Daylana Kalan

डायलाना कलां (धर्मनगरी)

मरुधर प्रांत के गोडवाड क्षेत्र में जोधपुर-उदयपुर मेगा हाइवे (राज्य राजमार्ग क्र. ६७) नाडोल से १५ की.मी. और सोमेसर रेलवे स्टेशन से ३६ की.मी. दूर अरावली पर्वतमाला की गोद में सुमेरी नदी के किनारे एक सुंदर नयनरम्य नगर बसा है “डायलाना कलां”| यहाँ पूर्व वर्तमान गांव के मध्य भाग में स्थित सर्वधर्म समभाव की भावना को दर्शाता है|

सुमेरी नदी के किनारे सिरवी समाज की कुलदेवी श्री जिजिवड आई माता का मूल स्थान भी इसी गाँव की एक धरोहर है| गांव डायलाना की स्थापना करीबन २४०० वर्ष पूर्व हुई थी| पांडव वंशज राजा गन्धर्वसेन ने अपने शासनकाल में आज से करीबन २००० वर्ष वर्ष पूर्व भगवान श्री शांतिनाथजी का मंदिर बनवाया था|जिनबिंब श्री डायलाना श्री संघ ने ही भराया था| वो प्राचीन मुलनायक वर्तमान मंदिर में विराजमान है|समय समय पर जब-जब श्री संघ ने मंदिर के जिणोरद्वार की आवश्यकता समझी, तब-तब चतुर्विध संघ की उपस्थिति में वर्तमान मंदिर की प्रतिष्ठाएं होती गयी है|

प्राचीन प्रतिष्ठा : जिनालय की प्रथम प्रतिष्ठा वि.सं. १३४६ के वैशाख सुदी ५ विधिकारक भट्टाचार्य श्री हिरालालजी रावजी पुचाल के हाथों हुई| प्रतिमा के लेख में सं. १३४६ महा सुदी ५ नजर आता है|”जैन तीर्थ सर्वसंग्रह”  ग्रन्थ के अनुसार, श्री संघ डायलाना ने वि.सं. १३०० में शिखरबद्ध जिनालय का निर्माण करवाकर मुलनायक श्री शांतिनाथ प्रभु सह पाषण की ७ व धातु प्रतिमाएं प्रतिष्टित करवाई |

पुन:प्रतिष्ठा : वीर नि.सं. २३३८ , शाके १७३३, वि.सं. १८६८ के जेठ सु.६ को , गुरोसा श्री लब्धिसागरजी यतिवर्य (बांता वाला) के हाथों संपन्न हुई थी|

अंतिम प्रतिष्ठा : गोडवाड जोजोवर रत्न, प्रतिष्ठा शिरोमणि पू.आ. श्री जिनेन्द्रसूरीजी आ. ठा. के वरद हस्ते वीर नि.सं. २४७८, शाके के फाल्गुन शुक्ल १०, मार्च १९५२ को संपन्न हुई| प्रतिवर्ष ध्वजा श्री हस्तिमलजी प्रेमचंदजी श्रीश्रीमाल परिवार चढाते है|

श्री आदिनाथ मंदिर: जिनालय के प्रागंण में आरास पत्थर से शिखरबद्ध नवनिर्मित जिनप्रसाद में, वीर नि.सं. २५१७ , शाके १९१२ , वि.सं. २०४७, वैशाख शुक्ल १०, गुरुवार , मई १९९१ को शासन प्राभावक आ. श्री पद्मसूरीजी आ. ठा. के वरद हस्ते . प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ प्रभु की, परिकर सह श्वेतवर्णी, पद्मासनस्थ प्रतिमा को प्रतिष्टित किया गया|इन प्रतिष्ठाओ के बाद श्री संघ में जैन भाइयों के घरों की संख्या में बड़ी वृधि होती गयी| वर्तमान में जैन घर १७७ के करीब है और गांव की कुल जनसंख्या २००० से भी ज्यादा है|

स्वर्ण जयंती : नगर में मुख्य भाग स्थित और दो विशाल गजराजों से शोभित प्रवेशद्वार के अन्दर, श्री शांतिनाथ प्रभु के शिखरबद्ध मंदिर की स्वर्ण जयंती (५१व ध्वजारोहण प्रसंग) निमित विविध महापूजन सह आष्टाहिंका महामोहत्सव वीर नि.सं. २५२८, शाके १९२३, वि.सं. २०५८ , फाल्गुण शुक्ल १० , रविवार दी. २४-३-२००२ को प्रतिष्ठा शिरोमणि आ. श्री पद्मसूरीजी आ. ठा. व आ. श्री पूर्णानंदसूरीजी के शिष्यरत्न मु. श्री  मंगलविजयजी आ. ठा. तथा सा. श्री गोडवाड़ दीपिका ललितप्रभाश्रीजी की सुशिष्या सा. श्री विश्वपूर्णा श्रीजी सह चतुर्विध संघ की उपस्थिति में सुसंपन्न हुआ|

गुरुबिंब प्रतिष्ठा : अकबर प्रतिरोधक जगतगुरु आ. श्री हीरसूरीजी की गुरु बिंब एवं मणिभद्रवीर प्रतिमा की प्रतिष्ठा वीर नि.सं. २४९२, शाके १८८७,वि.सं. २०२२, आ. शु. १०, भौमवासरे को पू.मु. श्री गुमान विजयजी, मु. श्री भाव्यानंद विजयजी के हस्ते संपन्न हुई|

जिनालय भमती में श्री शांतिनाथ प्रभु के जीवन चरित्र पर आधारित सुन्दर पटों का निर्माण हुआ है|

आराधना भवन : श्री संघ के तत्वावधान में, भव्य-दिव्य नूतन द्विमंजिला आराधना भवन व नूतन पट्टशाळा का उद्घाटन वि.सं. २०६६ प्रथम वैशाख सुदी ५, सोमवार दी. १९.४.२०१० को , ज्योतिश्चार्य श्री पद्मसूरीजी किनिश्रा में सुसंपन्न हुआ|

दीक्षाएं : पू. तपस्वी मु.श्री देवांगरत्न विजयजी(दीपकजी धोका), पू. सा. श्री चिंतनपूर्णाश्रीजी (कु.चन्द्रिका), सा. श्री कृतार्थपूर्णाश्रीजी (कु. कविता) की जन्मभूमि डायलाना है|दीक्षा लेकर आपश्रीयों ने कुल व नगर का नाम रोशन किया है|

उपधान : पू.आ. श्री पद्मसूरीजी एवं सा. श्री विश्वपूर्णाश्रीजी  की निश्रा में, श्रीमती कमलाबाई तिलोकचंदजी सुन्देशा मुत्था परिवार द्वारा आयोजित उपधान तप की मोक्ष्माला वि.सं. २०५८, फाल्गुन शुक्ल ३, रविवार,दी.१७.३.२००२ को संपन्न हुई|

डायलाना : कुलदेवी श्री जीजीवड आइमाता का मूलस्थान होने से यहाँ की विशेष महत्ता है| माता मंदिर के अलावा भी कई प्रसिद्ध मंदिर है|१०वि तक स्कूल, सरकारी व प्रायवेट हॉस्पिटल, दूरसंचार इत्यादि सभी सुविधाएं उपलब्ध है|