Dujana

History of Dujana (Godwad – Rajasthan)

दुजाणा गाँव का परिचय

 

गोडवाड़ के धराताल पर अरावली की सुरम्य पहाडियो कि गोद में फालना-नाकोडा मुख्य सड़क पर राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर, सांडेराव से ६ की.मी. व फालना रेलवे स्टेशन से १८ की.मी. की दुरी पर स्थित है “दूजाणा” |भूतकाल में दुजाना ग़ाव में अनेको बार आक्रमण हुए, मगर फिर नही इसने परहित को नहीं    छोड़ा | दूसरों के लिए किये गए जनसेवा के उठ्कुष्ठ कार्यों के कारण ही इसका नाम “दू-जाना” रखा गया होगा|गांव मेंतकरीबन २००० परिवार व १० हज़ार की जैन-अजैन की आबादी है| जैनों की घर हौती १७५ और जैन आबादी करीब ११० की है|

 

बहुत साल पहले यह ग़ाव सांडेराव ठिकाने के अधीन था| भीमसिंह राणावत-सांडेराव इसके मुखिया थे|कभी यह “मनो का ग़ाव” के नाम से भी प्रसीद्ध था |

मानयता है की दुजाना ग़ाव के “कालिया मगर” की तराई में परमात्मा का एक छोटा और अलौकिक जिनमंदिर का नवनिर्माण करवाकर उसमे करीब ३०० वर्ष पूर्व ग़ाव की खुदाई में प्राप्त हुई मुलनायक श्री चंद्रप्रभुस्वामी की प्रतिमा को मुलनायक के रूप में प्रतिष्टित किया गया| श्री समस्त संघ द्वारा तप. श्री लहेरोसागर गणि के हस्ते सं. १८९०, शाके १७५४, वैशाख सुदी १०, गुरवार को श्री चंद्रप्रभुजी बिंब को स्थापित किया गया |इसका शिलाल्लेख आज भी मंदिर में लगा है, जो यदपी साफ़ नहीं मगर थोडा पड़ने में आता है|”जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” के अनुसार भी श्री संघ द्वारा सं. १८९० का उल्लेख है| उस समय में मंदिर में कांच के जड़ाव का काम सुन्दर था|इसका निर्माण जतीजी द्वारा हुआ था |मंदिर आज भी विद्दमान है और उसमे मणिभद्रजी व कालिका देवी विराजमान है|

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मंदिर में जीर्ण-शीर्ण हो जाने से श्री संघ ने ४० वर्ष पूर्व आ. हिमाचलसूरीजी के हस्ते प्रतिमा का उत्पाथन करवाकर, बाहर पोमाना रुपी विराजमान करवाया था |

नूतन मंदिर हेतु प्रयास के बाद जगह प्राप्त हुई | आ. श्री हिमाचालसूरीजी के हस्ते खाद मुहर्त द्वारा, कार्य प्रारंभ हुआ, मगर किसी कारणवश कार्य रुक गया |बाद में आ. श्री जिनेंद्रसूरीजी के प्रयास से मार्ग प्रशस्त हुआ और सर्वप्रथम श्री मुनिसुव्रत स्वामी की प्रतिमा को आज से ४५ वर्ष पूर्व नगर प्रवेश करवाया गया |

आपसी मनमुटाव के चलते २२ वर्ष तक प्रतिमा मेहमान रुपी विराजमान रही और प्रतिष्ठा सम्मानभावी हुई| बाद में ग़ाव के प्रमुख लोगों ने चर्चा द्वारा इसका तीसरा मार्ग मुलनायक हेतु श्री विमलनाथजी को बैठाने का फैसला किया|श्री संघ ने विमलनाथ प्रभु की प्रतिमा लाकर खुडाला प्रतिष्ठोत्सव में नि. सं. २०४३, वैशाख सुदी ५, रविवार, दी. ३ मई १९८७ को गच्छाधीपति आ. श्री दर्शनसगरसूरीजी के वरद हस्ते अंजनशलाका प्रतिष्ठा संपन्न करवाई तथा वीर नि. सं. २५१३ शाके १९०८, वि. सं. २०४३ जेष्ठ उडी ९, शनिवार-रवियोग, दी. ६ जून १९८७ को , प्रात: १०.०५ बजे वर्तमान गच्छाधीपति श्रीमद् विजय हेमप्रभसूरीजी आ. ठा. की निश्रा में नूतन मुलनायक श्री विमलनाथ स्वामी को प्रतिष्ठापूर्वक गादीनशीन  किया गया, साथ ही प्राचीन मुलनायक श्री चंद्रप्रभस्वामी व नूतन बिंब श्री मुनिसुव्रत स्वामी को गंभारे के बाहर दो अलग-अलग देहरीयो में स्थापित किया गया|मंदिर में अन्य दो प्रतिमाओं में श्री महावीर स्वामीजी की वि. सं. २०३८, माघ शु. १० बुधवार को जाबलिपुर में अंजनशलाका एवं श्री शांतिनाथ प्रभु की वि.सं. २०२९, वाई. सु. ६, गुरूवार को जाबलीपुर में श्री पं. कल्याणविजयजी व सौभागय विजयजी द्वारा अंजन प्रतिमाए यहां प्रतिष्टित है |

