Rani Abbakka Chowta

अब्बक्का रानी : एक जैन वीरांगना जिन्होंने पोर्तुगीजों को पराभूत किया !

“रानी ऑफ़ उल्लाल से संबोधित किया जाता था”

१. परिचय

अब्बक्का रानी अथवा अब्बक्का महादेवी तुलुनाडूकी रानी थीं जिन्होंने सोलहवीं शताब्दीके उत्तरार्धमें पोर्तुगीजोंके साथ युद्ध किया । वह चौटा राजवंशसे थीं जो मंदिरों का शहर मूडबिद्रीसे शासन करते थे । बंदरगाह शहर उल्लाल उनकी सहायक राजधानी थी ।

२. बचपन

चौटा राजवंश मातृसत्ताकी पद्धतिसे चलनेवाला था, अत: अब्बक्काके मामा, तिरुमला रायने उन्हें उल्लालकी रानी बनाया । उन्होंनेने मैंगलोरके निकटके प्रभावी राजा लक्ष्मप्पा अरसाके साथ अब्बक्काका विवाह पक्का किया । बादमें यह संबंध पोर्तुगीजों हेतु चिंताका विषय बननेवाला था । तिरुमला रायने अब्बक्काको युद्धके अलग-अलग दांवपेचोंसे अवगत कराया । किंतु यह विवाह अधिक समयतक नहीं चला और अब्बक्का उल्लाल वापिस आ गर्इं । उनके पतिने अब्बक्कासे प्रतिशोध लेनेकी इच्छासे बादमें अब्बक्काके विरुद्ध पोर्तुगीजोंके साथ हाथ मिलाया ।

३. बहादुरी

पोर्तुगीजोंने उल्लाल जीतनेके कई प्रयास किए, क्योंकि रणनीतिकी दृष्टिसे वह बहुत महत्वपूर्ण था । किंतु लगभग चार दशकों तक अब्बक्काने उन्हें हर समय खदेडकर भगा दिया । अपनी बहादुरीके कारण वह ‘अभया रानी’ के नामसे विख्यात हो गर्इं । औपनिवेशक शक्तियोंके विरुद्ध लडनेवाले बहुत अल्प भारतीयोंमेंसे वह एक थीं तथा वह प्रथम भारतीय स्वतंत्रता सेनानी मानी जाती थीं ।

रानी अब्बक्का भले ही एक छोटे राज्य उल्लाकी रानी थीं, वह एक अदम्य साहस एवं देशभक्तिवाली महिला थीं । झांसीकी रानी साहसका प्रतीक बन गई हैं, उनके ३०० वर्ष पूर्व हुई अब्बक्काको इतिहास भूल गया है ।

पोर्तुगीजोंके साथ उनकी साहसपूर्ण लडाईयोंका ब्यौरा ठीकसे नहीं रखा गया । किंतु जो भी उपलब्ध है, उससे इस उत्तुंग, साहसी एवं तेजस्वी व्यक्तित्वका पता चलता है ।

४. व्यक्तिगत जीवन

स्थानीय किंवदंतियोंके अनुसार अब्बक्का एक बहुत ही होनहार बच्ची थीं, तथा जैस-जैसे वह बडी होती गर्इं, एक द्रष्टा होनेके सारे लक्षण उनमें दिखाई देने लगे; धनुर्विद्या तथा तलवारबाजीमें उनका मुकाबला करनेवाला कोई नहीं था । इस हेतु उनके पिताजीने उन्हें उत्तेजना दी, परिणामस्वरूप वह हर क्षेत्रमें प्रवीण हो गर्इं । उनका विवाह पडोसके बांघेरके राजाके साथ हुआ । किंतु यह विवाह अधिक चला नहीं, तथा अब्बक्का पतिद्वारा दिए हीरे-जवाहरात लौटाकर घर आ गर्इं । अब्बक्काके पतिने उनसे प्रतिशोध लेने हेतु तथा उनसे युद्ध करने हेतु एक संधिमें पोर्तुगीजोंसे हाथ मिलाया ।

उल्लालका स्थान अब्बक्काके राज्यकी राजधानी उल्लाल किला अरब सागरके किनारे मंगलोर शहरसे मुछ ही मीलोंकी दूरीपर था । वह एक ऐतिहासिक स्थान तथा एक तीर्थस्थल भी था, क्योंकि रानीने वहां शिवका सुंदर मंदिर निर्माण किया । वहां एक नैसर्गिक अद्वितीय शिला भी थी, जो ‘रुद्र शिला’ के नामसे जानी जाती थी । उसपर पानीकी बौछार होते ही हर पल उस शिलाका रंग बदलता रहता था ।

