श्री गंभीरा पार्श्वनाथ

श्री गंभीरा पार्श्वनाथ – गाँभू तीर्थ

 

यहाँ का इतिहास विक्रम की नवमी शताब्दी पूर्व का माना जाता है| यहाँ किसी समय यह एक विराट नगरी थी| उल्लेखों से पता चलता है की पाटण बसने के पहले यह बस चूका था | इसका प्राचीन नाम गंभीरा व गंभुता था| जिनालयों को प्रदान किये भेट पत्रों से प्रतीत होता है की प्राचीन काल में यहाँ अनेकों जैन मंदिर थे| यहाँ अनेकों जैन ग्रंथो की रचनाएं हुई है| इधर उधर बिखरे हुए खंडहर अवशेष यहाँ की प्राच्चीनता के प्रमाण है| यह प्रतिमा राजा संप्रतिकालीन की मानी जाती है|

आचार्य श्री शीलान्काचार्य ने “आचारांग सूत्र” की टिका इसी गाँव में विक्रम सं. ८१८ में की थी| प्राचीन वेधक ग्रन्थ “सुश्रुत” की रचना भी यहीं हुई थी|

मंत्रीश्वर श्री विमलशाह के पूर्वज नीना सेठ श्रीमाल नगर से प्रथम यहीं आकार बसे थे| गुर्जर नरेश वनराज चावड़ा ने इनको पाटण में रहने का आमंत्रण यहीं पर भेजा था| उनके पुर लहर को पाटण का दंडनायक बनाया था| शक सं. ८२३ में रचित “श्रावक प्रतिकमनसूत्र” को यहीं ताड़पात्र पर लिखा गया था| विक्रम सं. १३०५ में “उपांग पंचक” की वृतियां यहीं लिखी गई थी| इनके आलावा भी अनेकों ग्रंथो की यहाँ रचना होने का उल्लेख मिलता है|