Jainism

****** Everything about Jainism ******

जैन धर्म – सर्वश्रेष्ठ धर्म

Everything about Jainism - Jainism

जैन धर्म भारत का एक प्राचीन धर्म है। ‘जैन धर्म’ का अर्थ है – ‘जिन द्वारा प्रवर्तित धर्म’। ‘जैन’ कहते हैं उन्हें, जो ‘जिन’ के अनुयायी हों। ‘जिन’ शब्द बना है ‘जि’ धातु से। ‘जि’ माने-जीतना। ‘जिन’ माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया, वे हैं ‘जिन’। जैन धर्म अर्थात ‘जिन’ भगवान्‌ का धर्म। जैन धर्म में अहिंसा को परम धर्म माना जाता है। जैन दर्शन में सृष्टिकर्ता इश्वर को स्थान नहीं दिया गया है।

जैन ग्रंथों के अनुसार इस काल के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव द्वारा जैन धर्म का प्रादुर्भाव हुआ था। जैन धर्म की प्राचीनता प्रामाणिक करने वाले अनेक उल्लेख अजैन साहित्य और खासकर वैदिक साहित्य में प्रचुर मात्रा में हैं।

**** जैन धर्म का इतिहास ****

जैन धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला प्राचीन धर्म और दर्शन है। सिन्धु घाटी से मिले जैन अवशेष जैन धर्म को सबसे प्राचीन धर्म का दर्जा देते है |

जैन धर्म कितना प्राचीन है, ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता। जैन ग्रंथो के अनुसार जैन धर्म अनादिकाल से है। महावीर स्वामी या वर्धमान ने ईसा से ५२७ वर्ष पूर्व निर्वाण प्राप्त किया था। इसी समय से पीछे कुछ लोग विशेषकर यूरोपियन विद्वान् जैन धर्म का प्रचलित होना मानते हैं। जैनों ने अपने ग्रंथों को आगम, पुराण आदि में विभक्त किया है। प्रो॰ जेकोबी आदि के आधुनिक अन्वेषणों के अनुसार यह सिद्ध किया गया है की जैन धर्म बौद्ध धर्म से पहले का है। उदयगिरि, जूनागढ आदि के शिलालेखों से भी जैनमत की प्राचीनता पाई जाती है। हिन्दू ग्रन्थ, स्कन्द पुराण (अध्याय ३७) के अनुसार: “ऋषभदेव नाभिराज के पुत्र थे, ऋषभ के पुत्र “भरत” थे, और इनके ही नाम पर इस देश का नाम “भारतवर्ष” पड़ा”|

भारतीय ज्योतिष में यूनानियों की शैली का प्रचार विक्रमीय संवत् से तीन सौ वर्ष पीछे हुआ। पर जैनों के मूल ग्रंथ अंगों में यवन ज्योतिष का कुछ भी आभास नहीं है। जिस प्रकार ब्रह्मणों की वेद संहिता में पंचवर्षात्मक युग है और कृत्तिका से नक्षत्रों की गणना है उसी प्रकार जैनों के अंग ग्रंथों में भी है। इससे उनकी प्राचीनता सिद्ध होती है।

**** जैन प्रतिक चिन्ह ****

Jain Symbol : Everything about Jainism - Jainism

*यह जैन प्रतिक चिन्ह १९७५ में सभी जैन समुदाय के मूनियों ने स्वीकार किया था |

*जैन प्रतीक चिह्न कई मूल भावनाओं को अपने में समाहित करता है। इस प्रतीक चिह्न का रूप जैन शास्त्रों में वर्णित तीन लोक के आकार जैसा है। इसका निचला भाग अधोलोक, बीच का भाग- मध्य लोक एवं ऊपर का भाग- उर्ध्वलोक का प्रतीक है। इसके सबसे ऊपर भाग में चंद्राकार सिद्ध शिला है। अनन्तान्त सिद्ध परमेष्ठी भगवान इस सिद्ध शिला पर अनन्त काल से अनन्त काल तक के लिए विराजमान हैं।

