Bali

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History of Bali Gaon – Godwad (Rajasthan)

बाली गाँव का परिचय 

 

राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर सांडेराव से १८ की. मी . दुर्र्र स्तिथ ” बाली “ अरावली पर्वत श्रुंखला से निर्ज्हरित  छोटी- बड़ी या संखय जलधाराओ व प्राकृतिक सौन्द्रय से शुशोभित गोडवाड़ क्षेत्र का हृदय स्थल है | बाली नाम के संबंध में अनेक कींवदंतीया प्रचलित है-

१. उदयपुर के महाराणा की महारानी ” बालिकुंवरी” के नाम से यह बसाया गया था,इसलिए इसका नाम ” बाली” रखा गया |

२. यह भी कींवदंती प्रचलित है की बाली नामक चौधरानी ने सर्वप्रथम यहां निवास कीया , जिससे इसका ” बाली” पड़ा |

३. संवत् १२४० में चौहान राजा सर्व्वाली बालिदेव ने लड़ाई में विजयपरांत इसस नगर को राजधानी बनाकर स्वयं के नाम पर ” बाली ” नामकरण किया |

४. एक अनय कींवदंती के अनुसार ठाकुर चैनसिंहजी के हृदय महल की स्वामिनी देवासी जाती की ” बाली ” नामक सुबाला ने बोया ग्राम के महलों के षड्यंत्रों से ठाकुर की रक्षा कर इस पूण्यभूमि को शरणस्थली बनाया |अत : उसके प्रेम और उदात एहसान को अशुनन बनाए रखने के उधेशय  से स्थापित इस नगर का नाम ” बाली” रखा गया |

५. प्राकृतिक सौन्द्रय छठासे अभिभूत, धन से समुन्द्रशाली , प्रभावशाली और प्राणों से प्यारी इस धरती को पूज्य पूर्वजो, ऋषि-मुनियो ने ” बाली” कहकर पुकारा |

इस प्रकार अनेको कींवदनतियाप्रचलित है |वस्तुत: यदी इस एतिहासिक नगर के नामकारन के बारे में प्रचलित सरी कींवदंतीया लिखी जाए तो ” पाबूजी की पड ” बन जाए |यहां पांडवो के खेलने के गुल्ली-डंडे मौजूद है और भीम के बल प्रयोग के चमत्कार का नमूना धरती पर जोर से मारे गए लात से बने गड़े की बावड़ी और एक तालाब भी मौजूद है |प्राचीन जैन मंदिर में उपलब्ध सं. ११४३ का एक शिलालेख के अनुसार, सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह- उक्त संवत में महाराजधिराज जयसिंह का सामंत आश्वक था, जिसकी रानी की जीविका में ” बालाही ” ग्राम था |उस समय पालहा के पुत्र वोपनवस्थमन ने देवी के उत्सव के निम्मित चार द्रम दिए |आगे चलकर उसी इंसान द्वारा कुछ लोगो , कुओं आदि को एक-एक द्रम दिए जाने का उल्हेख है |बालाही ग्राम वर्तमान का बाली है |

दूसरा शिलालेख वि. सं. १२१६, श्रावण वादी-1 , ई. सन ११५९ तारीख ३ जुलाई , शुक्रवार का बाली से मिला हुआ सोलंकी राजा कुमारपालदेव के समय का है |यह यहां के माता के मंदिर के एक स्तंभ पर खुदा हुआ है और उसमे दंडनायक वैजल का उल्हेख है |

यहां प्रथम नाडोल के चौहानों का अधिकार था |बाद में जालौर के सोनगरा सरदारों का और उनके बाद मेवाड़ के राणाओ का अधिकार रहा | वि. सं. १८२६ से १८३३ के लगभग में यहां सोलंकिया के शासन की पुष्टि होती है | इसी से इसकी प्राचीनता प्रकट होती है | बाली नगर और विस्तृत ” बालिया” शेत्र की सुरक्षा हेतु नाडोल के राजा बालसिंहजी ने वि. सं. १६०८ में बाली नगर के समीप बहनेवाली मीठडी नदी के तट पर दुर्ग की स्थापना की, जिसे बाद के राजाओ ने समय-समय पर विस्तृत और सुदृढ़ कीया | एक और जानकारी के अनुसार , इस दुर्ग का निर्माण जोधपुर के शासको ने सन १५०२ ई. में करवाया था |