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 ग़ाव में प्रथम बार संवत् १९८४ में पू. आ. देव श्री श्रमाभद्रसूरीजी व पू. मुनि श्री अमीविजयजी ने दूजाणा में चातुर्मास किया | वि. सं. २००९ , सन १९५३ ई. का चातुर्मास  मू. श्री हीरमुनिजी एवं सुंदरमुनिजी आदि ने दूजाणा संघ में मतभेद कलह मिटाकर सानंद संपन्न किया | वि. सं. २०१० में मू. श्री सुरेंद्र मुनिजी ने चातुर्मास में हिंदी में “रत्नपाल नृत चरित्र” का प्रकाशन करवाया और सं. २०२० में पं. सुंदरमुनिजी व तिलकमुनिजी का पुण: चातुर्मास हुआ |

सं. २०३४ की प्रतिष्ठा के बाद चैतय को विशाल रूप देकर त्रिशिखरी मंदिर हेतु निरंतर प्रयास जारी रहा | मंदिर के बाई ओर का मकान श्री कस्तूरजी राणावत परिवार ने संघ को सहर्ष भेट दिया| समय के साथ दोनों ओर शिखरबंध देहरियो का निर्माण पूर्ण होते ही श्री संघ ने वीर नि. सं. २५३६, शाके १९३१, वि. सं. २०६६, जेष्ठ वादी ३, रविवार दी. 30 मई २०१० को दाई तरफ सपरिकर प्राचीन श्री चंद्रप्रभु स्वामी तिगडे सह व बाई तरफ नूतन मुलनायक श्री मुनिसुव्रत स्वामी को तिगडे सह वल्लभ समूदायवर्ती आचार्य श्री चिदानंद सूरीश्वरजी म.सा. के वरद हस्ते प्रतिष्ठा संपन्न हुई | इस तरह विशाल व त्रिशिखरी जिनालय का रूप बन गया |भविष्य में प्राचीन मंदिर के भी पूर्णनिर्माण की योजना है |

नूतन मंदिर की २५वि रजत जयंती मोहत्सव मू. श्री चिदानंदविजयजी व मू. श्री लक्ष्मीचंद्रविजयजी की निश्रा में, वि. सं. २०६८, जेष्ठ सुदी ९, बुधवार, दी. 30.५.२०१२ को पंचाहिनका मोहत्सव के साथ सानंद संपन्न हुआ |

संस्थाए : श्री चंद्रप्रभु हीर सेवा मंडल व श्री विमलनाथ महिला मंडल यहां की प्रमुख श्री संघ सहयोगी संस्थाए है | ४० वर्ष पूर्व स्थापित श्री चंद्रप्रभु हीर सेवा मंडल भोजनशाला का संचालन व पर्व पर्युषण को धूमधाम से मनाने में सहयोग करता है| सन २०१० ई. में संस्था ने “दूजाणा संस्कृति दर्शन” सुन्दर पता निर्देशिका का प्रकाशन वर्तमान अध्यक्ष श्री रूपचंदजी चुन्निलालजी राणावत के नेतृत्व में किया| एक श्रावक व ५ श्राविकाओ ने संयम लेकर अपने कूल व ग़ाव का नाम रोशन किया है |

श्री नेमिनाथजी मंदिर :

Shree Neminath Temple - Dujana (Godwad - Rajasthan)

श्री छतरभानजी परमार परिवार द्वारा स्वद्रव्य से निर्मित घुमटबंध निजी जिनप्रसाद में २१ वे तीर्थंकर श्री नेमिनाथजीस्वामी आदि जिनबिंबो की वीर नि. सं. २४९१, शाके १८८८६, विक्रम सं. २०२१, महासुदी ६, सन १९६५ ई. को जोजावर रत्न आ. श्री जिनेन्द्रसूरीजी आ. ठा. के वरद हस्ते अंजनशलाका प्रतिष्ठा का भव्य आयोजन संपन्न हुआ | छतरभानजी के पुत्र श्री हुकमराजजी राणावत, दीवानी न्यायधीश, जिला न्यायलय चंद्रपुर में नियूक्त थे, वर्तमान में आप तहसील-पांढरकवड़ा में जिला-यवतमाल, महाराष्ट्र में जज के पद पर नियूक्त है| आपकी पुत्री कु. भावना भी वकील व उत्कुष्ट मंच संचालक है |