चिह्न के निचले भाग में प्रदर्शित हाथ अभय का प्रतीक है और लोक के सभी जीवों के प्रति अहिंसा का भाव रखने का प्रतीक है। हाथ के बीच में २४ आरों वाला चक्र चौबीस तीर्थंकरों द्वारा प्रणीत जिन धर्म को दर्शाता है, जिसका मूल भाव अहिंसा है, ऊपरी भाग में प्रदर्शित स्वस्तिक की चार भुजाएँ चार गतियों- नरक, त्रियंच, मनुष्य एवं देव गति की द्योतक हैं। प्रत्येक संसारी प्राणी जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होना चाहता है। स्वस्तिक के ऊपर प्रदर्शित तीन बिंदु सम्यक रत्नत्रय-सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान एवं सम्यक चरित्र को दर्शाते हैं और संदेश देते हैं कि सम्यक रत्नत्रय के बिना प्राणी मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता है। सम्यक रत्नत्रय की उपलब्धता जैनागम के अनुसार मोक्ष प्राप्ति के लिए परम आवश्यक है।

सबसे नीचे लिखे गए सूत्र ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्‌’ का अर्थ प्रत्येक जीवन परस्पर एक दूसरे का उपकार करें, यही जीवन का लक्षण है। संक्षेप में जैन प्रतीक चिह्न संसारी प्राणी मात्र की वर्तमान दशा एवं इससे मुक्त होकर सिद्ध शिला तक पहुँचने का मार्ग दर्शाता है।

**** प्रार्थना ****

नवकार मंत्र & जय जिनेन्द्र

१) नवकार मंत्र : णमोकार मन्त्र जैन धर्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण मन्त्र है। इसे ‘नवकार मन्त्र’, ‘नमस्कार मन्त्र’ या ‘पंच परमेष्ठि नमस्कार’ भी कहा जाता है। इस मन्त्र में अरिहन्तों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और साधुओं का नमस्कार किया गया है।

162 ईसापूर्व में हाथीगुम्फा अभिलेख में णमोकार मंत्र एवं जैन राजा खारबेला का उल्लेख है।

प्राकृत अर्थ
णमो अरिहंताणं अरिहंतो को नमस्कार हो।
णमो सिद्धाणं सिद्धों को नमस्कार हो।
णमो आयरियाणं आचार्यों को नमस्कार हो।
णमो उवज्झायाणं उपाध्यायों को नमस्कार हो।.
णमो लोए सव्व साहूणं लोक के सर्व साधुओं को नमस्कार
एसोपंचणमोक्कारो, सव्वपावप्पणासणो यह णमोकार महामंत्र सब पापो का नाश करने वाला
मंगला णं च सव्वेसिं, पडमम हवई मंगलं तथा सब मंगलो मे प्रथम मंगल है।

णमोकार महामंत्र’ एक लोकोत्तर मंत्र है। इस मंत्र को जैन धर्म का परम पवित्र और अनादि मूल मंत्र माना जाता है।

२) जय जिनेन्द्र : जय जिनेन्द्र! एक प्रख्यात अभिवादन है। यह मुख्य रूप से जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा प्रयोग किया जाता है। इसका अर्थ होता है  “जिनेन्द्र भगवान (तीर्थंकर) को नमस्कार”। यह दो संस्कृत अक्षरों के मेल से बना है: जय और जिनेन्द्र।

जय शब्द जिनेन्द्र भगवान के गुणों की प्रशंसा के लिए उपयोग किया जाता है।

जिनेन्द्र उन आत्माओं के लिए प्रयोग किया जाता है जिन्होंने अपने मन, वचन और काया को जीत लिया और केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया हो।

**** जैन दर्शन ****

  • जैन ब्रह्माण्ड विज्ञान : जैन दर्शन इस संसार को किसी भगवान द्वारा बनाया हुआ स्वीकार नहीं करता है, अपितु शाश्वत मानता है। जन्म मरण आदि जो भी होता है, उसे नियंत्रित करने वाली कोई सार्वभौमिक सत्ता नहीं है। जीव जैसे कर्म करता हे, उन के परिणाम स्वरुप अच्छे या बुरे फलों को भुगतने क लिए वह मनुष्य, नरक देव, एवं तिर्यंच (जानवर) योनियों में जन्म मरण करता रहता है।

  • मोक्ष : जीव का पुद्गल से मुक्त हो जाना ही ‘मोक्ष’ है। यह मोक्ष दो प्रकार का है- भावमोक्ष और द्रव्यमोक्ष। भावमोक्ष ही जीवमुक्ति है। यह वास्तविक मोक्ष से पहले की अवस्था है। इसमें चारों घातीय कर्मो का नाश हो जाता है। इसके बाद ही अघातीय कर्मों का नाश होने पर द्रव्य-मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है। जैनियों के अनुसार मोक्ष प्राप्त करने के लिए बारह अनुप्रेक्षाओं से युक्त रहना आवश्यक है, जो इस प्रकार हैं- अनित्य, अषरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभत्व तथा धर्मानुप्रेक्षा।

