Shree Sambhavnath Jain Temple

श्री संभवनाथ जैन मंदिर, वेपेरी

 

असंभव को संभव करणार दादा सम्भवनाथ की छात्र छाया में कई जैन-जैनत्तर परिवार यहाँ वेपेरी में आवासित है| यह क्षेत्र अपनी एक महत्त्वपूर्ण व महत्वाकांक्षी धर्म-वैभवयुक्त विरासत को संजोय है| इस समृद्धशाली क्षेत्र को आजकल मिनी वालकेश्वर (मुंबई) की भी ख्याति प्राप्त हुई है| चेन्नई सेंट्रल से २ की.मी. की दुरी पर बसा यह अभिजात्य क्षेत्र अपनी अनेक उपलब्धियों के लिए सुविख्यात और समृद्धशाली धर्मपरायण शेष्टिवर्यों का गढ़ बना हुआ है| लाखों की तादाद में यहाँ जैन मारवाड़ी,गुजराती,माहेश्वरी,अग्रवाल समाज के लोगों का आवास स्थल तथा व्यापारिक संस्थानादी लेकर, वर्षों पूर्व से यहाँ आवासित है|

वेपेरी वर्तमान से सर्वाधिक जैनियों की आवास स्थली बनता जा रहा है| इस क्षेत्र में यहाँ -वहां प्रतिवर्ष सभी सम्प्रदाय के जैन संतों के दो-तीन चातुर्मास तो होते ही है|

वर्तमान चौबीसी के तीसरे तीर्थंकर परमात्मा श्री संभवनाथ भगवान का देवविमान तुल्य भव्य जिनालय वेपेरी की ह्रदयस्थली में स्थित है| मुलनायक श्री संभवनाथ परमात्मा के विराट संगमरमर अद्भुत कलाकृति से शोभित जिनालय में प्रवेश करते ही, प्रभु को नजर से निहारने पर अंतर में अदभव हुए समस्त प्रश्नों का समाधान स्वत: ही हो जाता है| श्वेत वर्ण के यह महामनोहर प्रतिमाजी कलात्मक परिकर के बीच में अत्यंत शोभित है| इस मनोहारिणी प्रतिमा से जहर रहा अनुपम लावण्य, निष्ठुर ह्रदय में भक्ति की उर्मियाँ का सृजन करता है|४१ इंच के इन भव्य प्रतिमाजी के दर्शन, विकारों की कालिमा को विलीन कर अंतर ह्रदय को सूर्य की आभा से भी ज्यादा समुज्ज्वल बनाते है| पद्मासनस्थ यह आभाहादक जिनबिम्ब श्रद्धालु को अद्भुत चित्त प्रसन्न्ता की दिव्य भेंट देता है| मुलनायक भगवान के बायीं ओर श्वेत वर्णीय आत्मिक शीतलता प्रदान करते श्री शीतलनाथ एवं नाभिनंदन प्रथम तीर्थंकर परमात्मा श्री आदिनाथ विराजमान है तथा दायी ओर महावीर स्वामी एवं श्री चन्द्रप्रभ स्वामी की श्वेतवर्णी प्रतिमाजी पद्मासनस्थ विराजित है| ये दिनेश के दर्शन जन्म-जन्मांतर की विषय-कषाययुत कालिमा से मुक्त करवाने वाले है|

मूल गंभारे के बाहर कलात्मक सौन्दर्य से पूर्ण रंगमंडप में बायीं तरफ श्री पद्मप्रभस्वामी, पुंडरिक स्वामी एवं त्रिमुख यक्ष की प्रतिमा विराजमान है| रंगमंडप के दायीं तरफ सातवें तीर्थंकर परमात्मा सुविधिनाथ भगवान, गुरु गौतमस्वामी तथा दुरीतारी यक्षिणी विराजमान है|

इस मंदिरजी की प्रतिष्ठा वि.सं. २०५२ , ज्येष्ठ सुदी ६, दिनांक २३.५.१९९६, गुरुवार के शुभ दिवस में अनेकों हृदयों की आस्था के आयाम, परमात्म भक्ति रसिक प.पू. आचार्य देव श्रीमद् विजय कलापूर्णसूरीश्वरजी म.सा. की पावन निश्रा में हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुई| इस देवालय में प्रतिदिन २५० के लगभग दर्शनार्थियों का आवागमन रहता है| नित्य पूजा करने वाले भक्तों की संख्या ८०-८५ के करेब होती है|