भीनमाल

राजस्थान की गौरव धरा में भीनमाल शहर की गणना देश के प्राचीन नगरों यथा दिल्ली, विदिशा, श्रुंगवेरपुर, द्वारिका, उज्जैन, अयोध्या आदि में की जा सकती है। यह नगर अनेक बार बसा और नष्ट हुआ – कभी प्रकृति की विभीशका से तो कभी विदेशी आक्रान्ताओं से । मगर इसकी जिजिविशा ने उसको पुनः पुनः संवारा है।

भीनमाल नगर की स्थापना किसने तथा कब की इसका कोई प्रमाण या सर्वसम्मत मान्यता उपलब्ध नहीं है। कुछ की मान्यता है कि ईसा पूर्व ५३५ में जब सिंध – सौवर राज्य, जिसकी राजधानी वीतभयपत्तन थी, में भयंकर प्राकृतिक प्रकोप हुआ जिसके कारण बडी संख्या मे लोग पलायन कर यहा आ बसे व इस स्थान को सुविधाजनक पाकर यही बस गये। दुसरी मान्यता उसी क्षेत्र पर शक आक्रमण के पश्चात हुये पलायन से जुडी़ हुई है। कुछ संदर्भ यह बतलाते है की कि यहॉ कभी भीलो की बसती हुआ करती थी जो विस्तार पाकर भीलमाल या भीनमाल या भीनमाल नगर में बदल गईं। भीनमाल की स्थापना, नामकरण व इसके विस्तार के बारे में विस्तृत मगर अतिरंजीत सूचनरऐं श्रीमालपुराण, जो स्कन्धपुराण का ही एक भाग है, से प्राप्त होती है। इसके अनुसार इसकी रचना विष्णु के आदेश पर विश्व्कर्मा ने की थी । विभिन्न मान्यताओं से परे हटकर हम इतना तो निश्चित रुप से कह सकते है कि भगवान महावीर के समय तक यह नगर स्थापित हो चुका था।

संवत २०१३ में किये गये उत्खनन मे यहॉ से कुशान काजीन हथियार, रोमन घडा आदि प्राप्त हुए हैं जो इस नगर की प्राचीनता को प्रमाणित करते है। दो दशक पुर्व की गई खोज के आधार पर यह माना जा रहा है कि देश की प्रमुख व प्रवित्र नदी सरस्वती, जो अब विलप्त हो गई है, कभी भीनमाल क्षेत्र में प्रवाहित होती थी तथा यहॉ प्राचीन जलमार्ग था। इसके इतिहास से सरोकार रखने वाले तथ्य हमें प्राचीन पुस्तकों, शिलालेखों, वंशावलियो व पटटावलियों, ऐतिहासिक, धार्मिक साहित्यिक रचनाओं, पुराविदों, इतिहास व भूगोलविदो दवारा किये गये शोध प्रबधों तथा विदेशी यात्रियों के वृतांतो में मिलता है। श्रीमालपुराण, प्रबंध चिन्तामणी, कुवलयमाला,निषिथचूर्णी, विमलप्रबंध, भोजप्रबंध, विभिन्न तीर्थमालाओं में इस नगर का उल्लेख है। विदेशी यात्रियों सातवी सदी में व्हेनसांग, ११ वीं में अल्बेरुनी तथा १७ वीं सदी के प्रारंभ में पुफलेट ने भीनमाल का अवलोकन किया था व अपने यात्रा वृतांत में इसका विवरण दिया। बाम्बे गलेटियर (सन १८९१) में इसके खण्डहरों का विवरण तथा इस नगर से संबधित जनश्रुतियों का रोचक संकलन किया गया है।

जितना पुराना यह नगर है उतनी ही पुरानी व यशस्वर यहॉ की जैन परम्परा रही है। एक लेख के अनुसार भगवान महावीर स्वयं भी  यहॉ आऐ थे मगर इसकी पुष्टी किसी अन्य संदर्भ से नहीं होती। इस नगर में जैन धर्म की प्रभावी आहट हमें वीरनिर्वाण संवत ५२ या ५७ में सुनाई पडती है जब विभिन्न बाधाओं को पार करते हुए तीर्थकर भगवान पर्श्वनाथ की पंचम पटटधर स्वयंप्रभसूरि ने इस नगर के राजा जयसेन तथा प्रजा के एक बडे भाग को प्रतिबोधित कर जैनमत का अनुयायी बनाया था व इस नगर में जैन धर्म की नींव डाली थी। इसके पश्चात इस परम्परा के आचार्यो का निरन्तर आगमन इस क्षेत्र में होता रहा ।

