श्री अवंती पार्श्वनाथ

श्री अवंती पार्श्वनाथ – उज्जैन

 

एक शुभ दिन नलिनी गुल्म-विमान में से एक भाग्यशाली देवात्मा का आयुष्य पूर्ण हुआ… और भद्र सेठानी की कुक्षी में उस देवात्मा का अवतरण हुआ| उसी समय भद्रा माता ने शुभ स्वप्न देखा| धीरे-धीरे समय व्यतीत होने लगा… और एक शुभ दिन भद्रा सेठानी ने एक अत्यंत ही तेजस्वी पुत्र-रत्न को जन्म दिया|

बालक का नामकरण किया गया-अवंतीसुकुमाल ! धीरे-धीरे अवंतीसुकुमाल बड़ा होने लगा| यौवन के प्रागंण में प्रवेश करने के साथ ही उसने पुरुषो की समस्त ७२ कलाओं में निपुणता हासिल कर दी… इतना ही नहीं धर्मकला में भी वह निपुण हुआ| देवागणनाओ जैसी ३२ नवयौवना कन्याओं के साथ उसका पाणीग्रहण हुआ|

एक बार आर्य-सुहस्ती म. पृथ्वीतल को पावन करते हुए अवंती में भद्र सेठ के द्वारा दी हुई वस्ति में पधारे| रात्री के समय में आचार्य भगवंत नलिनी गुल्म विमान अध्ययन का पुनरावर्तन करने लगा | उस समय अवंतीसुकुमाल पास ही के भवन में बैठा हुआ अपनी पत्नियो के साथ वार्ता-विनोद कर रहा था|

आचार्य भगवंत की स्वाध्याय-ध्वनि के शब्द अवंतीसुकुमाल के कानों में गिरे और वह सोचने लगा, “अहो! आचार्य भगवंत स्वाध्याय का वर्णन कर रहे है….वह दृश्य तो मैंने कही देखा है इस प्रकार विचार करते हुए उसे तत्श्रण जातिस्मरण ज्ञान उत्पान हो हुआ| उसे अपना पूर्व भव प्रत्यक्ष दिखाई देने लगा|

उसे लगा , “अहो ! गत भव में मई इसी नलिनी गुल्म विमान में देव के रूप में था| वहां के सुख और यहाँ के सुख में कितना बड़ा अंतर है| वहां के सुख मेरु-तुल्य है, तो यहाँ के सुख सरसों जितने ही है – इस प्रकार विचार कर वह उसी समय आचार्य भगवंत के पास आकर अत्यंत ही विनय पूर्वक बोला, “हे भगवंत !आप जिस नलिनी गुल्म विमान का वर्णन कर रहे हो, तो क्या आप उस विमान में से आ रहे है? “

आचार्य भगवंत ने कहा , ” नहीं ! हम तो श्रुत (शास्त्र) के बल से उस विमान का वर्णन कर रहे है|

“प्रभो ! मई उसी देवविमान में से च्यवकर आया हूँ -जातीस्मरण ज्ञान से मुझे उस विमान के सुख प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे है….अब मुझे यहाँ के सुख पसंद नहीं है, यहाँ के सुख मुझे तुच्छ प्रतीत हो रहे है| अत: मई यहाँ रहने में समर्थ नहीं हु| अत: पुन: वहां जाने के लिए मई दीक्षा लेना चाहता हूँ …. आप मुझे दीक्षा प्रदान करें|

आचार्य भगवंत ने कहा ,”महानुभाव ! लोहे के चने चबाना सरल है किन्तु संयम का पालन दुष्कर है |”

अवंतीसुकुमाल ने कहा , “प्रभो ! प्रव्रज्या को ग्रहण करने के लिए मेरा मन अत्यंत ही उत्कंठित बना हुआ है…मै दीर्घकाल तक संयम पालन करने में असमर्थ हूँ अत: दीक्षा अंगीकार कर तुरंत ही अनशन व्रत स्वीकार कर दूंगा | जिससे अल्पकाल के कष्टो से ही मेरा कार्य सिद्ध हो जाएगा|”

