Pu. Aa. Shree Vishwchandrsuriji

Pu. Aa. Shree Vishwchandrsuriji (Bankli)

 

 

पू. आ. श्री विश्वचन्द्रसूरीजी (बांकली)

vishwchandra m.

जन्म : वीर नि.सं. २४६७, शाके १८६२ , वि.सं. १९९७ , आषाढ़ कृष्ण ३ , शनिवार दी. २२ जून १९४० , जन्म स्थान : बांकली , जिला – पाली (राजस्थान) ,

जन्म-नाम : उम्मेदमॉल , माता : मगीदेवी , पिता : बगाजी (व्यापार-मुंबई)

दीक्षा : वीर नि.सं. २४९२ , शाके १८८७ , वि.सं. २०२२ , मार्गशीर्ष वदी १३ , नवंबर १९६६ को मुंबई के विलेपार्ले में, प. पू. आ. श्री भुवनसूरीजी म.सा. के हस्ते दीक्षित होकर, मु. श्री विश्वविजयजी नामकरण हुआ|

गच्छनायक : प. पू. आ. श्री रामचंद्रसूरीश्वरजी म.सा.

उपाध्याय पद : वीर नि.सं. २५१७ , शाके १९१२ , वि.सं. २०४७ , जेष्ठ सुदी ५, जून १९९१ को, योगनिष्ट आ. श्री आनंदघनसूरीजी के शुभाशीर्वाद से, आ. श्री धर्मसूरीजी के सामुदायवर्ती आ. श्री जयानंदसूरीजी ने वक्तापुर (गुजरात) में ” उपाध्याय पद” से नवाजा|

आचार्य पद : वीर नि.सं. २५२४ , शाके १९१९ , वि.सं. २०५४ , मार्गशीर्ष वदी १३, नवंबर १९९८ को , आपके गुरुभ्राता पू. आ. श्री आनदघनसूरीजी ने नमस्कार महामंत्र के तृतिय ” आचार्य पद” से रमणीया आनंदधाम तीर्थ (रानी-राज.) पर अलंकृत किया |

तपस्याए : आपने अपने जीवन में मासक्षमन-२ , एक बार संलग्न ४५ उपवास , तीन वर्षीतप , जिसमे एक छठ के पार्ने छठ से, सिद्धितप , सिंहासन तप समवसरण तप , श्रेणी तप , ४१ वर्धमान तप की ओलिया , वीस स्थापन तप की आराधना की , इक्कीस दिन मौनपूर्वक की आराधना की , गुरुगम द्वारा जानकारी प्राप्त कर, छ: महीने तक श्री चिंतामणि पार्श्वनाथजी की आराधना की |

शिष्यरत्न : पू. उपाध्याय श्री दिव्यचंद्र विजयजी म.सा.

स्वर्गवास : वीर नि.सं. २५३८, शाके १९३३, वि.सं. २०६८ , कार्तिक सुदी ३, शनिवार , दी. २९.१०.२०११ को स्वर्ण मंदिर से शोभित फालना नगर में आपका स्वर्गवास हुआ| पुज्य आचार्यश्री के चरणों में कोटिश: वंदन व् श्रद्धासुमन अर्पण |