Bhamashah Kavadia

∗दानवीर श्री भामाशाह कवाडिया

भामाशाह का जन्म राजस्थान के मेवाड़ राज्य में 29 अप्रैल, 1547 को हुआ था| इनके पिता का नाम भारमल था, जिन्हें राणा साँगा ने रणथम्भौर के क़िले का क़िलेदार नियुक्त किया था| कालान्तर में राणा उदय सिंह के प्रधानमन्त्री भी रहे| भामाशाह बाल्यकाल से ही मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के मित्र, सहयोगी और विश्वासपात्र सलाहकार रहे थे| भामाशाह दानवीर के साथ काबिल सलाहकार, योद्धा, शासक व प्रशासक भी थे| महाराणा प्रताप हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून, 1576 ई.) हार चुके थे, लेकिन इसके बाद भी मुग़लों पर उनके आक्रमण जारी थे| धीरे-धीरे मेवाड़ का कुछ इलाका महाराणा प्रताप के कब्जे में आने लगा था| किन्तु बिना बड़ी सेना के शक्तिशाली मुग़ल सेना के विरुद्ध युद्ध जारी रखना कठिन था. सेना का गठन धन के बिना सम्भव नहीं था| राणा ने सोचा जितना संघर्ष हो चुका, वह ठीक ही रहा. यदि इसी प्रकार कुछ और दिन चला, तब संभव है जीते हुए इलाकों पर फिर से मुग़ल कब्जा कर लें| इसलिए उन्होंने यहाँ की कमान अपने विश्वस्त सरदारों के हाथों सौंप कर सन 1578 ईस्वी में गुजरात की ओर कूच करने का विचार किया| प्रताप अपने कुछ चुनिंदा साथियों को लेकर मेवाड़ से प्रस्थान करने ही वाले थे कि वहाँ पर उनके पुराने साथी व नगर सेठ भामाशाह उपस्थित हुआ|

भामाशाह Bhamashah in Hindi (3)

भामाशाह ने अपने साथ परथा भील लाये थे. उसके बारे में महाराणा को बताया कि, “परथा ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर पूर्वजों के गुप्त ख़ज़ाने की रक्षा की और आज उसे लेकर वह स्वयं सामने उपस्थित हुआ है. मेरे पास जो धन है, वह भी पूर्वजों की पूँजी है. मेवाड़ स्वतंत्र रहेगा तो धन फिर कमा लूँगा. आप यह सारा धन ग्रहण कीजिए और मेवाड़ की रक्षा कीजिए.” भामाशाह और परथा भील की समर्पण, ईमानदारी और देशभक्ति देखकर महाराणा प्रताप का मन द्रवित हो गया. उन्होंने दोनों को गले लगा लिया. महाराणा ने कहा “आप जैसे सपूतों के बल पर ही मेवाड़ जिंदा है. मेवाड़ की धरती और मेवाड़ के महाराणा सदा-सदा इस उपकार को याद रखेंगे. मुझे आप दोनों पर गर्व है.” “भामा जुग-जुग सिमरसी, आज कर्यो उपगार। परथा, पुंजा, पीथला, उयो परताप इक चार।।” – महाराणा प्रताप – अर्थात “हे भामाशाह! आपने आज जो उपकार किया है, उसे युगों-युगों तक याद रखा जाएगा. यह परथा, पुंजा, पीथल और मैं प्रताप चार शरीर होकर भी एक हैं. हमारा संकल्प भी एक है.” भामाशाह ने मेवाड़ के अस्मिता की रक्षा के लिए दिल्ली गद्दी के प्रलोभन भी ठुकरा दिया था. उन्होंने अपनी निजी सम्पत्ति में इतना धन 20,000 सोने के सिक्के व 25,00,000 रुपये दान दिया था कि जिससे 25,00,0 सैनिकों का बारह वर्ष तक निर्वाह हो सकता था. इसी धन की बदौलत 1578 से 1590 तक वे गुप्त रूप से छापामार युद्ध तथा कई बार प्रगट युद्ध करते हुए विजय की ओर बढते रहे. सन 1591 से 1596 तक का समय मेवाड़ और महाराणा के लिए चरम उत्कर्ष का समय कहा जा सकता है|

महाराणा प्रताप सिंह ने भामाशाह को प्रधानमंत्री पदोन्नत किया था| हल्दी घाटी के युद्ध के बाद भामाशाह के भाई ताराचंद कवाडिया जिन्होंने भामाशाह के साथ कंधे से कंधा मिलकर लडे थे, उनको गोडवाड का राज्यपाल सौप दिया| ताराचंद ने अपने मृत्यु के समय तक गोडवाड की रक्षा की|ताराचंद के काम को देखकर लोगों ने उन्हें “ठाकुर” के नाम से संबोधित किया|“सादडी” ग़ाव ताराचंद ने खोजा था , जहाँ उन्होंने कई इमारते का निर्माण किया| “सादडी” को मेवर और मारवाड़ के बीच का द्वार कहा जाता है|ताराचंद लोकगच्छ संप्रदाय एक महान सरक्षंक थे| उन्होंने श्री केसरिया जैन तीर्थ का नवीकरण किया था| इसके 1 वर्ष बाद महाराणा प्रताप निधन हो गया था| तथा 2 वर्ष बाद 52 वर्ष की आयु में भामाशाह का देहांत हो गया था| भामाशाह की दानशीलता के चर्चे उस दौर में आस-पास बड़े उत्साह, प्रेरणा के संग सुने-सुनाए जाते थे. इनके लिए पंक्तियां कही गई है-

वह धन्य देश की माटी है, जिसमें भामा सा लाल पला।

उस दानवीर की यश गाथा को, मेट सका क्या काल भला।।

बेमिसाल दानवीर! आत्मसम्मान और त्याग की यही भावना भामाशाह को स्वदेश, धर्म और संस्कृति की रक्षा करने वाले देश-भक्त के रुप में शिखर पर स्थापित कर देती है. भामाशाह अपनी दानवीरता के कारण इतिहास में अमर हो गए. भामाशाह के सम्मान में भारत सरकार ने सन 2000 में तीन रुपये डाक टिकट जारी किया. उनके नाम पर कई सरकारी योजनाओं, संस्थानों व स्थानों का नामकरण भी किया गया है.

भामाशाह Bhamashah in Hindi

मित्रों, भामाशाह का नाम महाराणा प्रताप के साथ वैसे ही इतिहास में दर्ज हो चुका है, जैसे राम के साथ हनुमान का. राम के मंदिर में हनुमान की मूर्ती जरूर लगती है, परन्तु हनुमान का मंदिर बिना राम की मूर्ती के पूर्ण माना जाता है. आज राजस्थान ही नहीं बल्कि देश और दुनिया में भामाशाह, दानदाता का पर्यायवाची बन चुका है. युगों – युग तक धन अर्पित करने वाले दानदाता को दानवीर भामाशाह कहकर उसका स्मरण-वंदन किया जाता रहेगा|

भामाशाह Bhamashah in Hindi (4)

उदयपुर में स्तिथ भामाशाह का पुतला