तमान में कूल ८४ प्रतिमाए प्रतिष्ठित है|

प्राचीनता : सेवाड़ी की प्राचीनता के संबंध में यहां के वि.सं. ११३७ व ११७२ के शिलालेख व अन्य पांच शिलालेख, जो इस मंदिर में उत्कीर्ण है, एतिहासिक महत्त्व के है| इन्ही शिलालेखों से प्राचीन नामो, तिथियो, संवत् आदि का पता लगता है|वि.सं. ११७२ के शिलालेख में भगवान श्री शांतिनाथ की स्तुति की गई है. मगर मुलनायक श्री महावीर स्वामी के रहने का उल्लेख शिलालेख से प्राप्त होता है| शिलालेख के अनुसार यहां अणहिल्ल नामक राजा हुआ| उन्ही के वंशज जिन्दराज पुत्र अश्वराज व उसके पुत्र कटुट राजा की जागीरदारी में “समीपाटीपत्तन” (सेवाड़ी) में स्वर्ण की उपमा वाले भगवानश्री महावीर स्वामी के मंदिर का उल्लेख है –

“तदभुक्तो पत्तनं रम्य शमीपाटी तीनामंक-तत्रास्ति वीर्नाथसय चैत्य स्वर्ण समोपमं ” ||

साथ ही वे श्री संडेरकगच्छीय सदगुणी अनुयाईयो पर उपकार करने में कटीबद्ध रहते थे तथा सेनानयक यशोदेव द्वारा प्रतिमा की पूजा के लिए ८ द्रम (तत्कालीन मुद्रा) प्रतिवर्ष दान देने का भी उल्लेख है|

दुसरे लेख के अनुसार, संवत् ११३७ चैत्र सुदी 1 के दिन, भमती में श्री धर्मनाथ की पूजा हेतु तीसरे लेख में संवत् ११९८ आसोज सुदी १२ रविवार के दिन भगवान अरिष्ठनेमी की पूर्व दिशा में कोठरी के आगे भीत बही कराने का उल्लेख है| चौथे लेख में सं. १२१३, चैत्र वादी ८, सोमवार के दिन सेवाड़ी ग़ाव के महाजन महणा के पुत्र जिनढाक द्वारा श्री महावीर मंदिर की भमती में स्थापित पार्श्वनाथ की पूजा हेतु प्रतिवर्ष १२ रूपए दान देने का उल्लेख है| पांचवे लेख में सं. १२५१ , कार्तिक सुदी 1, रविवार के दिन यहां के रहने वाले लोगो द्वारापने गुरु श्री शालीभद्राचार्य की मूर्ति की पूजा आ. श्री सुमतिसूरीजी को दान देने का उल्लेख है|इन पांचो लेखो से मंदिर के करीबन १००० वर्ष प्राचीन होने का उल्लेख मिलता है|

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वीर सं. २४८४, वि.सं. २०१४, फाल्गुन सुदी ३, शुक्रवार को जिणोरद्वारित प्रतिष्ठा पं. मंगल विजयजी ने संपन्न करवाई | श्री शांतिनाथ भगवान मुलनायक हुए और प्राचीन मुलनायक श्री महावीर स्वामी को रंगमंडप में बाई तरफ प्रतिष्ठित किया गया| इस मंदिर की देव्कुलिकाओ की प्रतिमाए १३ वि शताब्दी की प्रतीत होती है, जिन पर कोई लेख नहीं है |सभी संप्रतिकालीन प्रतीत होती है| भमती में मुलनायक श्री मुनिसुव्रत स्वामी की भव्य शयाम प्रतिमा, संप्रति राजा के समय की है| इसके आलावा अमंदिर के स्तंभों पर सं. १२५४, १२५६,११४० आदि लेख उत्कीर्ण है|बावन जिनालय मंदिर के गंभारे पर, मध्य में अलंकार व वस्त्र सहित कारोत्सर्ग वाली प्रतिमा और कोई न होकर जीवित स्वामी महावीर की है| वर्तमान में यह मूर्ति शिखर के पिचले भाग में देवकुलिका के बाहर विराजमान की गई है| राजस्थान में प्राय: इस प्रकार की दुर्लभ प्रतिमाए अन्य जगहों पर देखने में नहीं आई |