५. ऐतिहासिक पार्श्वभूमि

गोवाको कुचलकर उसे नियंत्रणमें लेनेके पश्चात पोर्तुगीजोंकी आंख दक्षिणकी ओर तथा सागरके किनारेपर पडी । उन्होंने सबसे पहले १५२५ में दक्षिण कनाराके किनारेपर आक्रमण किया तथा मंगलोर बंदरगाह नष्ट किया । उल्लाल एक समृद्ध बंदरगाह था तथा अरब एवं पश्चिमके देशोंके लिए मसालेके व्यापारका केंद्र था । लाभप्रद व्यापारकेंद्र होनेके कारण पोर्तुगीज, डच तथा ब्रिटिश उस क्षेत्रपर एवं व्यापारी मार्गोंपर नियंत्रण पाने हेतु एक दूसरेसे टकराते रहते थे । किंतु वे उस क्षेत्रमें अधिक अंदरतक घुस नहीं पाए, क्योंकि स्थानीय सरदारोंद्वारा होनेवाला प्रतिरोध बडा दृढ (मजबूत) था । स्थानीय शासकोंने जाति एवं धर्मसे ऊपर उठकर कई जाली गठबंधन बनाए ।

अब्बक्का भले ही जैनी थीं, उनके शासनमें हिंदू एवं मुसलमानोंका अच्छा प्रतिनिधित्व था । उनकी सेनामें सभी जाति एवं संप्रदायके लोग, यहांतक कि मूगावीरा मच्छीमार भीसम्मिलित थे । उन्होंने कालिकतके जामोरीन तथा दक्षिण तुलूनाडूके मुसलमान शासनकर्ताओंके साथ जाली गठबंधन बनाए । पडोसके बंगा राजवंशसे विवाहबंधनसे स्थानीय शासनकर्ताओंके गठबंधन और दृढ हो गए ।

Life Size statue of the Chowta Queen Abbakka in Ullal

६. पोर्तुगीजोंके साथ युद्ध

हालांकि अब्बक्का विश्वास से एक जैन थी, उनको हिंदुओं और मुसलमानों द्वारा अच्छी तरह प्रतिनिधित्व किया था। उनकी सेना भी सभी संप्रदायों और जातियों के लोग शामिल थे।

६ अ. प्रथम आक्रमण

पोर्तुगीजोंने १५२५ में दक्षिण कनारा तटपर पहला आक्रमण कर मंगलोर बंदरगाह नष्ट किया । इस घटनासे रानी सतर्क हो गर्इं तथा अपने राज्यकी सुरक्षाकी तैयारीमें जुट गर्इं ।

६ आ. द्वितीय आक्रमण

अब्बक्काकी रणनीतिसे पोर्तुगीज अस्वस्थ हो गए थे, तथा चाहते थे कि वह उनके सामने झुक जाएं, उनका सम्मान करें, किंतु अब्बक्काने झुकना अस्वीकार किया । १५५५ में पोर्तुगीजोंने एडमिरल डॉम अलवरो दा सिलवेरिया को रानीसे युद्ध करने भेजा क्योंकि उन्होंने उनका सम्मान करना अस्वीकार किया था । तदुपरांत हुए युद्धमें रानीने एक बार पुन: स्वयंको बचाया तथा आक्रमणकारियोंको सफलतापूर्वक खदेड दिया ।

६ इ. तृतीय आक्रमण

१५५७ में पोर्तुगीजोंने मंगलोरको लूट कर उसे बर्बाद कर दिया । १५५८ में पोर्तुगीजोंने मंगलोरके साथ प्रचंड क्रौर्य कर बडा पापकर्म किया, कई युवा एवं बूढे स्त्री-पुरुषोंकी हत्या की, एक मंदिरको लूटा, जहाज जलाए तथा अंतमें पूरे शहरमें आग लगा दी ।

६ र्इ. चतुर्थ आक्रमण

१५६७ में पोर्तुगीजोंने पुन: उल्लालपर आक्रमण किया, मृत्यु एवं विनाश की वर्षा की । महान अब्बक्काने इसका भी प्रतिकार किया ।