  • केवल ज्ञान: जीव का पुद्गल से मुक्त हो जाना ही ‘मोक्ष’ है। यह मोक्ष दो प्रकार का है- भावमोक्ष और द्रव्यमोक्ष। भावमोक्ष ही जीवमुक्ति है। यह वास्तविक मोक्ष से पहले की अवस्था है। इसमें चारों घातीय कर्मो का नाश हो जाता है। इसके बाद ही अघातीय कर्मों का नाश होने पर द्रव्य-मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है। जैनियों के अनुसार मोक्ष प्राप्त करने के लिए बारह अनुप्रेक्षाओं से युक्त रहना आवश्यक है, जो इस प्रकार हैं- अनित्य, अषरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभत्व तथा धर्मानुप्रेक्षा।जैन दर्शन के अनुसार जीव १३वें गुणस्थान में केवल ज्ञान की प्राप्ति करता है ।

  • तत्त्व :जैन ग्रंथों में सात तत्त्वों का वर्णन मिलता हैं। यह हैं-

    1. जीव- जैन दर्शन में आत्मा के लिए “जीव” शब्द का प्रयोग किया गया हैं। आत्मा द्रव्य जो चैतन्यस्वरुप है।

    2. अजीव- जड़ या की अचेतन द्रव्य को अजीव (पुद्गल) कहा जाता है।

    3. आस्रव – पुद्गल कर्मों का आस्रव करना

    4. बन्ध- आत्मा से कर्म बन्धना

    5. संवर- कर्म बन्ध को रोकना

    6. निर्जरा- कर्मों को क्षय करना

    7. मोक्ष – जीवन व मरण के चक्र से मुक्ति को मोक्ष कहते हैं।

  • अनेकांतवाद : अनेकान्तवाद का अर्थ है- एक ही वस्तु में परस्पर विरोधी अनेक धर्म युगलों का स्वीकार।

  • अहिंसा : जैन धर्म में सब जीवों के प्रति संयमपूर्ण व्यवहार अहिंसा है। अहिंसा का शब्दानुसारी अर्थ है, हिंसा न करना।जैन ग्रंथ आचारांगसूत्र में, जिसका समय संभवत: तीसरी चौथी शताब्दी ई. पू. है, अहिंसा का उपदेश इस प्रकार दिया गया है : भूत, भावी और वर्तमान के अर्हत् यही कहते हैं-किसी भी जीवित प्राणी को, किसी भी जंतु को, किसी भी वस्तु को जिसमें आत्मा है, न मारो, न (उससे) अनुचित व्यवहार करो, न अपमानित करो, न कष्ट दो और न सताओ।

  • अस्तेय : अस्तेय का शाब्दिक अर्थ है – चोरी न करना । हिन्दू धर्म तथा जैन धर्म में यह एक गुण माना जाता है। योग के सन्दर्भ में अस्तेय, पाँच यमों में से एक है।अस्तेय का व्यापक अर्थ है – चोरी न करना तथा मन, वचन और कर्म से किसी दूसरे की सम्पत्ति को चुराने की इच्छा न करना।

  • ब्रह्मचर्य : ब्रह्मचर्य, जैन धर्म में पवित्र रहने का गुण है, यह जैन श्रावक के पांच महान प्रतिज्ञा में से एक है (अन्य है सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह )| जैन मुनि और अर्यिकाओं दीक्षा लेने के लिए कर्म, विचार और वचन में ब्रह्मचर्य अनिवार्य है। जैन श्रावक के लिए ब्रह्मचर्य का अर्थ है शुद्धता । यह यौन गतिविधियों में भोग को नियंत्रित करने के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास के लिए है। जो अविवाहित हैं, उन जैन श्रावको के लिए, विवाह से पहले यौनाचार से दूर रहना अनिवार्य है।

  • अपरिग्रह : अहिंसा के बाद, अपरिग्रह जैन धर्म में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण गुण है। अपरिग्रह एक जैन श्रावक के पांच मूल व्रतों में से एक है| जैन मुनि के २८ मूल गुणों में से यह एक है| यह जैन व्रत एक श्रावक की इच्छाओं और संपत्ति को सिमित करने के सिद्धांत है।

