Jawali

जवाली

गौरवशाली राज्य राजस्थान के पाली जिले के गोडवाड़ क्षेत्र में सोमेसर रेलवे स्टेशन से १० की.मी. और रानी स्टेशन से २० की.मी. दूर महर्षि जबाली ऋषि की पूण्य तपोभूमि में प्राकृतिक सौंदर्य से भरापूरा अरावली पर्वतमाला की उपत्याकाओं से चारों ओर घिरा हुआ नाडोल,रानी,सोमेसर एवं विजोवा आदि प्रमुख स्थानों के मध्य बसा है “जवाली” गांव|

“जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” ग्रंथ के अनुसार , उस समय गांव के शिखरबद्ध जिनमंदिर में मुलनायक श्री पद्मप्रभु सह पाषण की ३ प्रतिमाएं एवं धातु की १ प्रतिमा स्थापित थी एवं संघ द्वारा वहीवट होती थी| ६० वर्ष पूर्व उस समय यहाँ ८० जैन ,१ उपाश्रय और एक धर्मशाला थी| श्री पद्मप्रभु की प्रतिमा पर चिंत्राकिट लेख अनुसार यह वि.सं. १९५१ माघ शुक्ल ५, गुरूवार को प्रतिष्टित प्रतीत होती है|संभवत: इसी मुहूर्त पर वरकाणा प्रतिष्ठा मोहत्सव में भट्टरक श्री राजसुरिश्वर्जी के करकमलों से प्रतिष्टित ६०० प्रतिमाएं के साथ हुई थी | इसी प्रकार ८० वर्ष पूर्व प्रकाशित “मेरी गोडवाड़ यात्रा” इस पुस्तक के संदर्भ से १ जिनालय में मुलनायक श्री महावीरस्वामी प्रभु, १ उपाश्रय व ओसवालों के ६० घर थे|

जवाली निवासियों के मुताबिक गांव में एक शिखरबद्ध जिनालय में मुलनायक श्री पद्मप्रभु पाषण की ३ प्रतिमाएं अवं धातु की १ प्रतिमा की प्रतिष्ठा वि.सं. २००३ में जैनाचार्य श्रीमद् विजय जिनेन्द्रसूरीश्वर्जी की निश्रा में करवाई थी| उस समय यहाँ ८-१० जैन परिवार बसते थे| समयानुसार गांव का विकास हुआ एवं जैन परिवारों की संख्या बढ़ने लगी| आवश्यकतानुसार द्वितीय मंदिर के निर्माण का निर्णय लिया गया| विधानुरागी, सौजन्य मूर्ति जैनाचार्य, श्रीमद् विजय जिनेन्द्रसुरिश्वर्जी के पट्टधर, ज्योतिष शिल्पज्ञ श्रीमद् विजय पदम्सूरीश्वर्जी म.सा. आदि ठा. की निश्रा में वीर नि.सं. २५०२, शाके १८९८ वि.सं. २०३२ , ज्येष्ठ सुदी ११ को, द्विमंजिला जिनालय का खनन मुहूर्त व वीर नि.सं. २५०२, शाके १८९८ वि.सं. २०३२, माह सुदी ११ को , फ़रवरी १९७६ में शिलान्यास संपन्न हुआ| पश्चात् ताल मंजिल पर पद्मासनस्थ श्री धर्मनाथ भगवान संग श्री सीमंधरस्वामी व श्री नेमिनाथजी का त्रिगडा व पहली मंजिल पर पूर्व के प्राचीन मुलनायक श्री पदम्प्रभु भगवान संग श्री शांतिनाथजी व आदिनाथजी का त्रिगडा के साथ यक्ष-यक्षिणी, श्री मणिभद्रवीर, श्री घंटाकर्णवीर, श्री पद्मावतीदेवी आदि प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा शासनरत्न प.पू. आचर्य भगवंत श्रीमद् विजय सुशील सूरीश्वर्जी म.सा. आदि ठा. ८ व साध्वी भगवंत आ. ठा. ४० की निश्रा में वीर नि.सं. २५१३, शाके १९०९ वि.सं २०४३, वैशाख सुदी ६, सोमवार दी.४-५-१९८७ को एकादशाहिनका (११ दिवसीय) महामोहत्सव दरम्यान शुभ मुहूर्त में संपन्न हुई| प्रतिवर्ष वैशाख सुदी ६ को चंपाबाई मूलचंदजी शाह परिवार ध्वजा चढाते है |

श्री नाकोडा पार्शवनाथ मंदिर :  गांव के घासीराम वास के मानिक चौक में स्थित शिखरबद्ध जिनप्रसाद में श्री पुरुषादानी श्री नाकोडा पार्श्वनाथ की श्वेतवर्णी, पद्मासनस्थ, भव्य-दिव्य परिक्रमयुक्त प्रतिमा सह श्री धर्मनाथजी व मुनिसुव्रतस्वामी की अंजनशलाका प्रतिष्ठा शासन प्राभावक ज्योतिष शिल्पज्ञ श्रीमद् विजय पदम्सुरिश्वर्जी म.सा. आदि ठा. के वरद हस्ते वीर नि.सं. २५२१, शाके १९१६ वि.सं. २०५१, वैशाख सुदी 7, रविवार दी. ७-५-१९९५ को मोहत्सव पूर्वक संपन्न हुई|घासीराम वास में सभी घर दिशा-ओसवालों के है एवं सभी के व्यवसाय चेन्नई के सेलुरताम में है| श्री नाकोडा पार्शवनाथ मंदिर के समीप विशाल धर्मशाला का निर्माण पूर्ण होने जा रही है , साथ ही उपाश्रय व पेढ़ी भवन का कार्य का निर्माणाधीन है| भोजनशाला भी शीघ्र आरंभ होगी|

