श्री नागेश्वर पार्श्वनाथ – नागेश्वर तीर्थ

श्री नागेश्वर पार्श्वनाथ – नागेश्वर तीर्थ

 

प्रतिमाजी की कलाकृति से प्रतिमा लगभग ११०० वर्षो से पूर्व की होने की अनुमान है | इस प्रतिमा का प्रभु पार्श्वनाथ के जीवित काल में प्रभु के अधिष्ठयाक श्री धर्नेंद्र देव द्वारा निर्मित होने की भी मानयता है| यह प्राचीन मंदिर जीर्ण अवस्था में था ,जिसकी देखभाल एक सनयासी बाबा वर्षो से कर रहा था ,प्रतिमा हमेशा अपूजित रहती थी |

श्री पर्श्वप्रभु के देह्प्रमान नव हाथ ऊँची (१३.५ फुट) व हरित वर्ण में मर्कात्मानी सी प्रतीत होती यह भवय चमत्कारिक प्रभु के समयकालीन मानी जाने वाली प्राचीन प्रतिमा अदित्वय है, जो यहा की मुखय विशेषता है |यह प्रतिमा जब सनयासी बाबा की देखभाल में थी ,तब तक चमत्कारिक घटनाओं के कारण स्थानिय लोग आकर्षित होकर दर्शनार्थ आते रहते है |उसके पश्चात भी अनेको प्रकार की चमत्कारिक घटनाऐ समय-समय पर घटने का उल्लेख है |अभी भी चमत्कारिक घटनाए घटती रहती है |

वर्तमान में इसके अतिरीक्त बहारी भाग में एक दादावाडी व दो गुरु मंदिर है |प्रभु प्रतिमा की कला तो अति सुन्दर है |आजू बाजू कायोत्सर्ग  मुद्रा में लगभग १३५ सें. मी. ऊँची श्री शांतिनाथ भगवान् व श्री महावीर भगवान की प्रतिमाए है |

इस मंदिर की प्रतिष्ठा वैशाख सूद ६ वि.सं. २०३७ में संपन्न हुई|

नागेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु के दर्शन के साथ ही साक्षात प्रभु के अस्तित्व काल की झाकी प्रस्तुत हो जाती है| प्रभु के मूल नीलवर्ण से युक्त इस प्रतिमा की उंचाई, प्रभु की ९ हाथ की (१३.५ फुट) उंचाई समान है| प्रभु के दर्शन के साथ ही सौम्यरस का महासागर उमड़ता हुआ प्रतीत होता है|

यह प्रतिमा प्रभु पर्श्वानाथ के समकालीन होने का अनुमान है| पादपीठ में रहे अष्ट मंगल आदि से भी यह अनुमान सही लगता है|

विद्धानो के मतानुसार यह प्रतिमा देवनिर्मित है| अहिछत्रा नगरी में उसकी स्थापना की गई| वहां सुरक्षा का अभाव होने पर इस प्रतिमा को पारस नगर में स्थापित किया गया|

संतान प्राप्ति की लिए दुखी बने अजितसेन राजा और पद्मावती रानी को इस प्रतिमा की प्राप्ति हुई| एक भव्य जिनालय का निर्माण कराकर इस प्रतिमा जी की नागेन्द्र गच्छ के जैनाचार्य द्वारा प्रतिष्ठा कराई गई| प्रभु प्रतिमा की उपासना के प्रभाव से राजा को संतान की प्राप्ति हुई|

कालक्रम से यह मंदिर जीर्ण हुआ| वि.सं. १६२४ में नागेन्द्रगच्छ के जैनाचार्य श्री अभयदेवसूरी के उपदेश से मंदिर का जिणोरद्वार हुआ| धीरे-धीरे यह पारस नगर “पारस नागेश्वर” के नाम से प्रख्यात हुआ|

आज का यह तीर्थस्थान भूतकाल में वैभवपूर्ण नगर था| इस बात को सिद्ध करने वाले अनेक प्रमाण आज भी विधमान है|

श्री नागेश्वर पार्श्वनाथ की पूजा से सर्प का भयंकर विष भी श्रणभर में दूर हो जाता है| प्रभुजी के इस प्रभाव का अनुभव अनेक ने किया है |