Rani Station

रानी स्टेशन

 

राजस्थान प्रांत के पाली जिले में गोडवाड़ व पंचतीर्थी का प्रवेशद्वार है आधुनिक व प्रमुख औधोगिक नगरी “रानी स्टेशन“, जो की राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर केनपुरा चौराहे से १० की.मी. दूर सुकडी नदी के किनारे स्थित है|

आज से करीब १३० वर्ष पहले इस भूमि का पुनय प्रबल हुआ और सन १८८५ ई. के लगभग अहमदाबाद-दिल्ली के बीच मीटरगेज रेल लाइन बिछाई गई| वह यहां होकर गुजर रही थी| नजदीकी ग़ाव रानिगाव होने से यहां बने स्टेशन को एक सुमधुर नाम मिला – रानी| इस धरती के पुनय प्रभाव से आसपास के गावो के लोग यहां आकर बसने लगे |सालरिया, किशनपुरा, टेवाली, निम्बाडा, रायपुरिया, रुगडी आदि गावो से बड़ी संखया में परिवार स्थलांतरित होकर यहां बसने लगे| रानी स्टेशन,फालना,सुमेरपुर,शिवगंज, पाली आदि नगरो में आसपास के परिवार आकर बसने लगे और इन नगरो का काफी तेजी से विस्तार हुआ| कालांतार में उन्होंने अपनी लग्न, सूझबुझ और म्हणत से इसका रूपांतर एक प्रमुख व्यापारिक मंदी में किया| रानी ने एक कृषि मंडियो के रूप में काफी खयाती अर्जित की| इस समय की कर प्रणाली सरल होने से सन १९३५ से १९५० तक पाकिस्तान के कराची शहर से बहुत बड़ी मात्रा से व्यापार होता था, साथ ही आसपास के दूर-दरोज के काफी जिलो तक माल-सामान का वितरण “रानी” से होता था| यहां तक के रेडियो पर भी रानी की मंदी के भाव प्रसारित किया जाते थे और अखबारों में छापते थे| धीरे-धीरे सभी प्रकार के व्यापारियो में रानी विकास की ओर अग्रसर होता गया| यह स्वतंत्रता सेनानियो का कार्यशेत्र भी रहा, जिसमे शा. पुखराजजी कोठारी प्रमुख थे|

राजस्थान में विधुतीकारण होने के साथ ही रानी में औधोगीकरण की नीव पड़ी| कृषि व लोहे से जुड़े कारखानों,मशीनरी,जिनिंग मिल, रेलिंग मिल आदि व्यवसाय ने विशेष उन्नति की| शिक्षा के शेत्र में दो प्रमुख स्थान वारकाणा व विधावाड़ी ने रानी को राजस्थान के नक़्शे में एक विशेष स्थान दिलाया| जैन समाज के कई व्यक्तियो ने सरपंच एवं नगरधयक्ष के रूप में अपनी सेवाए दी है| आज २५-३० हजार जनसंख्या में सभी जाती-धर्म के लोग आपसी मेल-मिलाप और प्रेम -साधभाव से रहते है| १२वि शताब्दी तक विधालय, हॉस्पिटल, दूरसंचार, नगरपालिका, डाकघर,पुलिस ठाना, सिंचाई. यातायात आदि सभी आधुनिक सुविधाए इस नगर में उपलब्ध है|यहां का साईंबाबा मंदिर राजय के पर्यटन नक़्शे पर है|स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से लेकर सभी प्रसिद्ध बैंको की शाखाए, अनेक सामजिक जैन-अजैन संस्थाए अपनी सेवाए प्रदान क्र रही है|नगर में चार व वारकाणा रोड अष्टपाद सह पांच मंदिर है|

१ . श्री शांतिनाथजी मंदिर :

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नगर के मेन बाजार में स्थित , दो विशाल गजराजो से शोभित महलनुमा झरोखे से शोभायान शिखरबंध जिनप्रसाद में चक्रवर्ती १६ वे तीर्थंकर श्री शांतिनाथ प्रभु की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है| “जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” ग्रंथ के अनुसार, श्री संघ ने वि.सं. १९६० में शिखरबंध जिनालय का निर्माण करवाकर, मुलनायक सह पाषण की ३ व धातु की 4 प्रतिमाए प्रतिष्ठित की| श्री गुलाबचंदजी भभूतमलजी इसकी वहीवट संभालते थे| उन दिनों २०० जैनी और ३ धर्मशालाए थी|

