Bhuti

History of Bhuti (Godwad – Rajasthan)

भूति गाँव का परिचय

 

               जालोर जिले की आहोर तहसील के अंतिम छोर पर तथा गोडवाड़ की पश्चमी सीमा पर एतिहासिक ग़ाव “भूति” बसा है |फालना रेलवे स्टेशन से मोकलसर मार्ग पर व़ाया सांडेराव से २५ की.मी. दूर खारी नदी के किनारे व छोटी-सी पहाड़ी की तलहटी में सौधशिखरी विशाल जिनमन्दिर में श्वेतवर्णी पद्मासनस्थ प्रभु श्री महावीर स्वामी की अति सुन्दर प्रतिमा विराजमान है |

दुसरे जिनमन्दिर में प्रभु श्री आदिनाथ दादा विराजमान है | दादा गुरुदेव श्रीमद् विजय राजेंद्रसूरीजी म. सा. की प्रेरणा से निर्मित दोनों जिनालय की जिन प्रतिमाओं की अंजनशलाका वि. सं. १९६९ माघ शुक्ल १० रविवार को जालोर जिले के प्राचीन सीयाणा तीर्थ के पास मंडवारिया नगर की प्रतिष्ठा मोहत्सव के अवसर पर गुरुदेवश्री के प्रथम पट्टधर चक्रवती आ. श्री घनचंद्रसूरीजी के करकमलो से संपन्न हुई | दोनों मंदिर बनकर तैयार थे , मगर आपसी मनमुटाव के चलते प्रतिष्ठा नहीं हो पा रही थी |

Shree Mahavir Swami Temple - History of Bhuti (Godwad - Rajasthan)

गुरुदेवश्री के चतुर्थ पट्टधर व्याखयान वाचस्पति श्री यतिन्द्रसूरीजी के बारंबार प्रयास से यह दुरिया ख़तम होने लगी| वि. सं. १९८५ के पौष शुक्ल 7 को गुरुदेवश्री के तीसरे पट्टधर साहित्य विशारद विधाभूषण आ. श्री भपेन्द्रसूरीश्वरजी का आगमन हुआ और इंतज़ार की घड़िया ख़तम हुई |आपश्री के अथक प्रयास एवं उपदेश से दोनों तड़ो में समांजसय हुआ एवं तुरंत प्रतिष्ठा की तैयारीया प्रारम्भ हुई | वि. सं. १९८५ के फाल्गुन वदी ५ गुरूवार को, मंगल वेला में प्रभु प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा संपन्न हुई |माघ शुक्ल १३ से अष्टहिन्का मोहत्सव प्रारम्भ हुआ |महावीर स्वामी जिनालय की ध्वजा श्री रामजी वेदमुथा परिवार एवं आदिनाथ जिनालय की धवज श्री हकारजी पुनमिया परिवार ने चढ़ाई | बाद में महावीरजी मंदिर के गूढ़ मंडप में प्रतिष्ठत श्री शंतिनाथादी जिनबिंबो की अंजनशलाका प्राण प्रतिष्ठा वरकाणा तीर्थ के वि. सं. १९५१ माघ सुदी ५ (वसंत पंचमी ) गुरूवार के प्रतिष्ठोत्सव पर भट्टारक् श्री राजसूरीजी के हस्ते संपन्न हुई और आदिनाथ दादा मंदिर के रंगमंडप में दोनों ओर की पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिमाओं की अंजनशलाका प्राण प्रतिष्ठा बागरा नगर के वि. सं. १९९८ , मार्गशीर्ष शु. १०, शुक्रवार के प्रतिष्ठोत्सव पर आ. श्री यतिन्द्रसूरीजी के हाथो संपन्न हुई |


History of Bhuti (Godwad - Rajasthan)