वर्तमान में दुर्ग राजस्थान सरकार के अधीन है |ऐसा भी कहते है की अंग्रेजो के शाशनकाल में इस दुर्ग में स्वतंत्रता सेनानियो को बंद रखा गया था, वर्तमान में इसमें सब जेल है|इसके अन्दर एक “बाहुगन” माता का प्राचीन मंदिर है , जो शीतला माता के मेले के दिन खुलता है एवं लोग दर्शन करते है |मेले के साथ ” गैर” नृतय भी होता है | स्वराज सतयग्रह के दौरान बाली के लोकप्रीय स्वतंत्रता सेनानी स्व. श्री छोटमलजी सुराणा और उनके सहकर्मियो को इसी किले में नजरबंद रखा गया था |

बाली के विमलपुरा और गांधी चौक स्तिथ दोनों जिनालय स्थापतय-कला के उत्कुष्ट नमूने है और अपनी भवयता एवं विशालता के लिए प्रसिद्ध है |श्री चन्द्रप्रभ जिनालय राणकपुर शैली का गिना जाता है | श्री बाली  जैन मित्र मंडल (मुंबई), श्री महावीर जैन युवक मंडल , श्री विमलनाथ जैन सेवा संघ , बाली यंगस्टर ग्रुप, श्री गौशाला पांजरापोल समिति, श्री ओसवाल भोजनशाला समिति , सेसली बोया पूनम ग्रुप आदि संस्थाए धार्मिक, सामाजिक और सार्वजनिक कल्याण के कामों में सक्रीय है |नगर में जैन लायब्ररी और वाचनालय की अच्छी व्यवस्था है |बाली के आधुनिक विकास में जैन समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहा है |वर्तमान में १६०० जैन परिवार है और ७००० की जैन जनसंख्या है |बाली की कूल जनसंख्या २५००० के करीब है |बाली विधानसभा क्षेत्र है |बैंक,दूरसंचार,पुलिस थाने, होटल, डाकबंगला व विश्रांति गृह है |नगरपालिका बाली में सिचाई एवं पेयजल की आपूर्ति जवाईबांध से होती है |

१. श्री मनमोहन पार्श्वनाथ मंदिर :

Shree Manmohan Parshvanath Temple - History of Bali Gaon - Godwad (Rajasthan)

गोडवाड की मरुभूमि में विख्यात बालीनगर, जो कभी “वल्लभी नगरी” के नाम से जाना जाता है, लगभग २००० साल प्राचीन है|इसके मुख्य बाजार में पार्श्वनाथ चौक स्तिथ विशाल , कलाकृति में अदभूत, सौधशिखारी जिनप्रसाद में अति ही सौमय व प्रभावशाली श्री मनमोहन पार्श्वनाथ प्रभु की श्वेतवर्णी पद्मासनस्थ , डेढ़ हाथ बड़ी (७८ सें. मी. ) प्रतिमा स्थापित है |प्रभु प्रतिमा बाली से ३ की. मी. दुर फालना सड़क पर सिथत श्री सेलगाव के तालाब में से प्रकट हुई थी | प्रतिमा बड़ी ही चमत्कारी है | मंदिर की निर्माण शैली ढंग की और अति सुन्दर है | ऊँची कुर्सी पर भव्य शिखरवाला चैत्य है |प्रतिमा प्राप्ति की भी रोचक कथा है |कहते है की लगभग २५० वर्ष पहले श्री गेमाजी श्रावक को स्वप्न में कहा की सेलागाव के तालाब में पार्श्वप्रभु की प्राचीन चमत्कारी प्रतिमा है, जिसे यहां की सेलगाव के तालाब के तालाब में पार्श्वप्रभु की प्राचीन चमत्कारी प्रतिमा है, जिसे यहा लाकर प्रतिशिष्ठ रही होगी , संभावना है की यवनों के आक्रमण के समय प्रतिमा को बचाने हेतु धरती में गाड दिया गया हो और वही प्रतिमा खुदाई में प्राप्त हुई है |प्रतिमा के प्राप्त होते ही सेला , बाली व अनय गावो के श्रावक वहा पहुचे |सभी प्रतिमा को अपने यहां ले जाने की बात करने लगे| अंत में तय हुआ की इस प्रतिमा को बैलगाड़ी में रख दो और बैल जहां भी प्रतिमा को ले जाएंगे , वहां प्रतिमा को प्रतिष्ठ कर दिया जाएगा |बैलगाड़ी प्रभु प्रतिमा को लेकर बाली बाजार पहुची और रुख गई| बहुत जोर लगाया गया, मगर गाडी आगे नहीं बढ़ी| श्री संघ ने समझा की शासनदेव की इच्छा इस्सी स्थान पर प्रतिमा को विराजमान करने की है |यह समझकर प्रतिमा को वही पर रखा गया |

