Khiwandi

खिवांदी

 

वीर प्रस्तुत भूमि राजस्थान प्रांत में वीरो एवं दानवीरों की यशोगाथा से इतिहास के पृष्ठों पर नई क्रान्ति का सूत्रपात करते हुए गोडवाड़ के धर्ताल पर अरावली की पहाडियो की सुरमय कंदारीओ की गोड में, सुमेरपुर-तखतगढ़ मुखय सड़क पर जवाईबाँध रेलवे स्टेशन से १८ की.मी. नेशनल हाईवे नं. १४ पर सुमेरपुर मंदी से ९ की.मी. नेशनल हाईवे नं. १४ पर सुमेरपुर मंदी से ९ की.मी. दूर पश्चिमोत्तर दिशा में तीन ओर से पाहाडियो से घिरा हुआ प्राकृतिक सौंदर्य से सरोबार व जवाई नदी के पास नगर बसा है खिवांदी |

इसका प्राचीन नाम है श्रमानंदी| इस नगर को किसने बसाया उसके नाम और इसकी प्राचीनता के कोई एतिहासिक प्रमाण तो प्राप्त नहीं होते, मगर नगरजन इसे बहुत प्राचीन मानते है| वर्तमान में यहां ९७० जैन घर व ५००० के करीब जैन जनसंख्या के विशाल नगर में छ: जैन मंदिर विधमान है|

सेठ आनंदजी कलयाणजी पेढ़ी द्वारा, सं २०१० में प्रकाशित “जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” ग्रंथ के अनुसार, श्री संघ खिवांदी ने, वि. सं. १८५२ में मुलनायक श्री महावीर स्वामी, जो की संप्रति राजा के समय की है, के साथ पाषण की १३ व धातु की ४ प्रतिमाए भूगर्भ से प्राप्त हुई व शिखरबद्ध जिनालय का निर्माण करवाकर, वि.सं. १८५४ में प्रतिष्ठित करवाई| ६० वर्ष पूर्व यहां १००० जैन ३ उपाश्रय व एक धर्मशाला थी| जिनालय का वहीवट श्री संघ की कमेटी करती है|

अतीत से वर्तमान : “जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” ग्रंथ के पृष्ठ क्र. २१३ के लेख के अनुसार, बाजार में शिखरबद्ध जिनालय में मुलनायक श्री महावीर स्वामी की प्राचीन और मनोहर प्रतिमा श्वेतवर्णी, पद्मासन्स्थ, एक हाथ प्रमाण की है, जिसकी प्रतिष्ठा सं. १८५४ में करवाई गई है| प्रतिमा पर कोई लेख नहीं है|

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इस मंदिर की प्रतिमाए के बारे में प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग़ाव के ठाकुर देवड़ा श्री अनोप सिंह जी की समय में वि. सं. १८५२ के श्रावण सुदी ११ के दिन, प्रथम गौडी पार्श्वनाथ भगवान की मूर्ति, धर्मशाला के पास के भूगर्भ से प्राप्त हुई थी| बाद में इस जगह पर सावधानी से अधीक खुदाई करवाने पर और १२ प्राचीन जिनबिंब प्राप्त हुए| इसी के साथ बड़ी मात्र में धन भी प्राप्त हुआ| श्री संघ ने जीनालय निर्माण का निश्चय किया और वि. सं. १८५२ के आषाढ़ वादी ३ के शुभ दिन, मंदिर का शिलारोपण किया गया एवं वीर नि.सं. २३२४, शाके १७९८ व वि.सं. १८५४ के फाल्गुन सुदी २, मार्च १७९८ को शुभ मुहर्त में प्रतिष्ठा संपन्न करवाई गई|

