श्री शामला पार्श्वनाथ

श्री शामला पार्श्वनाथ – चारूप तीर्थ

 

इस प्रभु प्रतिमा का इतिहास अति ही प्राचीन माना जाता है| कहा जाता है गत चौबीसी में सुप्रसीध श्री आषाढ़ी श्रावक ने ३ प्रतिमाए प्रतिष्टित करवाई थी, उनमे यह भी एक है| वि. की नवमी शताब्दी में नागेन्द्र गच्छ के श्री देवचन्द्रसूरीजी द्वारा चारूप महा तीर्थ में श्री पार्श्वनाथ प्रभु के परिकर की प्रतिष्ठा करवाने का उल्लेख है| विक्रम की १३वि शताब्दी में नागौर निवासी क्षेष्टि श्री देवचन्द्र द्वारा यहाँ श्री आदिनाथ भगवान का मंदिर निर्मित करवाने का उल्लेख है| वि.सं. १३२० के लगभग क्षेष्टि श्री पेथडशाह द्वारा यहाँ श्री शांतिनाथ भगवान के मंदिर बनवाने का उल्लेख है| श्री जिनप्रभासूरीजी द्वारा विक्रम सं. १३८६ में रचित “विविध  तीर्थ कल्प” में भी इस तीर्थ का उल्लेख मिलता है| विक्रम की चौदहवीशताब्दी में आचार्य श्री तिलकसुरीजी द्वारा रचित “चैत्य परिपाटी” में इस तीर्थ का उल्लेख है| इसी शताब्दी में श्री जय शेखरसूरीजी ने भी इसका उल्लेख किया है|

विक्रम की पंद्रहवी शताब्दी में श्री कीर्तिमेरुसूरीजी ने “साक्षात तीर्थ माला” में इसका उल्लेख किया है| विक्रम की सत्रहवी शताब्दी में श्री शान्ति कुशलसूरीजी ने “गोडी पार्श्वस्तवन” में इस तीर्थ का उल्लेख किया है| विक्रम की अठारहवी शताब्दी में श्री मेघविजयजी उपाध्याय ने “श्री पार्श्वनाथ नाममाला” ने व श्री शीलविजयजी ने “तीर्थ माला” में उल्लेख किया है| विक्रम की अठारहवी शताब्दी के बाद कुछ वर्षो तक यह तीर्थ अस्त व्यस्त बन गया व जैनतरों की देखभाल में रहा| विक्रम सं. १९३८ के आसपास पाटण के श्रावको ने इस तीर्थ की व्यवस्था पुन: संभाली| तत्पश्चात इस विशाल मंदिर का निर्माण करवाकर वि.सं. १९८४ ज्येष्ठ शुक्ला ५ के शुभ दिन पुन: प्रतिष्ठा करवाई|

शासन प्रभावक श्री वीराचार्य, सिद्धाचार्य नरेश के आमंत्रण पर मालवा से विहार करके पाटन पधार रहे थे| तब इस प्राचीन तीर्थ स्थल पर पाटन के नरेश ने स्वागतार्थ एक भव्य समारोह का आयोजन किया था, जो उल्लेखनीय है| श्री अषाढ़ी नाम के सुप्रसीध श्रावक ने तीन जिन प्रतिमाएं भराई थी, उनमे यह एक है| इसलिए यह तीर्थ स्थान विशेष महत्तव रखता है|