Kirwa

किरवा

गोडवाड़ की धन्य धरा पर राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर किरवा बस स्तान्द्से २ की.मी. अन्दर अरावली पर्वतमालाओं की गोद में खुटखड़ा पहाड़ के पास एक छोटा-सा गांव है ” किरवा”|

किरवा गांव के मुख्य बाजार में श्वेत पाषण से नवनिर्मित जिनालय के चौरस व कलात्मक शिखर से युक्त चैत्य में २१वे तीर्थंकर धर्मचक्रवती श्री नेमिनाथ प्रभु की २१ इंची, श्वेतवर्णी अवं पद्मासनस्थ अत्यंत मनभावन प्रतिमा प्रतिष्टित है|इस प्रतिमा की अंजनशलाका प्रतिष्ठा वीर नि.सं. २५११. शाके १९०६, वि.सं. २०४१, पौष सुदी ६ को, पालीनगर में शासन प्राभावक आ. श्री गच्छाधिपति कैलाशसागरसूरीजी आ. ठा. के वरद हस्ते , श्री संघ ने करवाई| इसके बाद प्रतिमा गांव में मेहमान के रूप में पूजी जाती है| इस बीच मंदिर निर्माण की योजना को भी साकार रूप दिया जाने लगा| वि.सं. २०५४, महा सुदी ५, शुक्रवार, दी. १०.२.८९ के शुभ दिन, नूतन जिनालय का खनन व शिलास्थापन राजस्थान दीपक आ. श्री सुशीलसूरीजी आ. ठा. की निश्रा में श्री बस्तीमलजी बाफना परिवार के हस्ते  सुसंपन्न हुआ|

जिनप्रसाद के निर्माण की पूर्णता पर आ. श्री सुशीलसूरीजी आ. ठा. की निश्रा में वि.सं. २०४९, मार्गशीर्ष मॉस शुक्रवार, दी. ४.१२.१९९२ को परमात्मा श्री नेमिनाथ स्वामी के नूतन जिनालय में गभारा प्रवेश हर्षोल्लास से संपन्न हुआ|

वि.सं. २०५५, सु. १० को मुंबई के विले पार्ले में पू. मु.श्री चारित्रवल्लभ विजयजी की निश्रा में प्रतिष्ठा के चढ़ावे संपन्न हुए| अब बारी आई प्रतिष्ठा की|

प्रभु की अंजनशलाका विधि-विधान के चौदह वर्ष बाद (प्रभु राम के वनवास की तरह) वीर नि.सं. २५२५, शाके १९२०, वि.सं. २०५५, महा सुदी ११, बुधवार, दी.२७ जनवरी १९९९ को ,मगल वेला में नवहिंका मोहत्सव पूर्वक तपागच्छचार्य प्रवचनप्रभावक आ. श्री हिरण्यप्रभसूरीजी आ. ठा. ४ व चतुर्विध संघ की उपस्थिति में श्री नेमिनाथ स्वामी आदि जिनबिंबो की प्रतिष्ठा संपन्न हुई|

अगले पड़ाव में जिनालय में नवनिर्मित गोखलों में, तपागच्छअधिष्ठायक यक्षेन्द्र श्री मणिभद्रवीर, श्री चकेश्वरी माता की भव्य मंगल प्रतिष्ठा तथा श्री संघ द्वारा पिछले ५० वर्षों से लगातार पूजित श्री नेमिनाथ स्वामी की पंचाधातु प्रतिमा के स्वर्ण जयंती(५०वि वर्षगाँठ) निर्मित, वि.सं. २०६८, वैशाख सुदी ८, रविवार , दी.२९ अप्रैल २०१२ को, त्रिदिवसीय रत्नयत्री मोहत्सवपूर्वक शान्तिदूत आ. श्री नित्यनन्दसूरीजी व अखंड वर्षीतप तपस्वी आ. श्री वसंतसूरीजी की पावन निश्रा में संपन्न हुआ| प्रतिवर्ष महा सुदी ११ को श्री चुन्नीलालजी वोरादासजी बाफना परिवार ध्वजा चढाते है|

इस गांव में सिर्फ बाफना गोत्र परिवार है, जो एक ही बाप-दादाजी का परिवार है|

इतिहास के पन्नो से : अभी जहाँ पर माताजी का प्रसिद्ध स्थान है, वहीँ पर किसी जमाने में “कीर” प्रजाति बसाती थी| उसके चले जाने के बाद फिर से नया गांव बसा, उससे इसका नाम “किरवा” पड़ा|

सीरवी (लासेटा गोत्र) परिवार के यहां होली की छड़ी(नींव) डाली गई| इससे सरप्रथम इस गांव में ज्यादातर चौधरी आकर बसे व फिर उसके बाद दूसरी प्रजातियाँ आकर बसी| गांव करीब ५०० वर्ष से ज्यादा प्राचीन माना जाता है|बिठुडा-पिरान की एक जैन बाया(लड़की) का ससुराल किरवा में था|उसके पीहर में कोई नहीं था| उसके बारे में कहा जाता है की एक बार वह बितुडा तालाब की पाल पर बैठी, विलाप कर रही थी, बेतेकी शादी tही और पीहर से मायरा (मुछला) करने वाला कोई नहीं था|अचानक एक राजपूत राठोड भुरसिंहजी (मामाजी महाराज) ने प्रकट होकर लड़की से रोने का कारण कलाई में बांध दे|आज से तू मेरी धर्मबेहेन है और मायरा मई करुगा| यह कहकर वह धर्मभाई विलुप्त हो गया| लड़की ने शादी के समय फिर से विलाप करते हुए अपने धर्मभाई को याद किया|भूरासिंह राठोड किरवा में प्रकट हुए और मुछाला(मायरा) किया| भाई घोड़े वाही पर जहाँ पर बांधे थे, मिट्टी के घोड़ो के रूप में बदल गए|उसके बाद से यह “मामाजी” का स्थान के नाम से प्रसिद्ध हुआ| गांव से डेढ़ की.मी. दूर वर्तमान मंदिर में बड़ी संख्या में, मिट्टी के रंग-बिरंगे घोड़े स्थापित है| दूर-दूर से यात्रिक अपनी मनोकामना की पूर्ति हेतु दर्शनार्थ आने लगे| वो बहन जैन थी तथा इस घटना को ४०० से ज्यादा वर्ष बीत गए, इसी गांव भी करीब ५०० वर्ष प्राचीन मानते है|

गांव में अन्य मंदिर भी है|स्कूल,आयुर्वेदिक, हॉस्पिटल भी है| नजदीक की बड़ी मंडी ३०कि.मी. दूर रानी या फिर पाली है, जहाँ से साड़ी जरूरतें पूरी होती है| होली व गैर नृत्य यहाँ से प्रसिद्ध है| पुलिस थाना यहाँ से ६कि.मी. दूर एन्दला गुढ़ा में है|