अनेक वर्ष बाद पुराने मंदिर में श्री आदिनाथ भगवान के पगलिये एवं श्री नाकोड़ा भैरवदेव व नूतन श्री धर्मनाथ प्रभु के मंदिर में श्री गौतम स्वामी, श्री चकेश्वरीदेवी, श्री महालक्ष्मीदेवी, श्री सरस्वती देवी ,स हरी आंबेमाता देवी आदि प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा वि.सं. २०६३, वैशाख सुदी १२, रविवार, दी. २९-४-२००७ को प.पू. आचार्य भगवंत श्री हिरण्यप्रभसुरिश्वर्जी म.सा. आदि ठा . की निश्रा में व सकल संघ की उपस्थिति में पंचाहिंका(५ दिवसीय) महामोहत्सव दरम्यान सुसंपन्न हुई| इस समय गांव में १९० जैन परिवार बसते थे|

इसके ५ वर्ष उपरांत, दी.२२-४-२०१२ से २८-४-२०१२ के दरम्यान, मरुधर शिरोमणि प.पू. श्री राजतिलक विजयजी म.सा. आदि ठा. की निश्रा में आयोजित सप्त दिवसीय महामोहत्सव के अंतगर्त श्री धर्मनाथ भगवान मंदिर का रजत जयंती utसव हर्षोल्लास से संपन्न हुआ|

जैन समाज के स्व. श्री मूलचंदजी गेनमलजी शाह का गाँव के विकास कार्यों में विशेष योगदान रहा है| आपने निरंतर १५ वर्ष गांव के सरपंच पद को सुशोभित किया है| आपके सुपुत्र श्री फ़तेहचंदजी एक स्वाभावि व्यक्तित्व है|

सर्वसुविधा युक्त भोजनशाला का भव्यतिभव्य उद्घाटन समारोह श्री नाकोडा पार्शवनाथ देवस्थान पेढ़ी ट्रस्ट मंडल के व्यवस्थापण में वि.सं.२०६९, मगसर सुदी १२, मंगलवार , दी.२५-१२-२०१२ से वि.सं. २०६९, मगसर सुदी १४, गुरूवार ,दी.२७-१२-२०१२ तक आयोजित त्रि दिवसीय जिनेन्द्र भक्ति मोहत्सव में सुसंपन्न हुआ| सम्पूर्ण भोजनशाला के लाभार्थी स्व. श्रीमती सुंदरबाई फ़ौजमलजी रायगांधी परिवार है|धर्मशाला के बाहर इस भोजनशाला के ठीक सामने करीब बन ५०० से ६०० वर्ष प्राचीन पूरी सम्प्रदाय की समाधियाँ है और आज भी यहां नाग-नागिन की जोड़ी विचरण करती है|

संयम पथ : यहां के निवासी श्री रतनचंदजी के सुपुत्र श्री प्रकाश महाराज ने दीक्षा ग्रहण की व पू.मु. श्री चंद्रानंदजी म.सा. के शिष्य बने|

जवाली : वर्तमान में यहाँ जैन समाज की १५० ओली(होती) एवं जनसंख्या ७५० के करीब है| गाँव की कूल जनसंख्या ५५०० के लगभग है| श्री नाकोडा पार्शवनाथ देवस्थान पेढ़ी ट्रस्ट मंडल व श्री जवाली जैन संघ, ये संस्थाएं कार्यरत है| २००९ में श्री रायचंदजी गेनमलजी शाह परिवार द्वारा “जवाली दर्शन” का प्रकाशन हुआ है|

यहाँ राजकीय उच्च माध्यमिक विधालय , उच्च कन्या प्रा. पाठशाला,हॉस्पिटल,नल योजना, ट्यूबवेल,दूरसंचार, डाकघर व ग्रामें बैंक आदि सभी सुविधाएं है|राजकीय उच्च माध्यमिक विधालय भवन में माँ सरस्वती का भव्य मंदिर श्री रायचंदजी परिवार ने बनवाया है|राधाकृष्णाजी, आइमाताजी, बाबारामदेवजी , चारभुजाजी, हनुमाजी, शनेश्वरी इत्यादि अन्यमंदिर यहाँ पर है| विशेष यहाँ पर (१३० सीढियां) महालक्ष्मी माताजी का प्राचीन मंदिर दर्शनीय है| जवाली से मात्र १.५. की.मी. दूर, जवाली-डूठारिया कच्चे मार्ग पर दो विशाल गजराजों से शोभित प्रवेशद्वार व उच्चतम शिखरबद्ध शिवालय में हजारों वर्ष प्राचीन विश्वप्रस्सिध उज्जैन से स्वयंभू प्रकट शिवलिंग व अन्य मूर्तियाँ स्थापित है |