Shree Kesharwadi Tirth

Shree Kesharwadi Tirth – Puzhal (Chennai)

 

 

श्री केशरवाडी तीर्थ – पुझल

चेन्नई-कोल्कता राष्ट्रीय राजमार्ग महानगर से लगभग १४ की.मी. की दुरी पर पुलल गाँव के मध्य श्री केशरवाडी तीर्थ बसा हुआ है| पुझाल तीर्थ के नाम से भी सुविख्यात है| यहाँ की जनता इस मारवाड़ी-कोविल(मारवाड़ियों का मंदिर) के नाम से जानती है | मुलनायक दादा श्री आदिनाथ प्रभुजी की कसौटी पाषण से निर्मित श्यामवर्णीय ५१” की प्रतिमाजी ईसा की दूसरी/तीसरी शताब्दी की बतलाई जाती है| दक्षिण भारत के प्रमुख श्वेताम्बर जैन तीर्थों में श्री केशरवाडी तीर्थ का विशिष्ट स्थान है| यहाँ बिराजित मुलनायक दादा श्री आदिनाथ प्रभुजी, श्री केशरियाजी तीर्थ के मुलनायकजी के सहश होने से, यह तीर्थ केशरवाडी के नाम से प्रख्यात हुआ है|

इस क्षेत्र का नाम पुडल-कोटालम (राजधानी पुडल) था| पूर्वकाल में यहाँ विभिन्न धर्मों के कई मंदिर थे| आज भी भग्रावस्था में कुछ मंदिर यहाँ द्रष्टिगत होते है| इस आधार पर हमें पता चलता है की यह क्षेत्र पूर्व काल से ही एक प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर है| इन अनेक स्मारकों के मध्य यह मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था| ईस्वी सन १८८७ से चेन्नई नगरवासी जैन परिवार यहाँ दर्शनार्थ आते रहते थे| उस समय पुडल क्षेत्र निर्जन सा था और यहाँ आने हेतु कोई सुरक्षित मार्ग भी नहीं था| अत: पांच-छह के समूह में जैन परिवार बैल गाड़ियों एवं घोडा गाड़ियों द्वारा यहाँ आते थे एवं दर्शन पूजा कर, खान पान कर संध्या के समय लौट जाते थे| इस तीर्थ के निकट ही कमल पुष्पों से सुशोभित एक जलकुंड था, जो आज भी मौजूद है| पास ही प्राचीन शिवमंदिर होने के कारण इस क्षेत्र को “फुलिया महादेवजी” के नाम से भी जाना जाता था|

तीर्थ का प्राचीन इतिहास आज उपलब्ध नहीं है| सन १८८७ से प्राचीन दस्तावेज उपलब्ध है| जिनमें मद्रास शहर के श्वेताम्बर जैन क्षेष्ठियों एवं श्रीमंतों का इस तीर्थ के न्यासी (ट्रस्टी) होने का उल्लेख है|इस क्षेत्र के वयोवृद्ध एवं अनुभवी लोगों के द्वारा यह जानकारी मिली है की पूर्व काल में उड़ीसा से एक भव्य रात्री संघ का आगमन इस क्षेत्र में हुआ था| उनके साथ एक तपस्वी मुनिराज भी थे|उनका नियम था की जिनेश्वर परमात्मा के दर्शन के पश्चात ही मुहं में पानी डालना, ये मुनिराज इस क्षेत्र की यात्रा के दौरान मार्ग भटक गए एवं पुडाल गाँव में उनका आगमन हुआ| उस समय यहाँ कोई जिनमन्दिर नहीं था अत: मुनिराज को कई दिनों तक निर्जल उपवास करने पड़े| उनकी अशक्ति बढती गई, लेकिन उन्होंने अपना नियम नहीं तोडा| एक रात स्वप्न में माता पद्मावती ने उन्हें निकट की एक जगह का निर्देश दिया और बतलाया की भूमि के अन्दर वहाँ पर दादा आदिनाथ की प्रतिमा अवस्थित है| अगले दिन मुनिराज को ढूढतेहुए, यात्री संघ के कार्यकरता पधारे| गुरुदेव ने इस स्वप्न का जिक्र उनसे किया, और निर्दिष्ट स्थान पर खुदाई की गई तदुपरान्त वहाँ पर श्री आदिनाथ परमात्मा की विशाल सुन्दर प्रतिमाजी के दिव्य दर्शन हुए| गुरुभगवंत की पावन प्रेरणा से उसी स्थान पर जिनमंदिर का निर्माण कर श्री आदिनाथजी की प्रतिमा प्रतिष्टित की गई एवं मुनिराज के चरण पादुकाओं को भी बिराजमान किया गया| आज भी ये चरण पादुका मंदिरजी में अवस्थित है| कालान्तर में मंदिर जीर्णावस्था को प्राप्त हुआ और १३वि शताब्दी में एक राजा ने इस जिनालय का जिणोरद्वार करवाकर आस पास की भूमि मंदिरजी के निर्वाह हेतु समर्पित की|

