श्री कुंकुमरोल पार्श्वनाथ

श्री कुंकुमरोल पार्श्वनाथ – जालोर

 

फने रहित कुकुमरोल पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिमा १५ इंच ऊँची व १२.५ इंच चौड़ी है|

“सकलाहार्थ स्तोत्र ” के अंतिम श्लोक में गिरी तीर्थो पर बिराजमान “जिनेश्वरों की स्तुति करते हुए श्री “कनकाचल” का भी उल्लेख है | यहीं “कनकाचल” वर्तमान काल में “स्वर्णगिरी” के नाम से प्रख्यात प्राचीन तीर्थ है| इस पर्वत की तलहटी में जालोर शहर बसा हुआ है|

विक्रम की दूसरी सदी में “नाहड़ राजा ने यहाँ “मक्षवसती” नाम के मंदिर का निर्माण कराकर श्री उधोतनसूरीजी म. सा. के वरद हस्तों से प्रतिष्ठा कराई थी| इससे भी इस तीर्थ कि प्राचिनता का ख्याल आ जाता है|

वि.सं १२२१ में सम्राट कुमारपाल महाराजा ने यहाँ “कुमारविहार” नाम से प्रसाद का निर्माण कराकर श्री वादीदेवसूरीजी म.सा. के वरद हस्तों से पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिमा की प्रतिष्ठा करवाई थी| ये ही पार्श्वनाथ प्रभु “कुकुमरोल पार्श्वनाथ” के नाम से पहिचाने गए होंगे | कालक्रम से इस मंदिर का ध्वंस हुआ और नूतन मंदिर में उसी प्रतिमा का स्थापित की हो, ऐसा मेहमान है|