Rodla

रोडला

 

फालना-मोकलसर रोड पर सांडेराव से २०कि.मी. दूर मुखय सड़क के किनारे स्थित रोडला ग़ाव के मुखय बाजार में सुन्दर शिखरबंध जीनालय में मुलनायक सोलहवे तीर्थंकर श्री शांतिनाथ प्रभु की श्वेतवर्णी अप्रितम प्रतिमा विराजमान है| नाम के अनुरूप मन को शांति प्रदान करती यह प्रतिमा वि.सं. २०४१ जेठ सुदी १० बुधवार दी. २९.५.१९८५ को मंगल मुहर्त में प. पू. पं. प्रवर श्री हेमप्रभविजयजी गनिवरश्री आ. ठा. १० (वर्तमान में गच्छाधिपति आचार्यश्री) की पावन निश्रा में अष्टाहिनका मोहत्सवपूर्वक प्रतिष्ठित की गई एवं नूतन ध्वजदंड कलशारोहण आरूढ़ किए गए| इस अवसर पर गोडवाड़ दीपिका सा. श्री ललितप्रभाश्रीजी (लेहरो म.) आ. ठा. ४५ के साथ पधारी (आपश्री का यह एक दिवसीय सांसारिक ससुराल है) | “जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” के अनुसार, यह जिनालाय १८वि शताब्दी का है|

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श्री संतोकजी पुनमिया के अनुसार, सर्वप्रथम वर्तमान जिनालय के ठीक सामने उपाश्रय की एक कोठरी में मंदिर था| कई वर्षो तक यही पर पूजा-अर्चना होती थी, बाद में वर्तमान जिनालय की पास वाली धर्मशाला के एक कमरे में जिनालय की पास वाली धर्मशाला के एक कमरे में जिनालय स्वरुप देकर पूजा की जाने लगी| धीरे-धीरे सभी के मन में मंदिर निर्माण की भावना जागी और सबने संगठित होकर मंदिर का निर्माण प्रारंभ किया| मन के भाव सुन्दर हो तो देवता भी साथ निभाते है| घाकाबंध नूतन जिनमंदिर में मुलनायक श्री आदेश्वर भगवान् को हर्षोल्लास से विराजमान किया गया और भावोल्लास से सभी परमात्मा की भक्ति करने लगे |

कालांतर में मंदिर जीर्ण-शीर्ण होने पर जिणोरद्वार की आवश्यकता को धयान में रखकर ग़ाववासियो ने मारवाड़ में विचरते आ. श्री अरिहंत सिद्धसूरीश्वर्जी से जिणोरद्वार की चर्चा की| आ. श्री ने मंदिरजी के नवनिर्माण की प्रेरणा दी| आखिर इस मंदिर का विसर्जन करके पुन: शास्त्रोक्त विधि अनुसार, नूतन दो मंजिला भव्य शिखरबंध जिनालय का नवनिर्माण श्री संघ ने सुसंपन्न करवाया| सं. २०२८ द्वितिय वैशाख सु. १० के शुभ दिन अवार्चिन श्री शांतिनाथ भगवंत आदि जिनबिंबो का “नारलाई तीर्थ” से लाकर भव्य समारोहपूर्वक नगर प्रवेश हुआ| सं. २०२८ श्रावण वादी २ के शुभ दिन नूतन मंदिर की शिलास्थापन विधि हुई| सं. २०३८ वैशाख सुदी ३ को मंगल दिन मुलनायक श्री शांतिनाथजी तथा श्री आदिनाथजी आदि जिनबिंबो का मूल गंभारे में भव्य प्रवेश हुआ तथा सं. २०४१ में प्रतिष्ठा संपन्न हुई| इस महान काम का संपूर्ण यश, पुनय सा. श्री ललितप्रभाश्रीजी म.सा. (लेहरो म.सा.) को प्राप्त होता है| उन्ही के अथक प्रयास से नूतन मंदिर बन पाया |

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प्राचीन आदेश्वर प्रभु की प्रतिष्ठा वि.सं. १९४३, माघ सु. १०, गुरवार को संपन्न हुई | श्री आदेश्वर भगवान को नूतन जिंनलय की पहली मंजिल पर प्रतिष्ठित किया गया| नूतन जिनालय के ठीक सामने विशाल जीवदया चबूतरे बना है, जहा जैन-अजैन सभी लोग पक्षियो को दाना डालते है| सौ वर्ष पहले यहां ६४ श्रावको के घर थे| एक उपाश्रय व जिनमंदिर में कूल ३ प्रतिमाए विराजमान थी| वर्तमान में यहां श्रावको के कूल २१ घर है| कूल जनसंख्या ४००० के करीब है| यहां से ८ की.मी. दूर वाया भूति-कवलातीर्थ में सं. १११ की श्री आदिनाथ प्रभु की प्रतिमा विराजमान है| तीर्थ करीब २००० साल प्राचीन है|