गर्भ गृह की त्रिशिखरी द्वार-चौखट गूढ़ मंडप के नमूने की है|इसका रूप स्तंभ भी १६ विधा देवियो तथा यक्षनियो की प्रतिमाओं से अलंकृत है| रोहिणी, वज्रांकुसी, गांधारी, वैराटया, अच्छुयता, प्रागती, महामानसी की पहचान स्पष्ट है| द्वार के दोनों ओर कुबेर यक्ष की मूर्ति भी स्पष्ट  दृष्टीगोचर होती है| गंभारे में ही गजलक्ष्मी की मूर्ति, जिसमे हाथियो द्वारा भगवती लक्ष्मी का अभिषेक करवाया जाना बतलाया गया है ,अपने आप में अधितीय नमूना है| समरांगण सूत्रधार वास्तुधार के अनुसार, जिस मंदिर में पूर्वाभिमुख गजलक्ष्मी का अंकन हो, वह ग़ाव धन-धान्य व सुख-समृधि से भरपूर पाया जाता है|

प्राचीन मुलनायक महावीर स्वामी, मुलनायक शांतिनाथ प्रभु वव पद्मप्रभु के परिकर कलात्मक व शोभायमान है| गूढ़ मंडप में संडेरकगच्छीय आचार्य श्री यशोभद्रसूरीजी की परंपरा के आचार्य गुणरत्नसूरीजी की अतयन्त कलात्मक व दर्शनीय प्रतिमा है, जिस पर वि.सं. १२४४, माघ शु. प्रतिपदा, रविवार का लेख उत्कीर्ण है| इस प्रतिमा पर तीर्थंकर की प्रतिमा अंकित है, पीठ के पीछे रजोहरण, एक हाथ धर्मलाभ की मुद्रा में व पाँव पाट से लटका हुआ है, जिसके निचे श्रावक बैठे है| सांडेराव व रातामहावीरजी में गुरु प्रतिमाओं में कला व विशालता की दृष्टी से सेवाड़ी की गुरु मूर्ति विशेष दर्शनीय है|

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सेवाड़ी से संबंधित यूवराज श्री सामंत सिंह के वि.सं. १२३८ के तरामपत्र में समिपाटी के अनिल विहार में भगवान पार्श्वनाथ के चैतय का होना अंकित है| इस चैतय की खोज के अंतगर्त, ग़ाव से २कि.मी. दूर कटेरगढ़ के दुर्ग में कुछ जैन मंदिर के भग्नावशेष प्राप्त हुए है, जिससे वह जैन मंदिर के होने की पुष्टि होती है| यहां यदी राजय के पुरातत्व विभाग उत्खनन का काम करवाए तो सेवाड़ी के प्राचीन इतिहास के साक्षय उपलब्ध हो सकते है| वर्तमान में यह ताम्रपत्र महावीर कक्ष राजकीय संग्रहलय जोधपुर में विधमान है| अकबर प्रतिबोधक जगतगुरु आ. श्री हीरसूरीजी की  चरण रज से यह भूमि पावन बनी है| बावन जिनालय की एक देहरी में इनके चरण चिन्ह स्थापित है|

सरस्वती प्रतिमाए : मंदिर के प्रवेशद्वार के पास २ गोखले में, एक ही सांचे और कलात्मक हाथो से तराशी हुई सरस्वती की २ प्रतिमाए कड़ी है, जो संभवतया ११वि सदी के अंत की है| देहरी नं. ४७ के पास गोखले में प्रतिमा चतुर्भुज है| इस मूर्ति की लम्भाई ४९ इंच व चौड़ाई २१ इंच है और देहरी सं. ३ के पास ही गोखले में दूसरी सरस्वती की मूर्ति अवस्थित है, जिसकी लंबाई ३९ इंच व चौड़ाई २१ इंच है| तीसरी सरस्वती मूर्ति देहरी सं. २८ के पास २७ इंच लंबी व ११ इंच चौड़ी उपकरणों सहित है| पहली दोनों प्राचीन अत्यन्त कलात्मक व प्रभावशाली है| 

श्री वासुपूजय स्वामी मंदिर :