Shree Manmohan Parshvanath Bhagwan - History of Bali Gaon - Godwad (Rajasthan)

ओसवाल हथुंड़ीया राठोड कूलभूषण गेमाजी व ओताजी दोनों भाईओ ने वि. सं. १८२० में जिनमन्दिर का निर्माण करवाकर प्रतिमा को प्रतिष्ठ कीया |इन्ही के वंशज गेमावत कहलाए, जो बाली , सांडेराव व शिवगंज में मौजूद है और स्वंय को गेमाजी का वंशज बताते है |किसी-किसी का यह भी कहना है की बाली का किला और यह मंदिर समकालीन है |इसके प्रतिष्ठाकर संदेरकगच्छय आ. श्री यशोभद्रसूरीजी महाराज है |प्रतिष्ठा के साथ ही बाली श्री संघ की बड़ी वृद्धी होती आ रही है |कालांतर में यह मंदिर जीर्ण-शीर्ण हो गया था |बाली के उपकारी गुरु लावण्य विजयजी की आगिया से मू. श्री वल्लभदत्तजी ने अपनी देखरेख में इसका जिनोर्द्वर कराया व श्री संघ ने आ. श्री सुशीलसूरीजी के कर कमलो से इसकी प्रतिष्ठा वीर नि. सं. २५०५, वि. सं. २०३५, वैशाख सुदी ६, बुधवार , दी. २ मई १९७९ को धूमधाम से संपन्न करवाई | ध्वजा का लाभ श्री पुखराजजी हजारीमलजी गेमावत एवं श्री लाल्चंदजी राम्चंदजी गेमावत ने लीया |मंदिर में प्रतिष्ठत एक पार्श्वनाथजी की प्रतिमा, वि. सं. १९५१ , माघ सु. ५, गुरूवार को वरकाना प्रतिष्ठास्तव में भट्टारक आ. श्री राजसूरीजी के हाथो अंजनशलाका प्राण प्रतिष्ठा की गई | दूसरी ओर आदेश्वर भगवान , पार्श्वनाथ व गुरु प्रतिमा तथा प्रतिमा की प्रतिष्ठा वीर नि. सं. २४७६, वि. सं. २००७, जेष्ठ शुक्ल ५, सोमवार को वल्लाभसूरीजी पट्टधर शीषय श्री ललितसूरीजी के शीषय सादड़ी रत्न पंडितरत्न पंनिआस पूर्णानंदविजयजी गनीके हाथो हुई है | एक और शयामवर्णी पर्श्वंथ प्रभु की प्रतिमा की अंजनशलाका आ. श्री वल्लभसूरीजी के हाथो वि. सं. २००६ के मगसर सुदी ६. शुक्रवार को बीजापुर के (मारवाड़) प्रतिष्ठोत्सव में हुई है |

