Kavla

कवलां(कवलपुर, ओलावती नगरी)

शूरवीरों से शोभित राजस्थान प्रांत के जालोर जिले में आहोर तहसील की सीमा पर एवं राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४पर स्थित सांडेराव से ३० की.मी. दूर वाया कोशेलाव-रोडला-भूति होकर भूति से ५ की.मी. दूर पहाड़ की गोद में बसी है, एक प्राचीन नगरी “कवलां” |

लगभग २५०० वर्ष से भी अदीक प्राचीन यह गांव पहले ओलावती नगरी के नाम से जाना जाता था | यह कोसों फैली भूमि पर हजारों परिवारों की एक विशाल बस्ती थी| इस गांव का प्राचीन नाम “कवलपुर” भी था, जो अपभ्रंश होते-होते वर्तमान में सिर्फ “कवलां” रह गया| दो हजार वर्ष पहले यहां जैनों के सैकड़ों परिवार थे, लेकिन वर्तमान में एक भी घर नहीं है| सिर्फ राजपूत परिवारो की अच्छी बस्ती है| तालाब की पाल पर प्राचीन छतरिया बनी है| जिनालय में लगे संस्कृत शिलालेख से ज्ञात होता है की ओलावती नगरी के केवलपुर में वि.सं.१११ में यहाँ के जिनप्रसाद में मुलनायक प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ की प्राचीनता सम्झिजा सकती है| प्रतिमा पर सं. १११ का संवत् लेख अंकित है|

कालांतर में वि.सं. ५०६ में किसी कारणवश मुलनायक बदलकर तीसरे तीर्थंकर श्री संभवनाथ स्थापित हुए| पुन: वि.सं. १५४५ में श्री शांतिनाथ प्रभु की प्रतिष्ठा संपन्न हुई| वीर नि.सं. २३८३, शाके १७७८ और वि.सं. १९१३ में मुलनायक के स्थान पर सम्भवनाथ स्वामी स्थापित हुए|पुन: जिणोरध्वरित जिनमंदिर की वि.सं. १९८७ में प्रतिष्ठा संपन्न हुई|

अतीत से वर्तमान: पहाड़ी की गोद में उंचाई पर रावला के पास गोदो की वास में स्थित विशाल जिनप्रसाद में शिखरबद्ध गर्भगृह में श्वेतवर्णी, २१ इंची , पद्मासन्स्थ, तीसरे मुलनायक , असंभव को संभव बना दे ऐसे , प्रभु श्री सम्भवनाथ स्वामी की प्राचीन व अलौकिक प्रतिमा की दृष्टिदोष में शुद्धी करके , मुलनायक के साह प्राचीन शांतिनाथ स्वामी एवं श्री पार्शवनाथ प्रभु प्रतिमाओं की वीर नि.सं. २४८८, शाके १८८३ और वि.सं. २०१८, द्वितीय ज्येष्ठ शुक्ल ३, शुक्रवार ,जून १९६२ को पुष्य नक्षत्रे ध्रुव रविराज योग में श्री खैताचल तिर्थोद्वारक पू. आ. श्री नीतिसुरीजी पट्टे आ. श्री हर्षसूरीजी शिष्य पू. पंन्यास प्रवर श्री ,मंगल विजयजी गणिवर्य (बाद में पू.आ.श्री मंगलप्रभासुरीजी) के करकमलों से, श्री शीलावटी संघ कमिटी ने हर्षोल्लास से प्रतिष्ठा संपन्न करवाई | प्रतिवर्ष जेठ सुदी ३ को प्राचीन कवलां निवासी श्री पणराजजी कपूरचंदजी पुनमिया परिवार (वर्तमान भूति/सुमेरपुर) ध्वजा चढाते है|

अंतिम प्रतिष्ठा : वर्षों से जिनालय का आरास पत्थर से शुशोभीकरण का कार्य चालु है| श्री शीलावटी संघ कमिटी , जो पांच गाँवों के प्रतिनिधियों से चुनी जाती है , यहाँ की व्यवस्था देखती है| वर्तमान में भूति ,कवराडा, वलदरा और रोडला (कवलां छोड़) गांव के प्रतिनिधि यहां की व्यवस्था का संचालन करते है|वीर नि.सं. २५३५, शाके १९३०, वि.सं. २०६५, वैशाख वदी ,दी. २०.४.२००९ को, पू. आ. श्री अरिहंत सिद्धसूरीजी के पट्टधर पू आ. श्री हेमप्रभसूरीजी आ. ठा. व आ. श्री ललितप्रभाश्रीजी (लहरो म.सा.) आ. ठा. की निश्रा में, जिनालय के रंगमंडप में नूतन निर्मित कलात्मक देह्रियों में प्राचीन वि.सं. १११ के मुलनायक श्री आदिनाथ प्रभु की प्रतिष्ठा तथा २०वे तीर्थंकर प्रभु श्री मुनिसुव्रतस्वामी की एवं प्राचीन आदिनाथ चरणपादुका की प्रतिष्ठा मोहत्सवपूर्वक चतुर्विध संघ की उपश्थिति में सुसंपन्न हुई| श्री मुनिसुव्रत स्वामी प्रतिमा लेख अनुसार, पंन्यास प्रवर श्री कल्याण विजयजी के हस्ते , ज्येस्थ्शुक्ल ७, बुधवार को अंजनशलाका संपन्न हुई है| प्रतिवर्ष चैत्र सुदी पूनम व कार्तिक पूनम को यहाँ मेला लगता है| दूरदराज से यात्रिक मेले पर आकर भक्ति का आनंद लेते है| ५कि.मी. दूर भूति में दो जिनमंदिरों के दर्शन-वंदन का भी लाभ प्राप्त होता है|

दीक्षा मोहत्सव : कवलां नगर की कुलवधु श्रीसरदारमलजी किशनलालजी सेमलानी की धर्मपत्नी व भूति निवासी वेदमुत्था पूनमचंदजीकी सुपुत्री पेपिबाई की भागवती दीक्षा भूतिनगर में वीर नि.सं. २४४४, शाके १८३९, वि.सं. १९७४ के आषाढ़ शुक्ल २, जुलाई १९७८ में, दादा गुरुदेव श्री राजेंद्रसूरीश्वर्जी के शिष्य रत्न मु. श्री हर्षविजयजी एवं अंतिम शिष्य बालीरत्न मु.श्री चन्द्रविजयजी आ. ठा. पू. प्रवर्तिनी सा. श्री प्रेमश्रीजी आ. ठा. ९ की निश्रा में संपन्न होकर ,सा. श्री हीरश्रीजी नामकरण हुआ| आपश्री ने जीवन के अंतिम १४ चातुर्मास स्वास्थ्य के कारण भूति में किये और वि.सं. २०४५, प्रथम जेठ वदी ८, मई १९८८ को भूति में आपका स्वर्गवास और अंतिम संस्कार संपन्न हुआ|