Mundara

मुंडारा

पाली जिले में गोडवाड़ के प्रवेश द्वार फालना रेलवे स्टेशन से सादड़ी जाने वाले राजमार्ग क्र. ११६ की मुखय सड़क पर फालना से १८ की.मी. दूर, अरावली पर्वतमालाओ की गोद में बसा है प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर ग़ाव मुंडारा| जिसके बारे में यह कहावत प्रसिद्द है की “मोटो ग़ाव – मुंडारा” |१०वि शताब्दी के प्राचीन नगर मुंडारा में पांच जैन मंदिर विधमान है| यहां ७०० के करीब जैनों के घर है और लगभग ३००० अजैन परिवाए भी बसे है|

१०वि शताब्दी में वि.सं. ९६२ के आसपास संडेकरगच्छीय आ. श्री इश्वरसूरीजी ने मुंडारा में, छ: महीने तक लगातार श्री बद्री देवी के उपासना कर उन्हें प्रसन्न किया| देवी ने प्रकट होकर आचार्यश्री को सुशीषय प्राप्त होने का वरदान दिया| देवी के बताए अनुसार आचार्यश्री ने सिरोही के पास पलासी ग्राम के “सुधर्मा” को दीक्षा देकर अपना समस्त गिआन प्रदान कर दिया, जिनका नामकरण श्री यशोभद्र विजयजी किया गया| वहां से गुरु और शिष्य दोनों पुन: मुंडारा पधारे| यहां सुधर्मा ने बद्री देवी की आराधना की| प्रसन्न होकर देवी सुधर्मा के शारीर में अवतरित हुई और सुधर्मा के ललाट पर तिलक तथा गले में कुसुममाला डालकर उन्होंने सुधर्मा का नया नाम दिया- “आ. श्री यशोभद्रसूरीश्वर्जी” | संवत् १६८६ में लिखित “संस्कृत चरित्र” से इस बात की पुष्ठी होती है| वि.सं. ९६८ में मात्र ११ वर्ष की अल्पायू में ही, इन्हें मुंडारा में “सूरीपद” की प्राप्ति हुई|

“संवत् नवसै है अडसठे, सूरी पदवी जोय – बदरी सूरी हाजर रहे पूणय प्रबल जस जोय |”

आ. श्री यशोभद्रसूरीजी ने इस अवसर पर विगओ को विशोत्पादक समझकर उनका तयाग किया और आठ कवल ही आहार (आयमबिल) करने का अभिग्रह धारण कई| आपश्री ने वि.सं. ९६८ में मुंडारा में प्रतिष्ठा करवाकर अपनी विधि का परिचय दिया था|

आ. श्री नितिसूरीजी समूदायवर्ती आ. हसरी दक्षसूरीजी के वरद हस्ते, वीर नि. संवत् २४९१, शाके १८८६, वि.सं. २०२१ के महा सुदी ३, दी. 4 फ़रवरी १९६५ को ,राजस्थान दीपक मू. श्री सुशील विजयजी को “उपाधयाय पद” से अलंकृत किया एवं सं. २०२१, माघ शुक्ल ५ , दी. ६ फ़रवरी १९६५ को दिन, मुंडारा की पावन धरा पर, शासन की घुर को वहन करने वाले तृतीय पद “आचार्य पद” पर आरूढ़ किया गए एवं उन्हें मरुधर देशोद्वारक पद से अलंकृत किया गया|

इस पावन भूमि पर जन्म लेकर अनेक पुणयशाली आत्माओ ने संयम करके कुल, ग़ाव और स्वंय का नाम जगत में रोशन किया है|

आ. श्री वल्लभसूरीजी सादड़ी चातुर्मास के बाद , वि.सं. २००६, मार्गशीर्ष वदी ६, दी. ११.११.१९४९ को पधारे व संघ एकता पर प्रभावशाली प्रवचन दिया| नगर में स्थित तारेश्वर महादेव एवं सुप्रसिद्ध चमत्कारी ४५० वर्ष प्राचीन श्री चामुंडा माताजी का मंदिर है, जहां देश-विदेश के दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है| मुंडारा निवासी फुआ रेबारी को मा चम्नुन्दा ने स्वप्न में दर्शन दिया| फुआ ने हाथी मंदिर का निर्माण करवाया| मंदिर निर्माण के बाद सं. १९६९, माघ शु. ५ को प्रतिष्ठा हुई| इसलिए हर वर्ष वसंत पंचमी को बड़ा मेला लगता है| वर्तमान में रेबारी केसा का दोहिता रेबारी ओटाराम इस मंदिर की पूजा-अर्चना करते आ रहे है|