प्रतिमाए प्राप्त होने के साथ-साथ पहाड़ में से, आरास पत्थर की खां भी मिली और इसी खां के पत्थरों से मंदिर निर्माण का काम प्रारम्भ हुआ| आश्चार्य की बात यह हुई की मंदिर का निर्माण पूर्ण होते ही खां में से पत्थर का निकलना भी बंद हो गया| इससे नवकोटी मारवाड़ में इस मंदिर की खयाति बड़ी मात्रा में लोग दर्शानार्थ आने लगे| प्रतिवर्ष कार्तिक सुदी १० के दिन मेला लगता है|

शाह मोती कोला के प्राचीन चोपड़े के एक पुट्टा पर लिखे हुए सतावन से यह पता होता है की मंदिर में संगमरमर पाषण की १३ प्रतिमाए है और वर्तमान में जिनालय में १३ प्रतिमाए विधमान है|

सन १९८७ में प्रकाशित “श्री यतींद्र विहार दिनदर्शन, भाग २” के अनुसार, वि.सं. १८५४ के करीब खिमानादी में बने एक सौधशिखरी जिनमन्दिर में मुलनायक श्री महावीरस्वामी प्रभु की एक हाथ बड़ी सफ़ेद वर्ण की प्रतिमा स्थापित है| इसके आलावा भी १२ प्राचीन प्रतिमाए वि.सं. १८५२ में कोटि धर्मशाला की रंग खोदते समय जमीन में से प्रकट हुई है|

आइए, अब आपको ले चलते है जिनालय में……

बाजार में से होते हुए पहाड़ी की तरफ बढ़ते हुए, दूर से ही पहाड़ी की गोड में, देदीप्यमान, देवविमान के स्वरुप, गगनचुंबी विशाल शिखर पर अठखेलिया करती, लहराती ध्वजा, दो विशाल गजराजो पर बैठे रक्षो द्वारा रक्षित कलात्मक तोरणों व झरोखों से यूक्त प्रवेशद्वार, ७-८ सीढ़िया चढ़ते ही दुसरे द्वार से अन्दर प्रवेश करते ही आंखे चकाचौंध हो जाती है| आभास होता है जैसे मानो स्वर्ग लोक से देवराज इन्द्र की स्वर्ण नगरी में खड़े है|

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स्वर्ण से मंडित राणकपुर की याद दिलाती कलात्मक स्तंभों की श्रुंखला, उन पर शोभायमान झीणी कोरणी से यूक्त तोरण, प्रभु जीवन दर्शन के चित्रकारी पट्ट, आरास पत्थर से निर्मित गलीचा रुपी प्रागंण, ५६ दिक्कुमारियो की अलग-अलग मुद्राओ से अलंकृत रंग्मंड़प, प्राचीन व चमत्कारी तीर्थ रक्षक अधिष्ठायकदेव की देहरी, नाग के रूप में धरंनेंद्र प्रतिमा, अंबिकादेवी, सिद्धचक्र पट्ट, गूढ़मंडप में स्थापित सभी संप्रतिकालीन मनभावन प्राचीन प्रतिमाए व मूलगंभारे में विराजमान, इस  अवसपर्णीकाल के अंतिम तीर्थंकर,मुलनायक श्री महावीर स्वामी प्रभु की कल्त्मक परीयूक्त श्वेतवर्णी अलौकिक प्रतिमा, जिसके दर्शन मात्र से रोम-रोम पुलकित हो उठता है| हाथ जुड़ने लगते है| मस्तक नमने लगता है| पैर वंदन करने को आतुर हो उठते है| अंतमर्ण कह उठता है-हे, त्रिलोकनाथ आज आपका दर्शन पाकर में ध्न्य हो गया| मुझे तीन लोक का वैभव मिल गया| मैं निहाल हो गया…. मैं निहाल हो गया…|

प्रभु की दाई तरफ २०वे तीर्थंकर प्रभु श्री मुनिसुव्रत स्वामी तो दाई तरफ प्रभु श्री शांतिनाथ डैड की प्रतिमा प्रतिष्ठित है|

यह तो सिर्फ झांकि है, अभी पूरा मंदिर बाकी है …

आइए, अब जिनालय के पीछे की ओर चलते है… जिधर दखो उधर स्वर्ण से मंडित अदाकारी… कलाकारी…चित्रकारी….!