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ग़ाव के बाहर पश्चिम में प्राचीन जैतलबाव के पास वासुपूजय वाटिका में वि.सं. १९८२, जेष्ठ शुक्ल १२, गुरूवार को यती श्री प्रतापरत्न विजयजी ने एक हाथ बड़ी श्वेतवर्णी मुलनायक श्री वासुपूजय स्वामी को प्रतिष्ठित किया| इसी मुहर्त में बावन जिनालय में छ: देहरियो में भी प्रतिष्ठा संपन्न हुई| कहते है की “यतीजी” बड़े चमत्कारी थे| उनके उपाश्रय में सुनहरी चित्रकारी से अनेक अंत्र तथा भगवान की विभिन्न लीलाए चित्रित थी| वह प्राचीनं उपाश्रय अब ध्वंस हो गया है| मंदिर शिलालेख से पता चलता है की वीर नि. सं. २४८४, वि.सं. २०१४, फाल्गुण शुक्ल ३, शुक्रवार कुंभ लग्ने शुभ मुहर्त में बावन जिनालय प्रतिष्ठा समय श्रेयस्कर शुद्धी हेतु श्री वासुपूजय स्वामी जिनबिंब की पुन: प्रतिष्ठा, श्री रेवताचल तीर्थोध्वरक श्री नीतिसूरीजी पाटे श्री हर्षसूरीजी के शिष्य पं. श्री मंगलविजयजी गनिवरय के हस्ते संपन्न हुई| मंदिर में शत्रुंजय व गिरनार की रचना के अतिरिक्त एक समवसरण में चतुर्भुज प्रतिमाए विराजमान है| मंदिर के दाए भाग में आरास पाषान की छत्री में भगवान श्री ऋषभदेवजी के चरण यूगल स्थापित है| इसमें गौतम स्वामी आदि ९ प्रतिमाए नै स्थापित है| 

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सेवाड़ी में वि.सं. २०२९ में माकन की खुदाई के समय, भगवान शांतिनाथ, भगवती सरस्वती व जैन अम्बिकदेवी की , १२वि सदी की प्राचीन मुर्तिया भी प्राप्त हुई, जो इस शेत्र के प्राचीन होने के प्रमाण है| किसी समय यह नगर अत्यन्त समृद्धशाली रहा होगा, इसका उल्लेख निम्न दोहे से पता चलता है –

“सेवाड़ी सौ बावड़ी, रूडी जैतलवाव,

खाणडी पीपर पारने, हींचे शेतलपाल|”

यहां सौ बावडिया से इस नगर का एक नाम “शतवाटिका” पड़ा था| विशाल जैतलवाव आज भी विधमान है| पास ही जैन दादावाडी है|

श्री मणिभद्रजी मंदिर : पहले मणिभद्रजी जहां विराजमान थे वह प्राचीन उपाश्रय था, जिसमे वनस्पति रंगों से जैन धर्म से संबंधित कलाकृतिया देवरों पर चित्रित की गई थी तथा कई जगह सोने का उपयोग भी किया गया था| वे सब कलाकृतिया दुर्लक्षित से आज नष्ट हो गई है| उपाश्रय की जगह पर श्वेत पाषाण से मंदिर का निर्माण करवाकर वि.सं. २०५५ जेष्ठ वदी ६ शुक्रवार को वल्लभ सामुदायवर्ती आ. श्री धर्मधुरंधरसूरीजी आ. ठा. की निश्रा में प्रतिष्ठा संपन्न हुई| राणकपुर तीर्थ निर्माण में सेवाड़ी एवं सोनाणा का पत्थर उपयोग हुआ है|

श्री सुसवाणी माता मंदिर : सुराणा गोत्र की कुलदेवी श्री सुसवाणी माता ने ११वि सदी में आ. श्री धर्मघोषसूरीजी से प्रतिबोध पाकर पशु बलि को त्यागकर नैवेध व श्री फल का भोग स्वीकार | माँ आंबे ने अपने वचनानुसार नौगोर के सेठ सतीदास जी के घर वि.सं. १२१९ में आसोज सुदी २, सोमवार को पुत्री के रूप में जन्म लिया |पुत्री का नाम सुसवाणी रखा| दस वर्ष की उम्र में नौगोर के मुसलमान सूबेदार ने आपको रूप सौंदर्य पर मंत्रमुग्ध होकर विवाह करना चाहा | 