सुप्रसिद्ध श्री राणकपुर तीर्थ की अजोड, अतुलनीय व अविस्मरणीय कलाकृतियो के प्रसिद्ध शिल्पी “दीपाजी  सोमपुरा” की यह जन्मभूमि है| दीपाजी सोमपुरा ने अपनी कला के माध्यम से मुंडारा नगर को विश्वभर में प्रसिद्धी दिलवाई| कहते है की “एक पत्थर की भी तक़दीर बदल सकती है, अगर उसे सलीके से तराशा जाए |” श्री तारेश्वर महादेव व देवीभक्त शिल्पवी देपाक सोमपुरा ने राणकपुर मंदिर(निर्माण सं. १४९६) के साथ स्वंय को भी अमर कर दिया| इसी कड़ी में” कच्छी घोड़ी नृत्य” के प्रसिद्ध कलाकार हिम्मतराव ने भी मुंडारा नगर को , देश-विदेश तक पहचान दिलवाई| स्वतंत्रता सेनानी श्री अमृतराजजी मेहता मुंडारा निवासी अपने शेत्र में लोक परिषद् के संस्थापको में से एक रहे है और अपने सामंत विरोधी प्रद्शन के कारण इन्हें बड़ी यातनाए झेलनी पड़ी, मगर आप निडर होकर लोक परिषद् के माध्यम से, विधायक श्री फूलचंदजी बाफना के सहयोग के कार्य करते रहे| बाद में आपके छोटे भाई श्री करणराजजी मेहता (सरपंच) ने यह काम संभाला था|

श्री मनमोहन जैन ग्रुप मुंडारा : सन २००५ में श्री आदेश्वर जिनालय के प्रतिष्ठा मोहत्सव पर, नगर के यूवाओ ने अपने ग्रुप का परिचय देने हेतु, “श्री मनमोहन जैन ग्रुप” नाम दिया| सन २००८ में वरिष्ठ जनों हेतु शत्रुंजय गिरनार सहित अनेक तीर्थो की यात्रा, सन २००९ में पुन: वरिष्ठो द्वारा श्री सम्मेतशिखर आदि पंचतीर्थो की यात्रा करवाई| श्री संघ के आदेश से प्रथम बार आ. श्री धर्मधुरंधरसूरीजी का चातुर्मास करवाया एवं श्री वल्लभ गुरु द्वारा स्थापित वारकाणा, फालना, उम्मेदपुर व सादड़ी आदि विधालओ के भूतपूर्व जैन विधार्थीओ का, विश्व में प्रथम बार स्नेह सम्मलेन दी. ४.५.६ नवंबर २०११ को आयोजित किया| भविष्य के कामों हेतु हार्दिक सुभकामनाए…|

श्री तरुण सेवा संघ, मुंडारा : सन १९७९ ई. में सेवा का भाव लेकर ” श्री तरुण सेवा संघ, मुंडारा” का गठन हुआ| इसने सन २००४ ई. में रजत जयंती वर्ष पर, मुंडारा सुंदर पता निर्देशिका का प्रकाशन किया|

 

१ . श्री शांतिनाथजी मंदिर :

2

नगर के बीच बाजार पेढि के पास, अति प्राचीन, चौविस देव कुलीकाओं से शोभित, पच्चीस शिखरों पर लहराती ध्वजाए, कलात्मक दो विशाल हाथियो से रक्षित, कोरणी यूक्त विशाल सौधशिखरी जिनप्रसाद में, श्री शांन्तिनाथ प्रभु की मनभावन, श्वेतवर्णी, पद्मासनस्थ प्रतिमा प्रतिष्ठित है| १०वि शताब्दी का यह प्राचीन मंदिर संप्रतिकालीन है| भमती की प्राय: सभी प्रतिमाए संप्रतिकालीन है|

1

प्रतिमा अति प्राचीन है| जैन तीर्थ सर्वसंग्रह के अनुसार श्री संघ द्वारा सं. ९७५ का निर्मित मंदिर है| संभव है की इसी मंदिर का प्रतिष्ठा आ. श्री मंदिर की प्रतिष्ठा आ. श्री यशोभद्रसूरीजी के हाथो हुई हो| कुछ भी हो मगर मंदिर और प्रतिमा दोनों की अति प्राचीन है| सं. २००९ में इसका जिणोरद्वार हुआ| चमत्कारी श्री मणिभद्रजी की प्रतिमा अतयत आकर्षक है |

२ . श्री पार्श्वनाथजी मंदिर : ग़ाव में प्रवेश के बाद सर्वप्रथम इसी मंदिर पर दृष्टी पड़ती है| त्रिशिखरबंध जिनचैतय में, श्री पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिमा प्रतिष्ठित है| पहले यह घुमटबंध था| जैन तीर्थ सर्वसंग्रह के अनुसार प्रतिमा लेख वि.सं. १७८३ का है| इसीसे इसकी प्राचीनता प्रकट होती है| मंदिर में प्रभु की प्रतिमा  के  लेख अनुसार, वीर नि.सं.  २४७६, वि.सं. २००६, मार्गशीर्ष शु. १०. बुधवार, दी.  30.१२.४९ की बीजापुर (मारवाड़) प्रतिष्ठोत्सव पर, आ. श्री वल्लभसूरीजी के हस्ते अंजन होकर यहां प्रतिष्ठित किया गया है |मंदिर हेतु ४३१ फुट का प्लाट, श्रीमती सारिबाई गुलाबचंदजी मेहता परिवार ने श्री संघ को भेट दिया है |