मूल गंभारे के पीछे फिर से गंभारे यूक्त देहरी में मुलनायक श्री पुरुषादानीय, जन-जन की आस्था केंद्र श्री शंकेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु जिनके आसपास प्रभु श्री महावीर स्वामी, श्री शीतलनाथ प्रभु की अंजनशलाका प्रतिष्ठा वीर नि.सं. २५०२, शाके १८९७, वि.सं. २०३२, माघ शुक्ल १४, शनिवार, फरवरी १९७६ को पू. उपा. श्री दर्शनसागर विजयजी के हाथो संपन्न हुई| रंगमंडप के घूमट में प्रभु श्री नेमीनाथजी की बारात के दृश्य सुन्दर तरीके से अंकित कीए है | आइए अभी थोडा और पीछे चलते है| भामती में आगे बढ़ते ही दर्शन होते है…. “तस्मै श्री गुरुवे नं:”, छोटी सी त्रिशिखरी कलात्मक देहरी में बीच में खिवांदी के उपकारी पू. आ. श्री मंगलप्रभसूरीजी, दाई तरफ गोडवाड़ जोजावर रत्न प्रतिष्ठा शिरोमणि पू. आ. श्रे जिनेंद्रसूरीजी एवं बाई तरफ जिनालय के अंतिम प्रतिष्ठाचार्य श्री दर्शनसागरसूरीजी की प्रतिमाओ की स्थापना वि.सं. २०६४, वैशाख वादी ५, मई २००८ को प्रसिद्ध प्रवचनकार पू. मुनि श्री रैवत विजयजी आ. ठा. की निश्रा में संपन्न हुई|

विशेष : ग़ाव से प्राप्त जानकारी अनुसार, मंदिर की प्रथम प्रतिष्ठा सं. १८५४ में आ. श्री सोमचंद्रसूरीजी के हाथो हुई है|

 

शिलालेख : इस भव्य जिनालय में विराजमान १३ प्रतिमाए, श्रमाँनंदी के ही शेष्ठीवर को स्वप्न दृशटात देकर, भूगर्भ से प्रकट हुई थी| भगवन श्री पार्श्वनाथ की प्रतिमा ने भूगर्भ से प्रकट होते ही कुछ चमत्कार बताए| स्वप्न के अनुसार, मंदिर निर्माण हेतु धन और पत्थर भी भूगर्भ से ही प्राप्त हुए| वि.सं. १८५२, श्रावण सुदी ११, सन १७९५ के शुभ दिन प्रतिमाए प्रतिष्ठती कर स्थापित की गई|

समयान्तर दंड के खंडित हो जाने पर वीर नि.सं. २४५८, शाके १८५३, वि.सं. १९८८, महा सुदी १४ फ़रवरी के शुभ दिन पू. पं. प्रवर श्री कलयाणविजयजी गनीवरय के उप्देश्नुसार, उन्ही की निश्रा में प्रतिष्ठा मोहत्सव कर दण्ड स्थापन एवं ध्वजाधोरण समारोह किया गया|

वीर नि.सं. २५०२, शाके १८९७, वि.सं. २०३२, माघ सुदी १४, शनिवार, फरवरी १९७६ की प्रात: शुभवेला में पाताल से प्रकट हुए भगवान महावीर आदि बिंबो  की प्रतिष्ठा एवं श्री शंकेश्वर पार्श्वनाथादी जिनबिंबो की अंजनशलाका प्रतिष्ठादी मंगलकार्य आचार्य भगवंत श्री मंगलप्रभसूरीश्वरजी वासक्षेप प्राप्तकर आ. श्री सागरनंदसूरीजी के प्रशीषय उपाधयाय श्री दर्शनसागरविजयजी द्वारा, हर्षोलास पूर्वक आयोजित करवाई गई|

