Shree Kuntunath Bhagwan

श्री कुंथुनाथ भगवान

 

17

17. Shree Kunthunath Bhagwan

 

कुंथुनाथजी : सत्रहवें तीर्थंकर कुंथुनाथजी की माता का नाम श्रीकांता देवी (श्रीदेवी) और पिता का नाम राजा सूर्यसेन था।

आपका जन्म वैशाख कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को हस्तिनापुर में हुआ था।

वैशाख कृष्ण पक्ष की पंचमी के दिन दीक्षा ग्रहण की तथा चैत्र शुक्ल पक्ष की पंचमी को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई।वैशाख शुक्ल पक्ष की एकम के दिन सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ।

जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-छाग, चैत्यवृक्ष- तिलक, यक्ष- गंधर्व, यक्षिणी-मानसी है।


प्रभु के नाम करण में गर्भित रहस्य 

कुंथुनाथ : गर्भ के प्रभाव से माता ने स्वप्न में पृथ्वी पर रत्नमय स्तुभ देखा| शत्रु कुंथु तुल्य बन गए और कुंथु जैसे जीवों की भी दया का पालन होता था – अत: प्रभु का नाम “कुंथु” रखा गया |

 

Father’s Name———————–Suryasen
Mother’s Name———————-Shrikanta Devi
Birth Place —————————Hastinapur
Birth Thithi————————–Baishak ku 14
Diksha Thithi ———————–Baishak ku  5
Kevalgyan Thithi—————— Chaitra su  5
Naksharta—————————–Krutika
Diksha Sathi————————- 1000
Shadhak Jeevan ——————   23,750 years
Age Lived—————————–95,000 years
Lakshan Sign————————Goat
Neervan Place———————–Sammed Sheekarji
Neervan Sathi ———————  1000
Neervan Thithi———————Baishak su 1
Colour ——————————-   Golden


***** जिन दर्शन स्तुति (Jin Darshan Stuti)*****

कित्ती कविंदेण कया हि कोडी ,

ते सिद्धिपत्ता भवकोडी-कोडी |

तं कुंथुणाहं सययं णमामि ,

सो सव्वणाय-जगजीवसामी |

इसका अर्थ है : जिनकी कविन्द्रों ने करोडो यशगाथा गई है,जो जीवों के करड़ों भवों के लिए कोटि-शास्त्र की धरा समान है, वे सिद्ध गति को प्राप्त हुए है , उन् कुंथुनाथ को मै सैदेव नमता हूँ, जो सर्वनय एवं जगजीव के स्वामी है| (प्रभु की देशना सर्वनय युक्त होती है)