गुरुदेव ने कहा यह दीक्षा ग्रहण करने की इच्छा है, तो अपनी माता व पत्नियों की सम्मति लेकर आ जाओ |”

अवंतीसुकुमाल ने जाकर अपनी माता  व पत्नी से बात की, परन्तु अनुमति नहीं मिलने पर उसने अपने आप ही दीक्षा अंगीकार कर ली”

साधू-वेश अंगीकार कर वह आचार्य भगवंत के पास आया| उसके साधुवेष को देख आचार्य भगवंत ने उसे दीक्षा प्रदान की | तत्पश्चात दीर्घकाल तक कष्ट सहन करने में असमर्थ होने के कारण तत्काल गुरुदेव की अनुज्ञा लेकर अनशन व्रत का स्वीकार कर, वहां से निकलकर श्मशान में जाकर कायोत्सर्ग ध्यान में खड़े हो गया|

पूर्व भव की स्त्री, जो मरकर सियारिनी बनी थी, वह वहां पर आई और अपने वैर का बदला लेने के लिए अवंतीसुकुमाल पर भयंकर उपसर्ग करने लगी|

सर्व प्रथम वह सियारिणी पैर का भाग खाने लगी| उसके बाद वह अपने बच्चों सहित अवंतीसुकुमाल के पेट आदि को खाने लगी|

इस प्रकार मरणांत होने पर भी अवंतीसुकुमाल अपने शुभ-ध्यान से लेश भी चलित नहीं हुए| इस प्रकार अत्यंत ही समाधिपूर्वक कालधर्म को प्राप्त कर अवंतिसुकुमाल मुनि नलिनीगुल्म विमान में देव के रूप में उत्पन्न हुए| प्रात:काल में देवताओं ने आकर अवंतीसुकुमाल मुनि का मोहत्सव किया|

इधर प्रात:काल में अवंतीसुकुमाल को नहीं देखने पर उसकी पत्नियों ने आकर आचार्य भगवंत को पूछा | अपने ज्ञानोपयोग द्वारा उसी रात्री में अवंतीसुकुमाल मुनि के ऊपर भयंकर मरणांत उपसर्ग, मृत्यु और नलिनी गुल्म विमान में उत्पति आदि को जानकर आदि को जानकार आचार्य भगवंत ने वह सब बात उन स्त्रियों को कही|

उन स्त्रियों ने जाकर वह बात भाद्रामाता को कही| इस बात को सुनकर भद्रा माता अपनी पुत्र वधुओं के साथस श्मशान में गई और वहां पर अपने पुत्र के मृत-कलेवर को देखकर एकदम करुण कल्पांत रूपदन करने लगी…उसके बाद अवंतीसुकुमाल मुनि के देह की अंतिम क्रिया की गई|

पुत्र-वियोग की वेदना से प्रतिबोध पाई भद्रा माता भी दीक्षा अंगीकार करने के लिए तैयार हो गई| भद्रा माता की इस  पवित्र भावना को जानकार अवन्तीसुकुमाल की सभी स्त्रियाँ भी दीक्षा के लिए तैयार हो गई| आखिर एक गर्भवती स्त्री को छोड़कर भद्रामाता ने अन्य ३१ पुत्र वधुओ के साथ भागवती दीक्षा अंगीकार कर ली |

समय व्यतीत होने पर उस स्त्री ने एक रत्न को जन्म दिया| धीरे-धीरे वह पुत्र बड़ा हुआ | उसी पुत्र ने अवंतीसुकुमाल पिता मुनि की याद में वीर सं. २०५० में अवंतीनगरी के भूषण समान भव्य जिनमन्दिर का निर्माण किया, जो भविष्य में महाकाल के नाम से प्रसिद्ध हुआ| उसमें पार्श्वनाथ के नाम से प्रख्यात हुआ|