भूति सिलावटी व गोडवाड़ का एक प्राचीन नगर है | पहले वर्तमान धर्मशाला के पास छोटे गृहमंदिर में पूजा-अर्चना की जाती थी |ग़ाव में दो जागीरदारी थी, जिससे दोनों तरफ एक-एक जिनमन्दिर का निर्माण हुआ| श्री आदिनाथ प्रभु की प्रतिमा अतंत चमत्कारी है |दिन में तीन रूप बदलती है |प्रात: बालय रूप, मध्या में सायमकाल में प्रौढ़ का रूप धारण करती है|वि. सं. १९८८ में गुरुदेवश्री के शीषय आ. श्री गुलाबविजयजी का प्रथम चातुर्मास हुआ|वि. सं. १९९६ में देविचंदजी रामाजी परिवार द्वारा आ. श्री यतिंद्रसूरीजी का चातुर्मास हुआ, जिसके बाद श्री संघ की विनती पर वि. सं. १९९६ पौष शुल्क ८ गुरूवार दी. २५.१०.१९३९ को मोहत्सवपूर्वक गुरुदेव श्री राजेंद्रसूरीश्वरजी की अलौकिक गुरुमूर्ति का अंजनशलका प्रतिष्ठा मोहत्सव संपन्न हुआ एवं इस मोहत्सव पर एक भाविक गुलाबचंद को दिक्षा प्रदान कर मूनि श्री लावण्यविजयजी नामकरण किया |वि. सं. २००३ को मिश्रीमलजी प्रतापजी वेदमुत्था परिवार द्वारा आयोजित चातुर्मास के बाद मू. श्री देवेन्द्र विजयजी का दीक्षा मोहत्सव संघवी परिवार द्वारा संपन्न हुआ |

Shree Aadinath Temple - History of Bhuti (Godwad - Rajasthan)

वि. सं. १९९९ के मगसर शुक्ल 7 को आ. श्री यतिंद्रसूरीजी की निश्रा में संघवी देविचंदजी रामाजी को गोडवाड़ पंचतिथि का छ:री पालित संघ निकला, इस संघ के दरमयान वर्तमान सा. श्री संघवनश्रीजी का बाली में जन्म हुआ था, इसलिए इनका नाम सा. संघवनश्रीजी रखा गया| वि. सं. १९७४ के आषाढ़ शुल्क २ को गुरुदेवश्रीजी के शीषय बालीरत्न मू. श्री चन्द्रविजयजी व हर्षविजयजी एवं सा. प्रवर्तिनी श्री प्रेमश्रीजी के हस्ते भूति निवासी पूनमचंदजी वेदमुथा की पुत्री श्रीमती पेपाबाई व वेदमुथा खीमराजजी की पुत्री श्रीमती किशनीबाई को भूति में मोहत्सवपूर्वक दीक्षा प्रदान कर क्रमशः सा. श्री हीरश्रीजी एवं सा. श्री हुलासश्रीजी नामकरण हुआ| इनमे से सा. हीरश्रीजी जीवन के अंतिम १४ चातुर्मास भूति में करके वि. सं. २०४५ प्रथम जेष्ठ वादी ८, सन १९८८ ई. को भूति में स्वर्गवासी बने| भूति से कुल २ पुरुष व ५ महिलाओं ने दीक्षा ग्रहण की|

Shree Aadinath Temple - History of Bhuti (Godwad - Rajasthan)

श्री जैन नवयूवक मंडल : यह भूति जैन संघ की प्रमुख सहयोग संस्था है, जिसके तत्वावधान में हर वर्ष मुंबई में सुचारू रूप से स्नेह मिलन का आयोजन होता है |प्रति वर्ष पौष शु. गुरु सप्तमी को ग़ाव में त्रिदिवसीय मेला होता है, साथ ही हंजाबाई गौशाला बेडा के सहयोग से पशु चिकित्सा शिविर के भव्य आयोजन में सैकड़ो पशुओ का इलाज होता है | हर वर्ष फाल्गुण वदी ५ को होने वाले त्रिदिवसीय मेले में दोनों मंदिरों की ध्वजा लाभारती परिवार द्वारा चढ़ाई जाती है |गत अनेक वर्षो से संघवी राजुभाई व उनके सहकारी हर प्रोग्राम की व्यवस्था करते है|