संपूर्ण परिवार इस बात से दुखी हो गया |आपने संकट की घडी में अरिहंत प्रभु का स्मरण किया| स्वप्न में तेजस्वी मूर्ति ने आपका योगय मार्गदर्शन किया| सुबेदार से शर्त तय हुई की सुसवाणी सात पावड़ा आगे दौड़ और तुम उसे अगर पकड़ सके तो शादी होगी| तय शर्त अनुसार सुसवानी दौड़ने लगी, मगर थोडा देर में थकने लगी तो सुसवाणी की प्राथना पर अधिष्ठात्रि देवी ने सिंह की सवारी भेजी| सिंह पर बैठकर आप बीकानेर के पास मोरखाना के शिवमंदिर पहुची और भगवान शंकर से छुपाने की मदद मांगी| प्रभु ने दर्शन देकर कहा की सीधी चली जा और जहां मेरा चिमटा गिरे वाही तेरा स्थान होगा| चिमटा एक कैर के वृक्ष पर गिरा, जिससे कैर का वृक्ष और वहा की जमीन फट गई| सुसवाणी सिंह समेत उसमे सम गई| जमीन पुन: समताल हो गई | उसी जगह पर बाद में मंदिर का निर्माण हुआ|

सेवाड़ी निवासी सुराणा गोत्रीय परिवारों ने स्वद्रव्य से कलात्मक श्वेत पाषाण से मंदिर का निर्माण करवाकर पंजाब केसरी वल्लभ समूदायवर्ती पू. पं. श्री चिदानंदविजयजी आ. था. के वरदहस्ते वि.सं. २०६६, जेष्ठ वदी १०, सोमवार, दी. 7.६.२०१० को कूलदेवी ससवाणी माताजी, श्री नाकोडा भैरवजी आदि प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा संपन्न करवाई | मुनि की प्रेरणा से मंदिरों में श्री माताजी की प्रतिमा ऊपर “श्री पार्श्वनाथ प्रभु” की ११ इंची प्रतिमा दर्शनीय स्थापित की गई|

सेवाड़ी : यहां वर्तमान में जैन संघ की ७३९ घर ओली है और ३००० के करीब जैनों की तथा कूल १८००० से भी ज्यादा जनसंख्या का बड़ा नगर है| सोनाणा खेतमलजी का मुखय स्थान है| मीठडी नदी पर सेवाड़ी मीठडी बाँध है| १२वि तक शिक्षा, हॉस्पिटल, ग्रामीण बैंक, दूरसंचार, पशु चिकित्सालय आदि सभी सुविधाए उपलब्ध है | खेतमलजी ट्रस्ट, सुराणा ट्रस्ट, लोहरासाजन ट्रस्ट आदि श्री संघ की सहयोगी संस्थाए है| ग़ाव से एक की.मी. दूर श्री शांतिदर्शन जैन विशाल गौशाला में मूक पशुओ की सुन्दर व्यवस्था अतुलनीय है| १० की.मी. दूर रातामहावीर तीर्थ, सेसली व भद्रंकरनगर लुणावा समीप के प्रसीद्ध तीर्थ है| ३०० मंदिरों के प्रतिष्ठाचार्य पद्मसूरीजी को यही वि.सं. २०३२ मार्गशीर्ष शु. बुधवार को “गनीपंणयास” पद प्रदान हुआ था| आ. श्री जम्बूसूरीजी का सं. २०२६ में चातुर्मास हुआ| वि.सं. १९८५ में श्री वीर समाज जैन स्वअमसेवक मंडल की स्थापना हुई| इन्ही से पुस्तकालय का संचालन होता है| सुसवाणी माता, सोमनाथ महादेव आदि अन्य प्रसिद्द मंदिर है| दिसंबर २००७ में श्री शांतिनाथ बावन जिनालय व वासुपूजय मंदिर का स्वर्ण जयअंती मोहत्सव धूमधाम से मनया गया|

“गोडवाड़-९९ यात्रा संघ” एवं इस निमित्त प्रकाशित इस ग्रंथ “श्री गोडवाड़ ९९ की गौरव गाथा” के मुखय संघपति व लाभार्थी ,श्रीमती रतनबाई ताराचंदजी परमार, पुत्र- कांतिलाल, नरेशकुमार, महेंद्र’कुमार एवं समस्त परमार परिवार इसी गरिमामय प्राचीन नगर के निवासी है| यह एक उल्लेखनीय बात है|