  • सत्य 

  • कर्म : जैन दर्शन में कर्म के मुख्य आठ भेद बताए गए है –

    1. ज्ञानवरण

    2. दर्शनवरण

    3. वेदनी

    4. मोहनीय

    5. आयु

    6. नाम

    7. गोत्र और

    8. अन्तराय

**** जैन संप्रदाय ****

तीर्थंकर महावीर के समय तक अविछिन्न रही जैन परंपरा ईसा की तीसरी सदी में दो भागों में विभक्त हो गयी : दिगंबर और श्वेताम्बर। मुनि प्रमाणसागर जी ने जैनों के इस विभाजन पर अपनी रचना ‘जैनधर्म और दर्शन’ में विस्तार से लिखा है कि आचार्य भद्रबाहु ने अपने ज्ञान के बल पर जान लिया था कि उत्तर भारत में १२ वर्ष का भयंकर अकाल पड़ने वाला है इसलिए उन्होंने सभी साधुओं को निर्देश दिया कि इस भयानक अकाल से बचने के लिए दक्षिण भारत की ओर विहार करना चाहिए। आचार्य भद्रबाहु के साथ हजारों जैन मुनि (निर्ग्रन्थ) दक्षिण की ओर वर्तमान के तमिलनाडु और कर्नाटक की ओर प्रस्थान कर गए और अपनी साधना में लगे रहे। परन्तु कुछ जैन साधु उत्तर भारत में ही रुक गए थे। अकाल के कारण यहाँ रुके हुए साधुओं का निर्वाह आगमानुरूप नहीं हो पा रहा था इसलिए उन्होंने अपनी कई क्रियाएँ शिथिल कर लीं, जैसे कटि वस्त्र धारण करना, ७ घरों से भिक्षा ग्रहण करना, १४ उपकरण साथ में रखना आदि। १२ वर्ष बाद दक्षिण से लौट कर आये साधुओं ने ये सब देखा तो उन्होंने यहाँ रह रहे साधुओं को समझाया कि आप लोग पुनः तीर्थंकर महावीर की परम्परा को अपना लें पर साधु राजी नहीं हुए और तब जैन धर्म में दिगंबर और श्वेताम्बर दो सम्प्रदाय बन गए।

* दिगम्बर

दिगम्बर साधु (निर्ग्रन्थ) वस्त्र नहीं पहनते है। नग्न रहते हैं। दिगम्बर मत में तीर्थकरों की प्रतिमाएँ पूर्ण नग्न बनायी जाती हैं और उनका शृंगार नहीं किया जाता है, पूजन पद्धति में फल और फूल चढाए जाते हैं| दिगंबर (दिशा ही जिसका अंबर अर्थात् वस्त्र हो) का अर्थ ‘नग्न’ होता है। दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी मोक्ष प्राप्त करने के लिए नग्नतत्व को मुख्य मानते हैं और स्त्रीमुक्ति का निषेध करते हैं। श्वेतांबरों के ४५ आगम ग्रंथों को भी वे स्वीकार नहीं करते। उनका कथन है कि जिन भगवान द्वारा भाषित आगम काल-दोष से नष्ट हो गए हैं। तीर्थंकर महावीर के पश्चात् इंद्रभूति गौतम, सुधर्मा और जंबूस्वामी तक जैनसंघ में विशेष मतभेद के चिन्ह दृष्टिगोचर नहीं होते। परतु जंबूस्वामी के पश्चात् दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय की आचार्य परंपराएँ भिन्न पड़ जाती हैं।

* श्वेताम्बर

श्वेताम्बर संन्यासी श्वेत वस्त्र पहनते हैं, तीर्थकरों की प्रतिमाएँ लंगोट और धातु की आंख, कुंडल सहित बनायी जाती हैं और उनका शृंगार किया जाता है।जैन दर्शन शाश्वत सत्य पर आधारित है। समय के साथ ये सत्य अदृश्य हो जाते है और फिर सर्वग्य या केवलग्यानी द्वारा प्रकट होते है। प्रम्परा से इस अवसर्पिणी काल मे भगवान (ऋषभ/रिषभ) प्रथम तीर्थन्कर हुए, उनके बाद भगवान पार्श्व (877-777 BC) तथा (महावीर) (599-527 BC) हुए|

श्वेताम्बर भी दो भाग मे विभक्त है:

  1. मूर्तिपूजक -यॆ तीर्थकरों की प्रतिमाएँ की पुजा करतॆ हे.

