श्री मक्षी पार्श्वनाथ – मक्षी तीर्थ

वढ़ीयार देश में लोलाड़ा गाँव में संग्रामसोनी नाम का धर्मनिष्ठ सुश्रावक रहता था| देश-विदेश में उसका व्यवसाय चलता था| एक बार व्यवसाय के प्रयोजन से संग्रामसोनी मांडवगढ़ गया| अपनी बुद्धि कुशलता से उसने खूब धन कमाया| उदारता आदि गुणों के कारण उसकी कीर्ति चारों ओर फैलने लगी| उसकी कार्य कुशलता से प्रभावित होकर ग्यासुधीन बादशाह ने उसे मंत्री पद पर स्थापित किया| मंत्री पद की प्राप्ति के बाद ग्यानसुधीन ने जैन धर्म का खूब प्रचार किया| उसने १७ जिन मंदिरों का निर्माण कराया|

वि.सं. १४७२ में उसने मक्षी गाँव में पार्श्वनाथ प्रभु का उत्तुंग विशाल जिनमंदिर बनवाया और पू.आ. श्री सोमसुन्दरसूरीश्वर्जी के वरद हस्तो से पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिष्ठा कराई|

गाँव के नाम से ही ये पार्श्वनाथ प्रभु मक्षी पार्श्वनाथ के नाम से प्रख्यात हुए|

वि.सं. १५१८ में इस तीर्थ का पुन: जिणोरद्वार हुआ और पुन: प्रतिष्ठा संपन्न हुई|

पद्मासन में ७ फनो से शुशोभित श्यामवर्णीय यह प्रतिमा ३५ इंच ऊँची व ३१ इंच चोडी है|

अनेक मंदिरों का ध्वंस करता हुआ मोहम्मद गजवनी इस तीर्थ को भी नष्ट करने के लिए आया, परन्तु तीर्थ ध्वंस के पहले ही भयंकर बिमारी ने उसे घेर लिया| अनेक चमत्कारों को देखने के बाद उसने अपने सैन्य को आदेश दे दिया की इस तीर्थ को कुछ भी नुक्सान नहीं पहुचायां जाय|