वि. सं. २०१४ में लावण्य पौषधशाला का श्री वल्लभदत्त वि. के उपदेश से निर्माण व वि. सं. २०६२ में इसका जिनोर्द्वर संपन्न हुआ |

२. श्री चंद्रप्रभस्वामी मंदिर :

Shree Chandraprabhu Swami Bhagwan - History of Bali Gaon - Godwad (Rajasthan)

जैनियो की संख्या में वृद्धी के साथ ओसवाल श्री संघ ने भवय त्रिशिखरीय जिनालय निर्माण का निश्चय कीया |सौभागयवश बाली में मू. श्री मेरु वि. व श्री देव वि. का चातुर्मास हुआ | गुरु प्रेरणा पाकर संघ ने श्री धन्रुप्जी भेराजी बागरेचा की देखरेख में ६-७ वर्षो में श्राविका उपाश्रय की जगह पर पाषाण कलाकृति का उत्कुष्ट जिनालय निर्माण करवाया |

पंजाब केसरी आ. श्री वल्लभसूरीजी के शीषय आ. श्री ललितसूरीजी के शीषय पंडितरत्न पंनिअस श्री पूर्णानंदसूरीजी एवं मू. श्री ह्रींकारविजयजी आ. ठा. की निश्रा में वीर नि. सं. २४७६, शाके १८७१, वि. सं. २००६, जेठ सुदी ५, सोमवार, जून १९५० को शुभ मुहर्त में अंजनशलाका प्रतिष्ठा मोहत्सव संपन्न हुआ | मुलनायक ध्वजा का लाभ श्री खीमराजजी वनाजी चोपड़ा परिवार ने लिया |

गुरु मंदिर : श्री चंद्रप्रभु जिनालय के तलघर में नवनिर्मित गुरु मंदिर में पंजाब केसरी आ. श्री वल्लभसूरीजी , मू. श्री लावण्य वि. मू. श्री वल्लभदत्त विजयजी , नाकोडा भैरूजी व घंटाकर्ण महावीरजी की प्रतिष्ठा आ. श्री शांतिदूत पू. नित्यानंद्सुरीजी की निसरा में वीर नि. सं. २५१९ , विक्रम. सं. २०५०, जेष्ठ शु. ११, सोमवार, दी. ३१.५.१९९६ को संपन्न हुई | बाद में वि. सं. २०५२ में आ. श्री नित्योदयसागरसूरीजी के हस्ते माता पद्मावती व महालक्ष्मी देवी, श्री नाकोडा मूर्ति को जनेऊ पहनाई हुई है , जो अनयत्र कही देखने में नहीं आती |

चंद्रप्रभ जैन मंदिर स्वर्ण जअंती : आ. श्री धर्मधुरंधरसूरीजी के सानीधय में वीर नि. सं. २५२६, शाके १९२१,  वि. सं. २०६५, जेठ सु. ५ , मंगलवार, दी. ६ जून २००० को स्वर्ण जअंती व ध्वजा मोहत्सव संपन्न हुआ |

३. श्री विमलनाथ मंदिर :

Shree Vimalnath Temple - History of Bali Gaon - Godwad (Rajasthan)

श्वेत पाषण से निर्मित त्रिमंजिली शिखरबंध जिनालय में वर्तमान मुलनायक श्री विमलनाथ स्वामी की आकर्षक प्रतिमा प्रतिष्ठ है |पोरवाल संघ का यह जीनालय, २००० वर्ष पूर्व पांडव वंशज राजा गंधर्वसेन का बनवाया हुआ माना जाता है |इसका जिनोर्द्वर वि. सं. १०४० में हुआ था | पहले यहां मुलनायक श्री शांतिनाथ प्रभु थे, जो वर्तमान में दूसरी मंजिल पर स्थापित है| ६०० वर्ष पहले वि. सं. १५०० के जिनोर्द्वर बाद यहा मुलनायक श्री ऋषभदेव प्रभु की एक हाथ प्रमाण की श्वेतवर्णी प्रतिमा स्थापित हुई, जो जगद्गुरु अकबर प्रतिबोधक आ. श्री हीरसूरीजी के हाथो प्रतिष्ठत है | पहले यह जिनालय ओसवाल व पोरवाल दोनों समाज का संयुक्त जीनालय था |वर्तमान में यह प्रतिमा प्रथम मंजिल पर प्रतिष्ठत है | संघ ने वाद-विवाद व अशांति जैसी हालत में अंतिम जिनोर्द्वार के बाद वि. सं. २००६ में मुलनायक के रूप में विमलनाथ स्वामी को विराजमान कीया |कहते है की यह मंदिर पहले ५२ जिनालय था, पर भमती में प्रतिमाए प्रतिष्ठत नहीं हुई थी |