यहॉ भगवान पर्श्वनाथ व महावीर के विशाल मंदिरों का निर्माण हुआ जिनकी चमत्कारी प्रतिमाओं के कारण इस नगर को तीर्थरुप में मान्यता मिली। हूण राजा तोमाण, जिसने इस नगर को अपनी राजधानी बनाया, पार्श्वनाथ परपंरा के आचार्य हरिगुप्तसुरी द्वारा ही प्रतिबोधित हुआ था। एकाध अपवाद को छोडकर यहॉ के पष्चातवर्ती राजा भी जैनधर्म के प्रति उदार रहे व जैन संस्कृती को प्रज्जवित होने का पूर्ण अवसर मिला है।

प्राचीन पटटावली व आचार्यो के जीवनवृत्तों से जो जानकारी मिलती है उसके अनुसार भीनमाल में समय – समय पर अनेक जैन मंदिरों का निर्माण हुआ था जो कालक्रम में प्राकृतिक कारणों से या विदेशी आक्रान्ताओं के कारण नष्ट हो गये। इन मंदिरों के अस्तित्व का पता हमें उस समय लिखी गई रचनाओं से लगता है। इन मंदिरों की भव्यता के कारण ७-८ वीं सदी में भीनमाल की गणना तीर्थरुप में होने लगी थी। आचार्य उद्योतनसूरी ने ‘कुवलयमाला’ (वि‐ स‐ ८३५) में अपनें गुरु की भीनमाल के यात्रा का उल्लेख किया है। ‘उपमितिभवप्रपंचाकथा’ (वि‐ स‐ ९६२) में भीनमाल के मंदिर का उल्लेख इस प्रकार किया गया है – “जहॉ अतुलनीय रथयात्रा महोत्सव से वर्धित, अखिल देवभवनों के मध्य में श्रेष्ठ उन्नत जयपताका से विभूषित और सतत प्रमुदित करने वाला जिनेन्द्र भगवान का मंदिर विद्यमान है।” आचार्य सिव्दसेनसूरी के ‘सकलतीर्थस्तोत्र’ के अनुसार यहॉ छः जैन मंदिर थे। पं. कल्याणसागर ने ‘पार्श्वनाथ चैत्य परिपाटी’ में यहॉ के गोडी पार्श्वनाथ को सुख का दातार बतलाया है। ११ वीं सदी के महाकवि धनपाल ने ‘सत्यपुरीय महावीर उत्साह’ स्तोत्र में इसकी गणना मुख्य तीर्थो में की है।

पं. शीलविजय कृत ‘तीर्थमाला’ ( सं‐ १७४६) में यहॉ की पार्श्वप्रतिमा को “भिनमाल भयभंजनाथ” का संबोधन दिया है। उपाध्याय मेघविजय ने ‘पार्श्वनाथमाला’ में भीनमाल के सौंदर्य का उल्लेख किया है। अचनगच्छीय आचार्य महेन्द्रसूहर ने सं‐ १४४४ में ‘तीर्थमाला प्रकरण’ की रचना की थी। इसमें भीनमाल को तीर्थ बतलाया है। इसीप्रकार जीनप्रभसूरि ने ‘विविध तीर्थ कल्प’ में इसे भगवान महावीर का तीर्थ कहा है। यहॉ पर प्रतिष्ठित भगवान महावीर की धातुमय प्रतिमा सौराष्ट्र से उस वक्त लाई गई थी जब वल्लभीपूर यवनों व्दारा सं‐ ८४५ में लुटा गया था। इस विशयक एक लेख भी प्राप्त हुआ है। यहॉ की पार्श्वनाथ प्रतिमा को जो एक मंदिर स्थापित थी, मलेच्छो के भय से छिपा दी गई थी, सं‐ १६५१ में खुदाई के दौरान प्राप्त हुई। इसको पुनः स्थापित किया गया। इस प्रतिमा के चमत्कारों के कई किस्से प्रचलित है।