ऐसा कहा जाता है की यह प्रतिमाए संप्रति राजा के काल की है जो देवयोग से भूगर्भ  में सम गई थी… श्री जैन सकल संघ, श्रमानंदी| प्रतिवर्ष महा सुदी १४ को श्री के.सी. जैन , खिवांदी/लंदन परिवार ध्वजा चढाते है|

२ . श्री शत्रुंजय मंदिर :

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यह मंदिर ग़ाव के दक्षिणी छोर पर स्थित है| विशाल लंबे भुकंद पा सेठ कपूरचंदजी प्रतापजी शोभावत परिवार द्वारा निर्मित यह देरासर “शत्रुंजयावतार” अथवा “शत्रुंजय” के नाम से प्रसिद्ध है|वि.सं. १७७२ में वैशाख सुदी १३ को भूमिपूजन श्रीमति फुलीबाई कपूरचंदजी प्रतापजी शोभावत (वालदरिया) ने किया| इसकी अंजनशलाका प्रतिष्ठा सं. १९८८, माह सुदी १० को पंजाब केसरी प. पू. आचार्य श्री ललितसूरीजी म.सा. द्वारा हुई| सं. २०२७, माह सुदी १० को बीस विहरमान, सिद्धचक्र, भावी चौबीसी प्रतिष्ठा प. पू. आ. श्री जीनेंद्रसूरीजी म.सा. द्वारा संपन्न कराई गई| इसी तरह सं. २०५४, जेठ सुदी ६ को श्री गौतमस्वामी, श्री नाकोडा भैरूजी , श्री अंबिका देवी की प्रतिष्ठा प. पू. श्री पद्मसूरीजी म.सा. ने संपन्न करवाई|

“जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” ग्रंथ के अनुसार, ग्राम के बाहर श्री कपूरचंदजी प्रतापजी शोभावत परिवार द्वारा स्वद्रव्य से निर्मित शिखरबद्ध मंदिर में वीर नि.सं. १९८९ में मुलनायक श्री आदिनाथ सह पाषण की 4 और धातु की 4 प्रतिमाए स्थापित करवाई गई| उन दिनों इसका वहीवट श्री रिखबदासजी चमनाजी करते थे| यह देरासर शत्रुंजयवतार के रूप में प्रसिद्द है|

shatrunjay bhagwaan

विशाल शयामवर्णी दो हाथियो से शोभित प्रथम प्रवेशद्वार के अन्दर प्रवेश करते ही झरोखो से शोभित जिनालय का मुखय द्वार व विशाल स्वर्ण मंदिर रंगमंडप, कल्त्मक शिखर से शोभायमान गर्भगृह में देवलोक के देवो को भी जिनकी भक्ति करने का मन होता है, ऐसे श्री शत्रुंजय तीर्थाधीपति प्रथम तीर्थंकर प्रभु श्री आदिनाथ दादा की मन को मोहनेवाली उत्तम प्रतिमा प्रतिष्ठित है| इस मंदिर में बीस विहरमान तथा गत चौविसी के तिर्थंकरो की प्रतिमाए स्थापित है| १०० वर्ष प्राचीन मंदिर के मुलनायक श्री आदिनाथ प्रभु की प्राचिंप्रतिमा को मेवाड़ से लाकर प्रतिष्ठा की गई है| मुखय प्रवेशद्वार के ठीक ऊपर की देहरी में गुरु मंदिर बना है| जिनालय में शत्रुंजय तीर्थ का बहुत बड़ा विशाल पट्ट बना है| संपूर्ण मंदिर परिसर को स्वर्णयूक्त कोरणी से आकर्षक बनाया गया है, ज्सिमे दर्शनार्थ अपनी आँखों को तृप्त करता हुआ परमात्मा की भक्ति में लीन हो जाता है|