Shree Vimalnath Bhagwan - History of Bali Gaon - Godwad (Rajasthan)

भोयरे में चार बड़ी प्राचीन प्रतिमाए प्रतिष्ठत है| 1. राता महावीर प्रभु की सुनहेरी व अतिसुन्दर प्रतिमा दर्शनीय है ,२. श्री सुपार्श्वनाथजी , ३. वासुपुज्यस्वामी  व  ४. इस प्रतिमा पर लांचन नहीं है | मंदिर में संवत् ३०० का लेख है | भोयरे में शीतलनाथजी प्राचीन है| करीब १०० वर्ष पहले जमीन खोदते हुए सोने के सिक्के आठ आनी, चार आनी तथा दो आनी चांदी की निकली थी , जिनके ऊपर अक्षर भी खुदे है , पर बराबर पढ़ने में नहीं आते है |

४ . श्री सुपार्श्वनाथ मंदिर :

Shree Suparshvanath Bhagwan - History of Bali Gaon - Godwad (Rajasthan)

श्री आनंदराजजी गेमावत के घर के सामने गुरुभक्त श्री कुंदनमलजी ताराचंदजी परिवार द्वारा निर्मित इस सुन्दर जिनालय में त्रिस्तुतिक परंपरा के पट्टधर व्याखयान वाचस्पति आ. श्री यतिन्द्रसुरीजी आ. ठा. के वरद हस्ते यही के चातुर्मास बाद वि. सं. २००६, मार्गशीर्ष शु. ६, शुक्रवार ई. सन १९५० को नवनिर्मित वासुपूजय मंदिर में नूतन प्रतिमाओं व गुरुबिम्ब की अंजनशलाका एवं मार्गशीर्ष शु. १० बुधवार को प्राचीन धातु के परिवार के साथ प्रभु श्री सुपार्श्वनाथ स्वामी की प्रतिमा व श्रीमद विजय राजेंद्रसूरीजी की गुरु प्रतिमा की सह समारोह स्थापना की गई |इसी दिन कुंदनमलजी की सुपुत्री लीलावती का विवाह संपन्न हुआ था | यानी सुबह प्रतिष्ठा व शाम को विवाह किया था | इसके पहले आचार्य श्री का चातुर्मास हेतु आषाढ़ शु. १० को भव्य मंगल प्रवेश हुआ था |

५ . श्री संभवनाथजी मंदिर :

Shree Sambhavnath Temple - History of Bali Gaon - Godwad (Rajasthan)

बाली से फालना जाने वाली मुखय सड़क पर नगर के बाहर सत्र के सामने शेष्टिवरय पृथ्वीराजजी गमनाजी पंचम गोत्र परमार परिवार द्वारा छोटे भ्राता मोहनलालजी पृथ्वीराजजी की स्मृति में उनकी निजी जमीन पर निर्मित शिखरबंध जिनमंदिर में मुलनायक

Shree Sambhavnath Temple - History of Bali Gaon - Godwad (Rajasthan)