भीनमाल की जैन परम्परा एक गुलदस्ता है जिसमें सभी गुच्छों के फूल लगे है। यह नगरी विभिन्न आचार्यो की चरणरज से पवित्र तथा प्रभावी हूई है। यहॉ अनेको आचार्यो का जन्म तथा स्वर्गवास हुआ जिनमें जैन शासन की प्रभावना करने वाले आचार्य इन्द्रदेवसूरी, शिवचन्दगणी महत्तर, आ. दुर्गस्वामी, आ. सिद्वर्शि, आ. वीरसूरी, वाचनाचार्य वीरगणी, आ. देवगुप्तसूरी, आ. सिध्दसूरी, आ. धर्मप्रभसूरी, आ. अमररत्नसूरी, आ. भावसागरसूरी, आ. ज्ञानविमलसूरी प्रभावकमुनि न्यायसागर, आ. महेन्द्रसूरी आदि नाम शामिल है। विक्रम की पहली शताब्दी में सुधर्मास्वामी के आठवे्र पट्टधर प्रजस्वामी के इस क्षेत्र में भ्रमण करने के उल्लेख मिलते है। शंखेष्वरगच्छ के चिभिन्न आचार्यो ने भी भीनमाल को आपनी कर्मभूमि बनाया । दशवी में सिध्दश्री व दुर्गस्वामी व उनके शिष्यों ने इस क्षेत्र मे धर्मप्रभवना की। १४ वीं सदी में खरतरगच्छ के आचार्यो का आगमन हूआ। आ‐जिनेश्वरसूरी व्दारा यहॉ प्रतिष्ठा करने व दीक्षा देने के उल्लेख मिलते है। आ. जिनबोधसूरी, आ. जिनचंद्रसूरी, तथा जिनपालोपाध्याय ने भी इस क्षेत्र में भ्रमण किया है|

अचलगच्छ का भीनमाल से अति निकट का संबध रहा । गच्छप्रणेता आर्यरक्षितसूरी का प्रथम श्रावक यशोधन भीनमाल का ही मूल निवासी था। इस गच्छ के आचार्यो एवं साधू – साध्वियों का निरन्तर आगमन इस क्षेत्र में बना रहा। भीनमाल ने इस गच्छ को योग्य आचार्य भी दिये है। ताजे इतिहास में 20 वी सदी के महानायक आ. राजेन्द्रसूरी ने इस नगर में प्रभावी प्रभावना की। विचारधारा की निकटता के कारण अंचलगच्छ से प्रभावित इस क्षेत्र ने राजेन्द्रसूरी को सहज रुप से अपना मार्गदर्शक स्वीकार कर लिया। आज भीनमाल के लगभग प्रत्येक जैन मंदिर में उनकी प्रतिमा स्थापित है। इस गच्छ के अन्य आचार्यो व साधुओं द्वारा भी इस क्षेत्र मे नियमित भम्रण हुआ। आचार्य हेमेन्द्रसूरी की दीक्षा तो इसी नगर में हुई थी। गच्छ के पुर्व आचार्य द्वारा भी इस नगर में प्रतिष्ठाऐं व दीक्षाओं के मांगलिक कार्य हुए है।

भीनमाल जैन समाज की पोरवाल श्रीमाल जातियों का उदय स्थल है जैसा कि ओसिया नगर को ओसवालों का स्थापना नगर माना जाता है। भगवान महावीर यद्यपि वर्ण व जाति व्यवस्था में विश्वास नहीं करते थे मगर धर्म पालन की दृष्टी से आचार्यो ने सामालिक आधार बनाना आवश्यक समझा था। यह कहा जाता है कि आचार्य रत्नप्रभसूरी ने जब भीनमालवासियों को प्रतिबोधित किया था तो उस समय जो लोग नगर के पुर्वभाग में निवास करने वाले कोटयाधिपति थे, वे प्राग्वाट और आगे चलकर पोरवाल श्रावक कहलाने लगे तथा जो अपेक्षाकृत कम धनवान थे वे श्रीमाल श्रावक कहलाये।

जैन परंपरा में अनेक गच्छो का उदय हुआ है। उनमें एक ‘भीनमाल गच्छ’ भी है। यद्यपि इसका जन्म कब तथा कैसे हुआ तथा यह किस गच्छ की शाखा थी- यह स्पष्ट नहीं है मगर माण्डव के तारापुर, तारंगा की कोटीशिला, पाली के नोलखा मंदिर आदि स्थलों के मूर्तिलेख इसके अस्तित्व को प्रमाणित करते है। इसी प्रकार कुछ रचनाओं की प्रशस्तियों व लेखों में ‘भीनमाल कुल’ का उल्लेख मिला है। पार्श्वनाथ परम्परा जो उपकेशगच्छ कहलाती है, में भीनमाल शाखा का प्रारम्भ भी इसी नगर से हुआ था।

