श्री फल्वृद्धि पार्श्वनाथ

श्री फलवृद्धि पार्श्वनाथ – मेडता रोड

 

यह तीर्थ विक्रम की बारहवी शताब्दी में पुन: प्रकाश में आया माना जाता है| दूध व बालू से मिर्मित, चमत्कारी घटनाओं के साथ भूगर्भ से प्रकट इस प्रभु-प्रतिमा की प्रतिष्ठा वि.सं. ११८१ में आचर्य श्री धर्मघोषसूरीश्वर्जी के सुहास्ते चतुर्विध संघ के सम्मुख अत्यंत हर्षोल्लास पूर्वक सुसंपन्न हुई थी, ऐसा उल्लेख है| वि.सं. १६५५३ में इस मंदिर में अन्य जिन प्रतिमाएं प्रतिष्टित होने का उल्लेख है| वि.सं. १९३५ व सं. १९९२ में भी इस मंदिर के जिणोरद्वार हुए थे|

श्री जिनप्रभसूरीश्वर्जी ने चौदहवी शताब्दी में रचित “विविध तीर्थ कल्प” में इस तीर्थ के दर्शन करने से अड़सठ तीर्थो के दर्शन का लाभ होना बताया है| इस वर्णन का कुछ सहस्य अवश्यमेव होगा| इस कल्प में यह भी बाते है की, यहाँ के गोपालक श्री धांधल क्षेष्टि की एक गाय दूध नहीं देती थी |गौ-चरवाहे द्वारा उसकी जांच करने पर पता लगा की एक टिम्बे के पास पेड़ के नीचे गाय के स्तनों से दूध हमेशा झर जाता है| यह वृतांत सेठ से कहा| सेठ को स्वप्न में अधिष्ठायकदेव ने बताया की जहाँ दूध झरता है, वहाँ देवधिदेव श्री पार्श्वनाथ प्रभु की सप्तफणी प्रतिमा है| प्रयत्न करने पर वहां से प्रकट होगी, जिसे मंदिर का निर्माण करवाकर प्रतिष्टित करवाना| धांधल सेठ ने यह वृतान्त अपने इष्ट मित्र श्री शिवंकर से कहा| दोनों मित्र अत्यंत प्रसन्न हुए| स्वप्नानुसार यह भव्य चमत्कारिक प्रतिमा प्राप्त हुई| मंदिर-निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया गया| अर्थाभाव से कार्य को कुछ रोकना पड़ा| दोनों मित्र व्याकुल थे|

अधिष्ठायकदेव ने फिर स्वप्न में प्रकट होकर कहा की हमेशा प्रात: प्रभु के सम्मुख स्वर्ण मुद्राओं से स्वस्तिक किया हुआ मिलेगा, उससे कार्य-पूर्ति कर लेना |लेकिन यह बात किसी को मालुम नहीं पड़ने देना| पुनः मंदिर-निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ| पांच मंडप भी बनकर तैयार हो गए| एक दिन सेठ के लड़के ने यह अनोखा दृश्य छिपकर देख लिया| उस दिन से स्वर्ण मुद्राएँ मिलनी बंध हो गयी, जिससे मंदिर कुछ अपूर्ण अवस्था में रह गया|

वि.सं. ११९१ में जब आचार्य श्री धर्मघोषसूरीश्वर्जी पधारे, तब श्रीसंघ को उपदेश देकर कार्य को पूर्ण करवाकर प्रतिष्ठा करवाई| सुलतान शाहबुद्धीन ने आक्रमण के समय इस मंदिर पर प्रहार किया, जिससे प्रतिमा भी कुछ खंडित हो गई| परन्तु दैविक शक्ति से वह बीमार पड़कर बहुत ही दुःख: का अनुभव करने लगा| इस मंदिर को अखंडित रखने का अपनी सेना को आदेश दिया| इसलिए मंदिर व प्रतिमा को ज्यादा क्षति नहीं पहुँची व यही प्रतिमा पुन: स्थापित हो गयी| यहाँ के अधिष्ठायक देव जागरुक व चमत्कारी है| प्रतिवर्ष आसोज कृष्ण दशमी व पौष कृष्ण दशमी को मेले भरते है| उन पावन अवसरों पर जगह-जगह से हजारो नर-नारी आकर प्रभु भक्ति का लाभ लेते है| चमत्कारिक घटनाएँ अभी भी घटने से वृतांत सुनने मिलते है|