श्री संभवनाथजी आदि जिनबिंब व यक्ष -यक्षणी प्रतिमाओं की अंजनशलाका प्रतिष्ठा पंजाब केसरी प. पू. आ. श्रीमद् वल्लभसूरीश्वरजी म. सा. के शीषयरत्न प. पू. आचार्य भगवंत श्री पूर्णानंदसूरीश्वरजी के पावन सानिधय में वि. सं. २०२८ , गुरूवार को मोहत्सवपूर्वक हर्षोल्लाससे संपन्न हुई |

६ . श्री धर्मनाथजी मंदिर : यतीजी के उपाश्रय में शिखरबंधी मुलनायक श्री धर्मनाथस्वामी का वि. सं.१९५० में निर्मित मंदिर की प्रतिष्ठा यतीव्र श्री त्रिलोकसागरजी ने निर्माण करवाकर की | धर्मनाथ जिनालय का जिनोर्द्वर उपकारी गुरुदेव मुनिश्री वल्लभदत्त विजयजी के उपदेश  से बाली संघ ने संवत् २०२१ में करवाया और पुन: प्रतिष्ठा करवाई गई |

७ . श्री गौतामस्वामीजी दादावाडी : बाली से सेसली जाने वाले मार्ग पर विशाल दादावाडी भवन में प्रथम मंजिल पर गुरु मंदिर में गुरु गौतम स्वामी की १८ अभिषेक करवाकर भवय प्रतिमा दी. २६.५.१९८९ को स्थापित की गई , जिससे वासक्षेप पूजा हो सके | करीब ९० वर्ष पहले पानी की विकत समसया को धयान में रखकर दादावाडी का निर्माण हुआ, जिससे सभी को पानी की पूर्ति यहां से होने लगी | कालांतर में आसपास की भूमि क्रय करके विस्तार कीया गया | शादी-विवाह व धार्मिक कारयक्रम हेतु व्यवस्था की गई| कुछ कमरे व कबूतरखाने का निर्माण करवाकर दी. १५.९.२००२ को उद्घाटन किया गया| पुन: इसका जिनोर्द्वार करवाकर सं. २०६५, पौष वादी १३, गुरूवार दी. २५.१२.२००८ को श्री बस्तिमलजी कालूरामजी राठोड के हस्ते इसका उद्घाटन संपन्न हुआ| इस प्रसंग के नवहिंका महोत्सव पर आ. श्री विश्वचंद्रसूरीजी आ. ठा. व मुनिश्री जयानंद विजयजी म. सा. पधारे थे|

८ . श्री मणिभद्र दादा मंदिर : नयापूरा में बायो के उपाश्रय में प्रतिष्ठत मनिभद्रवीर की मूर्ति चमत्कारी है |

९ . श्री गौशाला पांजरापोल : यहा गौशाला करीब ६० वर्ष प्राचीन है, जिसका सञ्चालन ओसवाल एवं पोरवाल समाज साथ में एक रूप से करते है | जिसमे सर्व सुविधाए करीब १८ कमरे बनाए जाएगे |

१० . पंचम अतिथि भवन :पंचम मंच बाली द्वारा नगर के मध्य भाग में समाज बंधुओ के उपयोग हेतु अतिथि भवन का निर्माण करवाया जा रहा है ,जिसमे सर्व सुविधा करीब १८ कमरे बनाए जाएगे |

११ . निर्माणधीन सुरिमंत्र मंदिर : श्री सूरी महामंत्र मन्दिरम ट्रस्ट बाली द्वारा हिन्दुस्थान का प्रथम मूर्ति आकार में सुरिमंत्र मंदिर का निर्माण करवाया जा रहा है | 4 वर्ष पूर्व श्रुतभास्कर आ. भगवंत श्री भ. श्री धर्मधुरंधरसूरीश्वरजी की प्रेरणा सावं ३ वर्ष पूर्व वर्तमान गचाधिपति आ. भ. रत्नाकरसूरीश्वरजी म. सा. एवं श्रुत्भाष्कर आ. श्री धर्मधुरंधरसुरिशावार्जी की निश्रा में शिलनिआस विधि संपन्न हुई |इस निर्माणधीन शिखरबध जिनालय में २४ तीर्थंकर, ११ गंधार, ६४ इन्द्र इन्द्राणी , २४ यक्ष -यक्षणी, नवग्रह, १६ देवी , सुरिमंत्र की ५ पीठिका-सरस्वती , त्रिभुवनस्वामिनी महालक्ष्मी , गनिपीठ यक्ष , मणिभद्रवीर, गौतमस्वामी  आदि की मुर्तिया विराजमान होगी | संगमरमर पाषण से निर्मित होने वाले इस जिनालय में एक ही शिखर होगा और एक ही ध्वजा होगी, जो इसकी विशेषता होगी |समवसरण आकार में मुर्तिया विराजमान होगी |कल्पवृक्ष भी होगा | निर्माण कार्य प्रगति पर है | संवत् १०७१ वैशाख  माह में भवय प्रतिष्ठा संपन्न होगी |