श्री आदिनाथ प्रभु का यह विख्यात श्री शत्रुंजय मंदिर कई वर्ष पुराना है| सन १९९४ की प्रतिष्ठा को धयान में लेकर शोभावत परिवार ने अपने निजी मंदिर की व्यवस्था हेतु इसे मार्च १९९४ में खिवांदी पोरवाल जैन समाज की व्य्वस्था हेतु सुपुर्द कर दिया| संघ ने ११ लोगो का ट्रस्ट गठन कर श्री भबुतमलजी रीकबचंदजी शोभावत को अध्यक्ष नियूक्त किया| ट्रस्ट मंडल ने वीर नि. सं. २५२०, शाके १९१५, वि.सं. २०५०, जेष्ठ मॉस, दी. ३० मई १९९४ को श्री आदिनाथ प्रभु के पास एक विशाल हॉल में श्री शत्रुंजय गिरिराज तथा आदिनाथ भगवान के भवो के पट्ट का निर्माण करवाया गया है|

३. श्री सप्तफणा पार्श्वनाथ मंदिर :

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खिवांदी नगर के मुखय सड़क पर “अंबा बावड़ी” नामक प्रसिद्ध बावड़ी का श्रीमान तिलोकचंदजी चिमनाजी रामिणा एवं स्व. खूमिबाई परिवार द्वारा ७०-८० वर्ष पूर्व, लोकहीतार्थ निर्माण हुआ था| स्थानीय लोगो के पीने का पानी व पशुओ हेतु अवाडा का निर्माण हुआ| कालांतर में परिवार की भावना जिन मंदिर निर्माण की बनी| इसी के अंतगर्त प्रथम बावड़ी को उपरी तौर पर बंद करके, उसी के ऊपर निर्माण काम प्रारंभ किया गया|

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सं. २००५ में महा सुदी ५ को पू. आ. श्री सिद्धिसूरीजी के निर्देशन में पं. प्रवर श्री कलयाणविजयजी, पं. श्री सौभाग्यविजयजी के करकमलों से जाबलीपुर में अंजनशलाका करवाकर मंदिर के पास की पोल में भगवान को मेहमान तरीके से विराजमान किया गया| स्वद्रव्य द्वारा आरास पत्थर से निर्मित भव्य शिखरबद्ध जिनप्रसाद में वीर नि.सं. २४८१, शाके १८७६, वि.सं. २०११, ई. सन १९५५ में तीर्थोध्वरक श्री नीतिसूरीजी के पट्टधर पू. सकलगम रहस्यभेदी आ. श्री हर्षसूरीश्वरजी म. सा. शीषय श्री मंगलविजयजी आदि ठाना के करकमलों से परमात्मा मुलनायक श्री सप्तफणा पार्श्वनाथ प्रभु आदि जिनबिंब व अंबाजी माता, यक्ष-यक्षणी आदि प्रतिमाओं की अंजनशलाका प्रतिष्ठा मोहत्सवपूर्वक सुसंपन्न हुई| समय के साथ शिखर एवं जिनालय में दोष निर्माण होने से ट्रस्ट ने इसका जिणोरद्वार करवाया और इसकी पुन: प्रतिष्ठावीर नि.सं. २५१९, शाके १९१४, वि.सं. २०४९, वैशाख सुदी ६, दी. २८ मई १९९६ को, दीक्षा दानेशवरी पू. आ. श्री गुणरत्नसूरीजी आ. ठा. के वरद हस्ते, मोहत्सवपुर्वक संपन्न हुई| श्री तिलोकचंदजी की वसीयत अनुसार पांच लोगो की ट्रस्ट कमेटी इसकी व्यवस्था संभालती है|

४ . श्री केशरीयाजी मंदिर :