बाहय आक्रमण, आंतरिक राजनीतिक परिवर्तन, व्यवसाय या अन्य व्यक्तिगत कारणों से कई परिवार भीनमाल छोडकर अन्यत्र जा बसे। इन भीनमाल पुत्रों व उनके वंशजों ने उनके नये स्थानें पर भी अपने कुल व धर्म का गौरव बनाये रखा व जैन धर्म की प्रभावना में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। यह परम्परा आज भी अविरत है व जैन तीर्थों कि विकास में इनका सर्वाधिक योगदान है। अभी हम कुछ ऐतिहासिक व्यक्तीयों का ही उल्लेख कर रहे है। महामात्य निन्नक , जिसने तथा जिनके वंशजों ने वनराज चावडा तथा उसके पश्चातवतह राजाओं के शासनकाल में महामात्य, दण्डनायक जैसे महत्वपूर्ण पद प्राप्त किये, मूलतः भीनमाल के ही वासी थे। निन्नक ने पाटक तथा नारंगपुर में, उसके पुत्र लहर ने सांडेरग्राम में मंदिरों का निर्माण किया। इन्हीं कि वंशज वितनशाह हूए ,जिसने आबू में विश्वप्रसिध्द ‘विमलवसिंह’ का निर्माण वि‐ सं‐ १०८८ में किया था। कासिन्द्रा के रमणीय मंदिर के निर्माता गोलच्छी पुत्र जज्जूक भी भीनमाल के निवासी ही रहे थे जिसका उल्लेख मंदिर के शिलालेख में हुआ है। ‘भीनमाल कुल ’ के शांति नामक आमात्य ने अणहिलपाटन में मंदिर बनवाया था। अचलगच्छ पट्टावली तथा अन्य सूत्रों से पता चलता है कि भीनमाल से जासर अन्यत्र बसे श्रेष्ठियों ने बडोदा, नाहपा, भारोल, सिरोही, जालोर, चित्तोड, बाडमेर, पाटण, मियांगोव, वरकाणा आदि नगरों में मंदिरों तथा प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा करवाई थी।

भीनमरल साहित्य साधना का भी केंद्र रहा है। यह पर कभी विद्या की पीठ थी। इसकी तुलना उस समय विव्दानों के केन्द्र रहे उज्जैन व धारानगरी से की जाती थी। भीनमाल को मारवाड की धारानगरी कहा गया है। यहॉ जैन व जैनेतर विपूल साहित्य की रचना की गई।‘उपमितिभवप्रपंचा कथा का अनेक विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ तथा जिसको आधार बनाकर कई ग्रंथ लिखे गये है, की रचना इसी नगर में सं‐ ९६२ में जैनाचार्य सिध्दर्षि ने की है।

72_jinalayas

श्री लक्ष्मीवल्लभ पार्श्वनाथ ७२ जिनालय महातीर्थ |

भीनमाल को उसका पुराना वैभव पुनः लौटाने के लिए अनेक श्रेष्ठी अपनी संपदा का सदुपयोग कर रहे है। विगत वर्षो में यहॉ न केवल जीर्णोध्दार हूए है वरन नयें स्थापत्यों का निर्माण भी हुआ है। बाफनावाडी क मंदिर भी ऐसा ही नव निर्माण है । यहॉ धर्मशाला तथा भेजनशाला की सूविधा भी उपलब्ध है। एक और भव्य जिनालय की निकट में ही प्रतिष्ठा होने वाली है जो ‘लक्ष्मी वल्लभ पार्श्वनाथ ७२ जिनालय’ के नाम से जाना जाएगा। आचार्य हेमेन्द्रसूरी तथा इस लेखक की प्रेरणा व मार्गदर्षशन में निर्मित यह मंदिर इस क्षेत्र का प्रथम ‘बहत्तर जिनालय’ होगा जिसमें गत, वर्तमान तथा आगत चैबीसी तीर्थकरो की प्रतिमाऐं प्रतिष्ठीत की जाएगी। इस मंदिर में मंदिर धर्मशाला, उपाश्रय आदि बनकर तैयार है। साथ ही एक विशाल पुस्तकालय एवं संग्रहालय का निर्माण विचाराधीन है। इस मंदिर का निर्माण श्रेष्ठीवर्य स्व. हजारीमल सूमेरमल लूकंड परिवार द्वारा करवाया गया हैं।

 

– मुनि श्री ऋषभचंद्रविजयजी