बाली के संयमी रत्न : जिनशासन को समर्पित बाली के करीब २८ अनमोल रत्नों ने संयम लेकर स्वयम के साथ-साथ कुल एवं नगर का नाम रोशन किया है | वि. सं. १९५९ के फाल्गुण शु. को विश्वपूजय श्रीमद् विजय राजेंद्रसूरीजी आ. ठा. १५ ने बाली में अष्टाहिनका मोहत्सवपूर्वक पिता तेक्चंदजी बिरावत व माता पानिबाई के पुत्र चन्दनमल को दीक्षा प्रदान कर मू. श्री चंद्रविजय नाम रखा | इस मोहत्सव में और दो भाविकों को भी दीक्षा देकर मू. श्री नरेन्द्र वि. व मृगेंद्र वि. नामकरण किया गया |

वि. सं. १९७६ के सादड़ी चातुर्मास के बाद आ. श्री वल्लभसूरीजी ने वि. सं. १९७७, मार्गशीर्ष वदी २ को श्री कपूरचंदजी और गुलाबचंदजी बाली निवासी ओस्वालो को दीक्षा प्रदानकर क्रमशः मू. श्री देवेन्द्र वि. व मू. श्री उपेन्द्र वि. नामकरण किया एवं मार्गशीर्ष वादी ५ को मू. श्री ललित वि. ,उमंग वि., विदया वि. को गनी व पणनिआस पद प्रदान किया |

वि. सं. १९८६ में श्री खेमचंदजी हजारीमलजी राठोड ने पू. आ. श्री नेमीसूरीजी के शिष्य आ. श्री अमृतसूरीजी के पास दीक्षा ली व नामकरण मू. श्री खांटी विजयजी हुआ |आप ही के लघु भ्राता श्री नवमलजी ने वि. सं. १९९१ वै. व २ को शासन सम्राट श्री नेमिसुरीजी के हस्ते श्री कदंबगिरी तीर्थ पर दीक्षा लेकर मू. श्री निरंजन विजयजी बने व वडिलबंधू मू. श्री खांती वि. के शिष्य बने | मू. श्री खांटी विजयजी वि. सं. २०२१ फा. सु. १३ को बाली में स्वर्गवासी हुए |

इसके आलावा आ. श्री रत्नसेनसूरीश्वरजी म. सा. , मू. श्री निर्वाणयश वि., मु. श्री संयम कीर्ति वि. एवं अनेक साध्वी भगवन्तो ने दीक्षा लेकर स्वयम के जीवन को धनय बनाया |

अहमदाबाद-मुंबई रैलमार्गो ब्रॉडगेज में रूपांतर करवाने , विभिन्न नै यात्रि गाड़िया को चलवाने, आरक्षण सुविधा तथा विभिन्न यात्रि सुविधाओं के लिए प्रयासरत राजस्थान मीटर गेज प्रवासी संघ के तीनो संस्थापक सदस्य श्री विमलजी रांका, श्री कांतिलालजी सी. जैन और श्री लाब्धिराजजी जैन बाली के ही है |


गोडवाड़ के गौरव , बालीरत्न

आ. श्री रत्नसेनसूरीश्वरजी म. सा.