kesariyaji bhagwaan

नगर के मुखय बाजार में श्री अचलचंदजी चत्तरभाणजी पोरवाल ने अपने स्वद्रव्य से भव्य गृह मंदिर का निर्माण करवाया, जिसकी प्रथम मंजिल पर कलात्मक कांच मंदिर से संगमरमर आरास पत्थर से निर्मित कल्तामक देहरिनुमा शिखरबद्ध जिनमंदिर में प्रथम तीर्थंकर मुलनायक श्री केशरीया आदिनाथ प्रभु की शयामवर्णी, पद्मासनस्थ प्रतिमा सह श्री शांतिनाथजी, श्री पार्श्वनाथजी व अनय जिनबिंबो की अंजनशलाका प्रतिष्ठा पू. आ. श्री विजयजिनप्रभसूरीश्वर्जी आ. ठा. के करकमलों से, वीर नि. सं. २४७८, शाके १८७६, वि.सं. २००८, जेठ सुदी ८, जून १९५२ को, हर्षोलास व मोहत्सवपूर्वक संपन्न हुई| इन प्रतिमाओं में श्री शांतिनाथजी व शयामवर्णी पार्श्वनाथ प्रभु की अंजनशलाका, वि.सं. १९९८ के मार्गशीर्ष शुक्ल ६, रविवार को पं. प्रवर श्री कलयाणविजयजी के हस्ते हुई है| निर्माता परिवार ने बाद में जीनालय को वहीवट हेतु श्री जैन संघ, खिवांदी के सुपुर्द कर दिया|

५ . श्री ज्ञान मंदिर : खिवांदी मुखय मार्ग पर श्री सप्तफणा पार्श्वनाथ जिनमंदिर के ठीक सामने स्व. श्री कपूरचंदजी वनेचंदजी ओसवाल कासम गोत्र चौहान परिवार द्वारा स्व. निहालचंदजी की स्मृति में स्वद्रव्य से निर्मित श्री विनयचंद्र जिनेंद्र पौषधशाला के विशाल भवन की ताल मंदिर पर उपाश्रय हॉल से लगकर गृहनुमा जिनमंदिर में कमलाकार पबासन पर श्री सिद्धचक्रजी चौमुखी जिनप्रतिमाओ, श्री ऋषभानंदजी, श्री चंद्राननजी, श्री वारिषणजी व श्री वर्धमान की अंजनशलाका प्रतिष्ठा, वीर नि.सं. २४९८, शाके १८९३, वि.सं. २०२८, वैशाख सुदी ६, शुक्रवार दी.30.4.१९७२ को, गोडवाड़ रत्न, प्रतिष्ठा शिरोमणि पू. आ. श्री जिनेन्द्रसूरीजी के करकमलों से, मोहत्सवपुर्वक प्रतिष्ठा संपन्न हुई| स्वंय श्री जिनेन्द्रसूरीजी की उपस्थिति में उनकी स्वंय-प्रतिमा की स्थापना इसी मुहर्त में शीषयरत्न श्री विनयविजयादी हस्ते हुई| साथ ही नितोड़ावाले “बबोजी”, अधिष्ठायक श्री मणिभद्रवीर, चक्रेश्वरीदेवी आदि प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा भी साथ में संपन्न हुई|

६ . श्री नीलकमल पार्श्वनाथ मंदिर :

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श्रीमती तिपुबाई रत्नचंदजी मुथा रिलीजीयस चैरिटेबल ट्रस्ट, खिवांदी-बांकली सड़क किनारे, भव्य-दीव्य शिखरबद्ध जीनालय का आरास पत्थर से निर्माण हुआ| प्रथम इस भूमि पर परिवारजन अपना निजी बंगला बना रहे थे, तब मातोश्री तिपुबाई ने, बंगले के साथ एक छोटा सा जिनमंदिर बनाने की इच्छा अपने परिवार के सामने रखी| परिवार ने प्रेरणा का आदर करते हुए उपरोक्त ट्रस्ट द्वारा बंगले के साथ मंदिर निर्माण का नीरणय लिया| दूसरी ओर मातोश्री को सपने में “नीलकमल पार्श्वनाथ” प्रभु की प्रतिमा प्रतिष्ठत करने का संकेत मिला|मुंबई में विराजित पू. आ. श्री यशादेवसूरीजी से मुथा परिवार ने चर्चा द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त कर कमलाकर मंदिर का निर्माण प्रारंभ करवाया| समय के साथ मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ|