Mulnayak Shree Neminath Bhagwan - Dujana (Godwad - Rajasthan)

गुरु मंदिर : आपश्री का जन्म सं. १९६५ के भादरवा सूद १४ को हुआ | दूजाणा रत्न श्री दलीचंदजी नाथमलजी गुलाबजी राणावत परिवार के कुलदीपक दलिचंदजी ने परिवार के बिना वि. सं. २०१० जेठ वद ७ को रांघेजा में मू. श्री अमीविजयजी के वरद हस्ते दीक्षा ग्रहण की व बड़ी दीक्षा सं. २०११ के चैत्र वद ४ को खंभात परिवार की उपस्थिति में हुई एवं मू. श्री दयाविजयजी नाम पाया | महान तपस्वी मू. श्री दयाविजयजी और श्री वज्रतिलक विजयजी ने दीक्षा के बाद २२ वर्ष बाद अपने ग़ाव दूजाणा में श्री संघ की  विनंती का चातुर्मास किया| इसी चातुर्मास के दरमियान पर्युषण पर्व में वि. सं. २०३६, श्रावण सूद २ को, अपनी जन्मभूमि में देवलोक हुए | अग्नि संस्कार स्थल पर पुत्र श्री बाबुलालजी दलीचंदजी राणावत ने गुरूमंदिर का निर्माण करवाकर वि. सं. २०४३ जेष्ठ सुदी ९ रविवार दी.६ जून १९८७ को प्रभु प्रतिष्ठा के साथ गुरूमंदिर का प्रतिष्ठा करवाई | महान तपस्वी मुनिश्री ने ५२ मौन उपवास, १० मासक्षमन, ८० के करीब अट्ठाई व २ वर्षीतप की आराधना की | केशाजी राणावत परिवार ने चबूतरा व हॉस्पिटल का निर्माण करवाकर राजस्थान सरकार को अर्पण किया| इसी हॉस्पिटल में परिवार द्वारा नाकोडा तीर्थ उद्धारक आ. श्री हिमाचलसूरीजी का” गुरु मंदिर” बनवाकर गुरु प्रतिमा स्थापित की |

शिक्षा के शेत्र में दानवीर परिवार श्री मति सुमित्रादेवी पन्नालालजी राणावत चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा उच्च माध्यमिक विधालय व स्टेडियम का निर्माण करवाया गया |वर्तमान में ढाई करोड़ की लागत से विशाल विधालय भवन का निर्माण पूर्णता की ओर है दूजाणा निवासी संघवी किसतुरजी गुलाबजी राणावत परिवार द्वारा परम पूज्य आ. श्री शांतिसूरीजी की निश्रा में छ:री पालित संघ बामणवाउजी से सं. १९९० कार्तिक सुदी १५, दी. २.११.१९३३ को आयोजित किया गया |संघ दरमियान वीरवाडा तीर्थ पर श्री संघ ने आग्रहपूर्वक सुरिपद ३.१५ बजे ” पदवी समर्पण मानपत्र” व कामली ओढाकर अर्पण किया| संघ के पुण: बामणवाडजी पहुचने पर राणावत परिवार ने वि. सं. १९९० मगसर सुदी ३ सोमवार दी. २१.११.१९३३ को पूर्ण विधि-विद्धान से आचार्य पदवी समर्पण मोहत्सव किया व दुबारा वासक्षेप के अवसर पर इन्द्र द्वारा पांच मिनट तक जलवृष्टि हुई|

दूजाणा में २ डॉक्टर, १० सी.ए. , 1 जज, ६ वकील, ३ एम.बि.ए. , आदि उच्च शिक्षित परिवार है|ग़ाव में १२वि तक स्कूल, श्री हिमाचलसूरीजी अस्पताल , ग्रामीण बैंक, सिन्दरू व दूजाणा बाँध से सिंचाई व्यवस्था, पुलिस थाना-संदेराव, दूरसंचार आदि सुविधाए उपलब्ध है |

काला पत्थर निकालने के कारण प्रसीद्ध ” कालिया मगर” में एक संत द्वारा उग्र तपसया हुई| इसी पहाड़ के विमलनाथ मंदिर के पीछे चामुंडी माता का मंदिर है| ग़ाव में खेड़ादेवी व जाकामाजी का मंदिर प्रसीद्ध है |