६ उ. पांचवां आक्रमण

१५६८ में पोर्तुगीज वाईसराय एंटोनियो नोरान्हाने जनरल जोआओ पिक्सोटो के साथ सैनिकोंका एक बेडा देकर उसे उल्लाल भेजा । उन्होंने उल्लालपर नियंत्रण किया तथा राजदरबारमें घुस गए । किंतु अब्बक्का रानी भाग गर्इं तथा एक मस्जिदमें आश्रय लिया । उसी रात उसने २०० सैनिकोंको इकट्ठा कर पोर्तुगीजोंपर आक्रमण किया । लडाईमें जनरल पिक्सोटो मारा गया तथा ७० पोर्तुगीज सैनिकोंको बंदी बनाया गया, कई सैनिक भाग गए । बादमें हुए आक्रमणोंमें रानी तथा उसके समर्थकोंने एडमिरल मस्कारेन्हसकी हत्या की और पोर्तुगीजोंको मंगलोर किला खाली करनेपर बाध्य किया ।

६ ऊ. छठां आक्रमण

१५६९ मे पोर्तुगीजोंने केवल मंगलोर वापिस लिया इतना ही नहीं अपितु कुंडपुर (बसरुर) पर विजय प्राप्त किया । यह सब पानेके पश्चात अब्बक्का रानी खतरेका स्रोत बनी हुई थीं । रानीके विभक्त पतिकी मददसे वे उल्लालपर आक्रमण करते रहे । घमासान युद्धके पश्चात अब्बक्का रानी अपने निर्णयपर अटल थीं । १५७० में उन्होेंने अहमदनगरके बीजापुर सुलतान तथा कालिकतके झामोरीनके साथ गठबंधन किया, जो पोर्तुगीजोंके विरुद्ध थे । झामोरीनका सरदार कुट्टी पोकर मार्कर अब्बक्काकी ओरसे लडा तथा पोर्तुगीजोंका मंगलोरका किला उध्वस्त किया किंतु वापिस आते समय पोर्तुगीजोंने उसे मार दिया । निरंतरकी हानि तथा पतिके विश्वासघातके कारण अब्बक्का हार गर्इं, वह पकडी गर्इं तथा उन्हें कारागृहमें रखा गया । किंतु कारागृहमें भी उन्होेंने विद्रोह किया तथा लडते-लडते ही अपने प्राण त्याग दिए ।

पारंपारिक कथनानुसार वह बहुत ही लोकप्रिय रानी थीं, जिसका पता इस बातसे चलता है कि वह आज भी लोगसाहित्यका एक हिस्सा हैं । रानीकी कहानी पीढी-दर-पीढी लोकसंगीत तथा यक्षगान (जो तुलुनाडूका लोकप्रिय थिएटर है)द्वारा पुन:पुन: दोहराई जाती है । भूटा कोला एक स्थानीय नृत्य प्रकार है, जिसमें अब्बक्का महादेवीके महान कारनामे दिखाए जाते थे । अब्बक्का सांवले रंगकी, दिखनेमें बडी सुंदर थीं; सदैव सामान्य व्यक्तिजैसे वस्त्र पहनती थीं । उन्हें अपनी प्रजाकी बडी चिंता थी तथा न्याय करने हेतु देर राततक व्यस्त रहती थीं । किंवदंतियोंके अनुसार ‘अग्निबाण’ का उपयोग करनेवाली वह अंतिम व्यक्ति थीं । कुछ जानकारीके अनुसार रानीकी दो बहादुर बेटियां थीं, जो पोर्तुगीजोंके विरुद्ध उनके साथ-साथ लडी थीं । परंपराओंके अनुसार तीनों-मां तथा दोनों बेटियां एक ही मानी जाती हैं ।

७. एक महान रानीकी याद

अब्बक्काको उनके अपने नगर उल्लालमें बहुुत याद किया जाता है । हर वर्ष उनकी स्मृतिमें ‘वीर रानी अब्बक्का उत्सव’ मनाया जाता है । ‘वीर रानी अब्बक्का प्रशस्ति’ पुरस्कार किसी अद्वितीय महिलाको दिया जाता है । १५ जनवरी २००३ को डाक विभागने एक विशेष कवर जारी किया । बाजपे हवाई अड्डेको तथा एक नौसैनिक पोतको रानीका नाम देने हेतु कई लोगोंकी मांग है । उल्लाल तथा बंगलुरूमें रानीकी कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है । ‘कर्नाटक इतिहास अकादमी’ने राज्यकी राजधानीके ‘क्वीन्स रोड’ को ‘रानी अब्बक्का देवी रोड’ नाम देनेकी मांग की है ।