ट्रस्ट के देवविमान स्वरुप जिनमंदिर में मुलनायक श्री पुरुषादानी नीलकमल पार्श्वनाथ की नीलवर्णी, २७ इंची, पद्मासनस्थ प्रतिमा के चौमुखा आसन पर प्रभु श्री आदिनाथ श्री धर्मनाथ व श्री वासुपूजय भगवान जिनबिंबो की अंजनशलाका प्रतिष्ठा वीर नि.सं. २५२१, शाके १९१६, वि.सं. २०५१, वैशाख सुदी ७, रविवार दी. ७, मई १९९५ को श्री नीतिसूरीजी समूदायवर्ती गच्छाधिपति आ. श्री अरिहंतसूरीश्वर्जी एवं पू. श्री चंद्राननसागरसूरीजी आ. ठा. की पावन निश्रा में हर्षोलास से संपन्न हुई| ट्रस्ट द्वारा जिनालय परिसर में श्री सम्मेतशिखरजी तीर्थ का निर्माण काम शुरू हुआ| माँ पद्मावती एवं श्री नाकोडा भैरवदेव की विशाल प्रतिमाए स्थापित है|

parshvanath bhagwaan

संयम पंथ : इस पावन मरुधरा से २ आचार्य सहित लगभग २० दिक्षार्थी-मुमुक्षुओ ने संयम लेकर जिन धर्म की पताका को लहेराया और कूल व नगर का नाम रोशन किया| पू. आ. श्री चंद्रोदयसूरीजी व पू. आ. श्री कनकध्वजसूरीजी म. सा. सांसरिक पिता-पुत्र है| इन्होने खिवांदी के नाम को उंचाई तक पहुचाया है|

खिवांदी : इस विशाल नगर में छ: जैन मंदिर तथा जैनों के ९१७ घरो की कूल ५००० के करीब जनसंख्या है| अजैनो के १३०० घर है| हाईस्कूल, कन्याशाला, गांधी मेमोरियल अस्पताल, देशी दवाखाना, मारवाड़ ग्रामीण बैंक, ग्राम सेवा सहकारी समिति आदि साड़ी सुविधाए है|

श्री वाराही माता मंदिर, नीलकंठ महादेव, बाबा रामदेव आदि भक्तो के आस्था के केंद्र है| पाहड पर स्थित श्री आशापुरा माता का मंदिर एक सिद्ध शक्तिपीठ है|


खिवांदी के शासनरत्न

पू. आ. श्री कनकशेखरसूरीजी (खिवांदी)

जन्म : वि.सं. १९९७ (अंदाजन)

जन्म स्थान : खिवांदी , जिला-पाली (राजस्थान)

जन्म नाम : कुंदनमल

माता : जतनोबेन

पिता : श्री चंदनमलजी जेठाजी-भेराजी (बाद में आ. श्री चंद्रोदयसूरीजी म.सा. )

बहन : वागड सामुदाय में सा. श्री दिनकरश्रीजी व सा. श्री दिनमणिश्रीजी बड़ी बहन शांताकुमारी की शादी हुई|

दीक्षा : वीर नि.सं. २४८१ , शाके-१८७६ , वि.सं. २०११ , जेठ सुदी ५ जून १९५५ को (उम्र १४ वर्ष) पिताश्री के साथ स्वऍम की दीक्षा पू. आ. श्री रामचंद्रसूरीजी के हस्ते..

नामकरण : पू. मु. श्री कनकध्वजविजयजी व आ. श्री के शिष्य बने|

गणी एवं पंनयास पद : वि.सं. २०४६ , वैशाख सुदी १२ , मई १९९० को मुंबई में “गणी एवं पंनयास पद” से अलंकृत हुए|

शिष्य : पू.  मु. श्री कीर्तिध्वज वि. दीक्षा सं. २०४५ , वैशाख वदी ६


पू. आ. श्री चंद्रोदयसूरीश्वर्जी (खिवांदी) – स्वाध्यायमग्न, संयमनिष्ठ, प्रशांतमूर्ति