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परिवर्तन संसार का नियम है| कालांतर में मंदिर के जीर्ण होने पर श्री संघ ने इसका आमूलचूल जिणोरद्वार का निर्णय कर निर्माण प्रारंभ किया| पूर्णता पर श्री संघ ने वीर नि.सं. २४९८, शाके १८९३,ई. सन १९७२, वि.सं. २०२८ के द्वितिय वैशाख शुक्ल ५, बुधवार को शासन सम्राट नेमिसुरी समूदायवर्ती आ. श्री सुशीलसूरीजी , पू. वाचक श्री दर्शनसागर गणी आदि चतुरविध संघ के साथ नितान निर्मित विशाल जिनप्रसाद में नूतन परीयूक्त मुलनायक श्री शान्तिनाथादी द्रदाश जिनबिंबो की मंगल अंजनशलाका प्रतिष्ठा हर्षोल्लास से संपन्न हुई| इस समय पर आचार्य श्री को मरुधर देशोद्वारक पद से अलंकृत किया गया| वि.सं. २०४२, पौष क्र. ७, शनिवार को चरण पादुका की प्रतिष्ठा आ. श्री सुशीलसूरीजी के हस्ते हुई थी | वर्षी बाद श्री संघ ने जिनालय में श्री शाश्वत जिनबिंब एवं अधिष्ठयक देव-देवी, गुरुचरण-यूगल की पावनकारी प्रतिष्ठा आ. श्री सुशीलसूरी के वरद हस्ते वि.सं. २०४६, पौष वदी ७, शनिवार दी. ८.१२.१९९० को संपन्न करवाई |

२ . श्री सुपर्श्वनाथजी मंदिर  :

 

suparshvnath mandir

मेन बाजार में प्राचीन शांतिनाथजी जिनमंदिर के नजदीक, गृहमंदिर में पाषण से बनी कलात्मक शिखरयूक्त छतरी में मुलनायक ७वे तीर्थंकर श्री सुपार्श्वनाथ, मुनिसुव्रत स्वामी व ऋषभ स्वामी का त्रिगडा प्रतिष्ठित है| सुंदर व कलात्मक परिकर के साथ प्रभु सनमुख रजत गजराज की जोड़ी स्थापित है| श्री शांतिनाथजी मंदिर में चौमुखी की प्रतिष्ठा के अवसर पर वि.सं. २०४६, पौष क्र. 7, शनिवार, दी. ८.१२.१९९० को आ. श्री सुशीलसूरीजी के हस्ते श्री सुपार्श्वजी जिनालय में अधिष्ठायक देव-देवी की महापूजनयूक्त दशाहिनका मोहत्सव पूर्वक प्रतिष्ठा संपन्न हुई| 

suparshvnath bhagwan

३ . श्री कुंथुनाथजी मंदिर : रेलवे स्टेशन फाटक के पास खीमेल रोड के नुक्कड़ पर शिखरबंध जिनालय में चक्रवर्ती १७वे तीर्थंकर श्री कुंथुनाथजी प्रभु की प्रथम मंजिल स्थापित है| नीचे प्रात: स्मरणीय श्रीमद्विजय राजेंद्रसूरीजी गुरु मंदिर में गुरुदेव की प्रतिमा प्रतिष्ठित है| गुरुदेव श्री के प्रशिष्य व आ. श्री यतींद्रसूरीजी के शिष्य आगमवेत्ता श्री देवेंद्रविजयजी का, पास ही बिरामी में दी. ३. ५. १९८० को स्वर्गवास के बाद श्री संघ रानी स्टेशन ने, इस मंदिर परिसर में वि.सं. २०३७ प्रथम जेष्ठ कृ. 4 , रविवार, दी. 4 मई , १९८० को अग्निसंस्कार संपन्न किया| कालांतर में अग्निसंस्कार स्थल पर छतरी का निर्माण करवाकर चरण यूगल स्थापित किए |अभी हाल में ही आया. श्री जयअंतसेनसूरीजी के हस्ते मुनि श्री की प्रतिमा स्थापित हुई|

४ . श्री सीमंधरस्वामी मंदिर :

simandhar swami bhgawan

रानी स्टेशन के हिंगड़ मोहल्ला में शाह रत्नचंदजी प्रेमचंदजी सोनीगरा परिवार द्वारा श्वेत पाषण से नवनिर्मित शिखरबंध जिनालय में श्री महाविदेह शेत्र के प्रागंण में २० वे  विहरमान तीर्थंकर श्री सीमंधरस्वामि भगवान की सपरिकर ३१ इंची प्रतिमा तथा श्री सुविधिनाथ , श्री सुमतिनाथ जिनबिंब व पंजाबकेशरी आ. श्री वल्लभसूरीजी नित्यानंदसूरीजी के सम्राट आ. श्री यशोभद्रसूरीजी आ. ठा. की निश्रा में वीर नि. सम. २५३३, शाके १९२८, वि.सं. २०६३, जेष्ठ कृ. ७, बुधवार ,दी .९ मई २००७ को दशाहिनका मोहत्सवपूर्वक संपन्न हुई | इसकी व्यवस्था श्री संघ रानी संभालता है|

पांचवा मंदिर श्री अष्टपद तीर्थ चैतय, वरकाना रोड पर स्थित है |

राणावत फार्महाऊस : राणी स्टेशन से लगभग १.५ की.मी. स्तिथ बहुत ही आकर्षक फार्महाऊस है जो अपने आप में ही अद्भूत है| यह फार्महाऊस श्री रमेशकुमार गजराजजी राणावत (मुंडारा निवासी) ने बनवाया है |