३ . श्री आदेश्वरजी मंदिर :

aadeshwarji mandir

राजमार्ग क्र. १६ पर राणकपुर जाते समय, दाई तरफ बस स्टैंड के पास भव्य-दीव्य महाप्रवेशद्वार में प्रवेश के साथ विशाल परिसर में भव्य शिखर यूक्त जिनमंदिर में श्री आदेश्वर प्रभु की प्रतिमा स्थापित है| जैन तीर्थ सर्वसंग्रह के अनुसार यह मंदिर श्री संघ द्वारा सं. १९५० का निर्मित है| मंदिर में एक पार्श्वनाथ प्रतिमा पर सं. १८२१ महा सुदी ५ का लेख पढ़ने में आता है| प्रतिष्ठा को अंदाजन १५० से २०० वर्ष हुए है| मंदिर में प्रतिष्ठित ऋषभ जिन पादुका की संघ द्वारा प्रतिष्ठा सं. १९२१, वै. सु. १०, सोमवार को हुई है|

aadeshwarji bhagwan

४ . श्री संभवनाथजी मंदिर : श्री जसराजजी नवलाजी परिवार द्वारा निर्मित, मुलनायक श्री संभवनाथादी जिनबिंबो की, वीर नि.सं. २५१४, शाके १९०९ व वि.सं. २०४४, महा सुदी १४ को, श्री प्रेम रामचंद्रसूरीजी समूदायवर्ती पू. मू. श्री कमलरत्न विजयजी के करकमलों से प्रतिष्ठा हुई| एक उअर श्री विमलनाथ प्रभु प्रतिमा लेख अनुसार वीर नि. सं. २५१४, वि. सं. २०४४, मार्गशीर्ष शु. ६, गुरूवार, दी. २६.११.१९८७ को, आ. श्री पद्मसूरीजी के हस्ते मुमुक्षु दिवालीबाई के श्रेयार्थ जारवोड़ा तीर्थ प्रतिष्ठोत्सव पर अंजन हुई प्रतिमा प्रतिष्ठित की |

 

५ . श्री सहस्त्रफणा पार्श्वनाथजी मंदिर :

saptfana parshvanath mandir

श्री चंपाविहार धर्मशाला के नजदीक व तालाब के पास, घुमटबंध शिखरयूक्त चैतय में, श्री रायचंदजी मंडलेशा परिवार द्वारा निर्मित जिनालय में, आ. श्री सुशीलसूरीजी के हस्ते मुलनायक श्री सहस्त्रफणा पार्श्वनाथ प्रभु आदि ५१ जिनबिंबो की, वीर नि. सं. २५२१, वि.सं. २०५१, जेष्ठ शु. २, बुधवार दी. ३१ मई, १९५५ के दिन प्रतिष्ठा संपन्न हुई| श्री सहस्त्रफणा पार्श्वनाथ प्रभु की अंजन विधि नोवीनगर प्रतिष्ठोत्सव पर, वि.सं. २०४५, वै. सु. ५, सोमवार को, आ.  श्री सुशीलसूरीजी द्वारा संपन्न हुई थी|

saptfana parshvanath bhagwan

इस मंदिर में गुरु बिंब गणधर पुंडरिक स्वामी, गौतमस्वामी, शासन सम्राट नेमिसुरीजी, श्री लावण्यसूरीजी व देवी-देवताओ की प्रतिष्ठा हुई| इस मंदिर का खनन वि.सं. २०४९, मार्गशीर्ष शु. ११ व शिलान्यास मुहर्त वि.सं. २०४९, माघ शु. १३ को संपन्न हुआ था|

मुंडारा : वि.सं. २०५९, सन २००३ ई. में प्राचीन तीनो मंदिरों की, ५० वि वर्षगाठ अर्थार्त स्वर्ण जयअंती मोहत्सव का आयोजन संपन्न हुआ| दानवीर परिवारों द्वारा ३ स्कूल, अस्पताल भवन, पशु चिकित्सालय आदि का सुंदर निर्माण, ग़ाव में मारवाड़ ग्रामीण बैंक, दूरसंचार एक्सचेंज, राजस्थान परिवहन निगम, प्रायवेट बस, टैक्सी की सुविधा, सिंचाई हेतु दांतीवाडा बाँध आदि साड़ी सुविधाए उपलब्ध है| मुंडारा में ६५० घर हौती है| ग़ाव की संपूर्ण जनसंख्या दस हज़ार के करीब है| मुंबई के बाद पुणे शहर में भी बड़ी संखया में परिवार रहते है| श्री मुंडारा जैन संघ, पुणे ने अपनी पता निर्देशिका का २००९ में प्रकाशन किया|