श्री वाराणसी पार्श्वनाथ

श्री वाराणसी पार्श्वनाथ – बनारस (उ.प्र.)

 

वारणा और उसी नाम की दो नदियों के संगम पर बसा वाराणसी, आज बनारस के नाम से प्रख्यात है| प्राचीन काल में इसका नाम काशी था| यहाँ ९.५ ” ऊँचे व ९” चौड़े श्यामवर्णीय ये प्रभु भेलूपुर-बनारस की धर्मशाला के बीच में मुलनायक के रूप में प्रतिष्टित है|

इस नगरीमे विविध तिर्थंकरो के कूल १६ कल्याणक हुए है|

पार्श्वनाथ प्रभु के चार कल्याणकों का स्मारक भेलपुर-बनारस में है|

जलते हुए सर्प को नवकार सुनाया और वह सर्प नागराज धरनेंद्र बना, यश घटना इसी नगर में बनी थी|