  2. स्थानकवासी -ये मूर्ति पूजा नहीँ करते बल्कि साधु संतों को ही पूजते है।

स्थानकवासी के भी फ़िर से दो भाग है:-

  1. बाईस पंथी

  2. तेरा पंथी

**** जैन पर्व ****

  • जैन धर्म में दीपावली: जैन समाज द्वारा दीपावली, महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में मनाई जाती है।महावीर स्वामी (वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर) को इसी दिन (कार्तिक अमावस्या) को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन संध्याकाल में उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। अतः अन्य सम्प्रदायों से जैन दीपावली की पूजन विधि पूर्णतः भिन्न है।

  • महावीर जयंती : महावीर जयंती (महावीर स्वामी जन्म कल्याणक) चैत्र शुक्ल १३ को मनाया जाता है। यह पर्व जैन धर्म के २४वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक के उपलक्ष में मनाया जाता है।भगवान महावीर स्वामी का जन्म ईसा से ५९९ वर्ष पूर्व कुंडग्राम (बिहार), भारत मे हुआ था। जन्म से पूर्व तीर्थंकर महावीर की माता त्रिशला ने १४ स्वप्न देखे थे।.

  • पर्यूषण पर्व : जैन धर्मावलंबी भाद्रपद मास में पर्यूषण पर्व मनाते हैं। श्वेताम्बर संप्रदाय के पर्यूषण 8 दिन चलते हैं। उसके बाद दिगंबर संप्रदाय वाले 10 दिन तक पर्यूषण मनाते हैं। उन्हें वे ‘दसलक्षण’ के नाम से भी संबोधित करते हैं।

  • पर्यूषण पर्व मनाने का मूल उद्देश्य आत्मा को शुद्ध बनाने के लिए आवश्यक उपक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना होता है। पर्यावरण का शोधन इसके लिए वांछनीय माना जाता है। आत्मा को पर्यावरण के प्रति तटस्थ या वीतराग बनाए बिना शुद्ध स्वरूप प्रदान करना संभव नहीं है। इस दृष्टि से’कल्पसूत्र’ या तत्वार्थ सूत्र का वाचन और विवेचन किया जाता है और संत-मुनियों और विद्वानों के सान्निध्य में स्वाध्याय किया जाता है।

  • पूजा, अर्चना, आरती, समागम, त्याग, तपस्या, उपवास में अधिक से अधिक समय व्यतीत किया जाता है और दैनिक व्यावसायिक तथा सावद्य क्रियाओं से दूर रहने का प्रयास किया जाता है। संयम और विवेक का प्रयोग करने का अभ्यास चलता रहता है।

**** जैन ध्वज ****

Jain Flag : Everything about Jainism - Jainism

जैन ध्वज पाँच रंगो से मिलकर बना एक ध्वज है। इसके पाँच रंग है: लाल, पीला, सफ़ेद, हरा और नीला/काला।

जैन धर्म में पाँच पदों को सबसे सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इन्हें पंचपरमेष्ठी कहते है ध्वज के पाँच रंग ‘पंचपरमेष्ठी’ के प्रतीक है:

  • सफ़ेद –  अरिहन्त, शुद्ध आत्माएँ। जिन्होंने केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया हो।

  • लाल – सिद्ध भगवान, मुक्त आत्माएँ। अरिहंतों के मार्गदर्शन में केवल ज्ञान प्राप्त होता है, जिससे अंत में सिद्ध पद प्राप्त होता है।

  • पीला – आचार्य,

  • हरा – उपाध्ययों के लिए, जो शास्त्रों का सम्पूर्ण ज्ञान रखते है।

  • काला – साधुओं के लिए, यह अपरिग्रह का भी प्रतीक है।

स्वस्तिक :

ध्वज के मध्य में बना स्वस्तिक चार गतियों का प्रतीक है:

  1. मनुष्य

  2. देव

  3. तिर्यंच

  4. नारकी

रत्न :

स्वस्तिक के ऊपर बने तीन बिंदु रतंत्रय के प्रतीक है:

  1. सम्यक् दर्शन

  2. सम्यक् ज्ञान

  3. सम्यक् चरित्र

इसका अर्थ है रतंत्रय धारण कर जीव चार गतियों में जनम मरण से मुक्ति पा सकता है ।

सिद्धशिला :

सिद्धशिला जहाँ सिद्ध परमेष्ठी (मुक्त आत्माएँ) विराजती है

इन बिंदुओं के ऊपर सिद्धशिला, जी लोक के अग्र भाग में है, उसकी आकृति बनी है।