Acharya Shree RajendraSuriji Maharaj - History of Bhuti (Godwad - Rajasthan)

राजकीय पार्वतीबाई मिश्रीमलजी वेदमुथा हाईस्कूल : रामाजी परिवार द्वारा राजकीय पार्वतीबाई मिश्रीमलजी वेदमुथा हाईस्कूल का निर्माण पुत्र स्व. सुभाषजी वेदमुथा द्वारा करवाया गया है | ” बैंक ऑफ़ इंडिया “ की शाखा का भूति में होना ग़ाव के लिए गर्व की बात है | आसपास के ५० की. मी .के दायरे में भी ऐसा राष्ट्रीकृत बैंक नहीं है| आसपास के अनेक गावो के जरुरतमंदो को यहा ऋण वितरण एवं राष्ट्रीय योजनाओ की अनेक राशि लाभार्थियो के खाते में सीधे जमा होती है| ग़ाव में जैन मंदिरों के आलावा श्री महादेवजी व श्री हौन्मांजी के मंदिर है| हॉस्पिटल , दूरसंचार , पानी योजना , सहकारी सोसायटी ,पोस्ट जैसी अनेक सुविधाए उपलब्ध है |आवागमन हेतु फालना, पाली व जालोर से बसों की अच्छी सुविधाए है | पास ही ३ की. मी .दुर अति प्राचीन ओलावती नगरी की पाहाडी के तल्हेटी में कवलां तीर्थ है |जहां वि. सं. १११ की प्रतिष्ठत श्री आदिनाथ दादा की प्रतिमा स्थापित है| २००० वर्ष से अधिक प्राचीन तीर्थ पर वर्तमान में जैनों का एक भी घर नहीं है |सिलावटी पट्टी के प्रतिनिधि यहां की व्यवस्था संभालते है| होली यहां का मुखय तोहार है | इस मौके पर सामूहिक गैर नृत्य के साथ महिलाओं द्वारा “घुम्मर नृत्य” होता है | 


 परम पुज्य सेवाभावी सा. श्री संघवनश्रीजी म. सा. (भूति)

Sadhviji Shree SanghwanShriji Maharaj - History of Bhuti (Godwad - Rajasthan)