वि.सं. २०१६  (ई.सन १९६०) में पू. आचार्य श्रीमद् विजय विज्ञानसुरिश्वर्जी के प्रशिष्य प.पू. पंन्यास प्रवर श्री यशोभद्र विजयजी “गणिवर्य” आदि की शुभ निश्रा में माघ शुक्ल दसम के दिन नए ध्वज दंड एवं कलश की स्थापना की गई थी| इसी दिन नए शिखर में श्रे शंखेश्वर पार्शवनाथ परमात्मा की प्रतिमाजी की प्रतिष्ठा भी सुसंपन्न हु थी|

स्वामीजी श्री ऋषभदेव जी की प्रेरणा से श्री जैन मिशन सोसायटी. मद्रास द्वारा इस क्षेत्र के कलेक्टर को लगभग ६.२५ एकड़ भूमि दान हेतु एक अर्जी दी गई थी| वि.सं. २०१९ के दौरान प.पू. आचार्य भगवंत श्री पुरनानन्दसुरिश्वर्जी म.सा. का शुभगमन इस तीर्थ पर हुआ| आचार्य भगवंत इस तीर्थ की आध्यात्मिक उर्जा से प्राभावित हुए एवं तीर्थ पर कुछ समय के लिए स्तिरथा की| उस समय उनके नौवा वर्षीतप चल रहा था| इन दिनों क्षेत्र के कलेक्टर का पि.ए. दर्शनार्थ इस तीर्थ पर आया एवं प.पू. आचार्य भगवंत श्री पूर्णानंदसुरिश्वर्जी म.सा. से भी मिला|उसने गुरुदेव को बतलाया की उसके दामाद ने मार पीटकर उसकी पुत्री को घर से निकल दिया है| आचार्य भगवंत ने उसे आश्वासन दिया की तीस दिनों के भीतर उसका दामाद मद्रास आकर श्रमा मांगते हुए, उसकी पुत्री को लिवा ले जाएगा| २७ दिनों तक कोई घटना नहीं घटी एवं कलेक्टर के पी.ए. साहब दुखी मन से आचार्य भगवंत के पास आए| आचार्य भगवंत ने बतलाया की अभी तक तीस दिन पुरे नहीं हुए है| ठीक उसके दुसरे दिन पी.ए. का दामाद अपने रिश्तेदारों के साथ आया, उसने अपने दुर्व्यहवार के लिए क्षमायाचना की| उसके रिश्तेदारो ने उसकी पुत्री के शुभविषय का आश्वासन दिया|पी.ए. साहब ने सहर्ष अपनी पुत्री दामाद के साथ विदा किया| इस घटना से कलेक्टर का पी.ए. आचार्य भगवंत से बहुत ही प्राभावित हुआ एवं उसने सम्पूर्ण घटना का बयान कलेक्टर साहब से किया| कलेक्टर व पी.ए. दर्शनार्थ तीर्थ पर पधारें एवं आचार्य भगवंत के प्रति आभार प्रदर्शित किया| कलेक्टर द्वारा किसी सहायता की बात पूछने पर गुरुदेव ने ६.२५ एकड़ जमीन हेतु श्री जैन मिशन सोसायटी द्वारा दी गई अर्जी की ओर उनका ध्यान आकार्षित किया| सन १९६४ में पुलल पंचायत के तत्वावधान में ६.२५ एकड़ जमीन श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर के नाम लिख दी गई| जिसके दस्तावेज आज भी उपलब्ध है|

प.पू. आचार्य श्री कलापूर्णसुरिश्वर्जी म.सा. की सद्प्रेरणा से तीर्थ परिसर में श्री शंखेश्वर पार्शवनाथ प्रभु के जिनालय का निर्माण करवाने का निर्णय न्यास मंडल ने लिया एवं उन्हीं की पावन निश्रा में ज्येष्ठ शुक्ला बीज, दी. ३१.५.१९९५ को नूतन जिनालय का शिलान्यास किया गया| ट्रस्ट मंडल ने तीन मंजिल एवं मेघनाद मंडप से सुशोभित जिनालय निर्माण का कार्य हाथ में लिया| ताल-भाग में श्री आदिनाथ परमात्मा के साथ श्री भक्तामर मंदिर का निर्माण हुआ| मुख्य उपरी प्रथम मंजिल में श्री शंखेश्वर पार्शवनाथ प्रभु, रंग मंडप में श्री शीतलनाथ प्रभु एवं श्री सीमंधर स्वामी प्रभु की प्रतिमाओं के बिराजमान हेतु दो कलात्मक देहरियों का निर्माण किया गया | मेघनाथ मंडप में भी त्रि-द्वार वाले गम्भारे का निर्माण किया गया एवं इनमें श्री मुनिसुव्रतस्वामी, श्री चंद्रप्रभुस्वामी एवं श्री वासुपूज्यस्वामी को बिराजमान करने का निर्णय लिया गया| जिनालय के निर्माण में लगभग दस वर्ष लगे|

तीर्थ पर अनेक उपधान तप विभिन्न गुरुभगवंतों की निश्रा में हुए है| यहाँ पर ज्ञान शिविर भी यदा-कदा होते रहते है| तीर्थ परिसर में ज्ञान भंडार भी निर्मित किया गया है, जिसमें अनेक प्राचीन ग्रंथादी का अद्भुत संग्रह है|

 

श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर

श्री केशरवाडी तीर्थ नं. ३७, गाँधी रोड, पुलल, चेन्नई – ६०० ०६६

संपर्क : २३४६ ८८४४, २३४६ ८९००