वि.सं. १९९९ के मगसर शु. ९ को आपश्री के सांसारिक परिवार यानि संघवी देविचंदजी रामाजी वेदमुत्था– भूति निवासी की ओर से प.पू.आ. श्री यतींद्रसूरीजी आ. ठा. की पावन निश्रा में करीब एक महीने का श्री गोडवाड़ पंचतीर्थी का छ: री पालित संघ का प्रस्थान हुआ| निर्धारित तीर्थो की यात्रा करता हुआ संघ राणकपुर पंहुचा, पौ.कृ. १३ को संघमाल हुई व संघ ने अगले पड़ाव हेतु प्रस्थान किया| सादड़ी-मुंडारा होते हुए संघ पौष शु. ४ को बाली पधारा, यही माता सौ. बदामीबाई की कुक्षी से कन्यारत्न का जन्म हुआ| परिवार में हर्षोलास का पारावार न रहा| यात्रियो ने संघवी परिवार को “लक्ष्मी” आगमन पर बधाईया दी| चालु संघ में जन्म होने से सभी ने मिलकर कन्यारत्न का नाम “संघवणबाई” रखा| कालांतर में विवाह योगय होने पर आपका विवाह गोल निवासी यूवा श्री तिलोकचंदजी के साथ संपन्न हुआ| समय के साथ दो कन्या रत्नों को भी जन्म दिया, पर विधि को कुछ और ही मंजूर था| अचानक एक दिन पति का देहांत हो गया| इस दुर्घटना से आपको मानसिक आघात पंहुचा| आगे संसार को असार समझ आपने संयम ग्रहण करने को निर्णय लिया| परिवारजनों की आगिया से आपश्री ने भूति में प.पू.सा. श्री ललितश्रीजी के चरणों में स्वंय को समर्पित करते हुए वि.सं. २०२६, पौष शु. १५ को गुरु पुषय नक्षत्र में संयम ग्रहण किया एवं गुरुजनों ने आपका  साध्वीश्रीजी “संघवनश्रीजी म.सा. ” नामकरण किया| “छ:री पालित में हुआ अवतरण, असार संसार को त्याग कर किया संयम धारण“| छोटी पुत्री ने साथ रहने की ठानी और बड़ी पुत्री मामाश्री के पास रही| छोटी पुत्री भागु पर भी सयम का रंग चढ़ा व वि.सं. २०३९ वै. सु. ६ को पालीताणा में मू, श्री हेमेंद्रविजयजीम. सा. के हाथो दीक्षा ग्रहण की व सा. श्री तत्वलोचनाश्रीजी नामकरण हुआ| बड़ी पुत्री मंजू का विवाह चौराऊ निवासी यूवाश्री किशोरजी गोवाणी के साथ हुआ| कुछ वर्षो बाद आप दोनों को संयम लेने की इच्छा हुई, पर परिवार से आगिया प्राप्त नहीं हो रही थी, आप दोनों ने सांसारिक जीवन में भी “संयम” जीवन का निर्णय लिया| दोनों की प्रबल इच्छा को देख परिवार ने अंतत: आगिया दे दी और चौराऊ में वि.सं. २०६७ जेठ वादी-३ रविआर दी. 30 मई २०१० को एक ही दीक्षा मंडप में दोनों ने संयम लिया| प.पू.मू. श्री जयानंदविजयजी ने जमाई किशोरजी का मू. श्री जिनविजयजी एवं पुत्री मंजू का सा. श्री त्रिलोकयरत्नाश्रीजी नामकरण किया| इस तरह स्वयका पूरा परिवार संयमी बनकर धन्य हुआ| इन दोनों दीक्षाओ के बीच आपश्री के सांसारिक कनिष्ठ भ्राता श्री संपतराजजी की सुपुत्री भारतीबेन को भी भुआ म.सा. के सान्निध्य में संयम का रंग चढ़ गया और परिवारजनों ने उसकी प्रबल भावना को देख उसे भी संयम की अनुमति दे दी, जिसके बाद उसने भूति में गच्छाधिपति राष्ट्रसंत शिरोमणि श्री हेमेन्द्रसूरीजी आ. ठा. के कर कमलो से वि.सं. २०४९ पौष शु. १४ बुधवार २६ जनवरी १९९४ को संयम लिया| आपश्री ने उसका सा. श्री हर्षवर्धनाश्रीजी नामकरण किया| आपकी सेवाभावी वृति व कुशल व्यवहार से अनेको मुमुक्षु आत्माओ ने आपश्री के पास संयम ग्रहण किया| आपश्री के साथ प.पू.सा. श्री तत्वदर्शनाश्रीजी व श्री मणीप्रभाश्रीजी आदि ५० शिष्यरत्नाओ का विशाल परिवार है|

इस छ:री पालित संघ की मुझे इनसे भी प्रेरणा मिलती रही| मई जब भी आपसे मिलता, मुझे हमेशा उलाहना देती – “सारी दुनिया को यात्रा करवाता है, मुझे कब करवाएगा |” और में कहता -” एक दिन जरुर करवाउगा|” वर्षो बाद अब वो तमन्ना पुरी होती नजर आ रही है| स्वस्थय ठीक न होने पर भी मेरे आग्रह पर भीनमाल राजस्थान से लम्बा व उग्र विहार कर आपश्री संघ में अपने शिष्य परिवार के साथ “निश्रा” प्रदान क्र रही है| मई आपश्री का सांसारिक चचेरा भाई हु इसका मुझे सैदव गर्व रहेगा| मेरा व परिवारजनों का आपके पावन पवित्र चरण कमलो में शत: शत: वंदन है….